किसानों पर गतिरोध खत्म हो

Summary :

सरकार और किसानों के बीच आठवें दौर की हुई बातचीत बिना किसी नतीजे के समाप्त होने का सीधा अर्थ है कि दोनों ही पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं जिससे गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा है। देश के लिए इस स्थिति को किसी भी सूरत में उचित नहीं कहा जा सकता है।

सरकार और किसानों के बीच आठवें दौर की हुई बातचीत बिना किसी नतीजे के समाप्त होने का सीधा अर्थ है कि दोनों ही पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं जिससे गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा है। देश के लिए इस स्थिति को किसी भी सूरत में उचित नहीं कहा जा सकता है। राजधानी की सरहदों पर डेरा डाले किसान मौसम की मार भी झेल रहे हैं और कड़कड़ाती ठंड में वर्षा से भी भीग रहे हैं।  आम भारतवासी को उम्मीद थी कि नये वर्ष 2021 में वार्ता का पहला दौर होने पर गतिरोध समाप्त होगा परन्तु ऐसा नहीं हो सका। इस किसान आन्दोलन की शुरूआत तीन महीने पहले पंजाब से शुरू हुई और बढ़ते- बढ़ते यह दूसरे राज्यों में भी फैल गया। हालांकि विगत वर्ष जून के महीने में कोरोना काल में  केन्द्र सरकार अध्यादेशों की मार्फत से तीन नये कृषि कानून ले आई थी मगर इन पर बवाल तब मचा जब अक्तूबर महीने में संसद में इन अध्यादेशों को विधेयकों के रूप में पेश करके कानूनों में परिवर्तित किया गया। संशय की स्थिति में कृषि संगठनों ने इन्हें रद्द करने की मांग उठानी शुरू कर दी। किसानों का आन्दोलन तब से ही जोर पकड़ने लगा और इसमें कुछ नई मांगें भी जुड़नी शुरू हो गईं जैसे नये बिजली विधेयक में संशोधन व पराली जलाने पर किसानों पर भारी जुर्माना। यह सच है कि पंजाब-हरियाणा में पहले किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को ही पक्का बनाने की मांग रखी थी मगर जब संसद में तीनों कानून बन गये तो किसानों ने इन कानूनों को रद्द करने की मांग को अपना मुख्य लक्ष्य निर्धारित कर दिया और न्यूनतम समर्थन मूल्य को संवैधानिक अधिकार बनाने की लड़ाई छेड़ दी। सरकार जो तीन नये कानून लाई उनमें कृषि मंडी विपणन प्रणाली के समानान्तर निजी स्तर पर व्यापारियों द्वारा किसानों की उपज की सीधी खरीद हेतु वाणिज्यिक मंडियां (ट्रेड एरिया)  और ठेके की खेती के साथ ही आवश्यक वस्तु अधिनियम की समाप्ति। इन तीनों विषयों पर बनाये गये नये कानून समूचे कृषि क्षेत्र से ही सम्बन्धित हैं। अतः किसानों ने मांग रख दी कि सर्वप्रथम इन कानूनों को ही रद्द किया जाये और साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य को किसान के कानूनी हक में बदल दिया जाये। सरकार ने सहृदयता दिखाते हुए पिछली 30 दिसम्बर की बैठक में किसानों की आनुषांगिक मांगों ( बिजली व पराली) को स्वीकार कर लिया मगर अन्य मांगों पर आगे बातचीत जारी रखने का वादा किया। अतः इस पृष्ठभूमि में 4 जनवरी की बातचीत हुई जो बे-नतीजे समाप्त हो गई और 8 जनवरी को पुनः वार्ता करने की सहमति बनी। इस बातचीत में सरकार ने किसान नेताओं से नये कानूनों के उन हिस्सों में संशोधन करने का प्रस्ताव रखा जिन पर किसानों को दिक्कत है मगर किसानों ने दो टूक कहा कि संशोधनों से वे सन्तुष्ट नहीं हो सकते बल्कि पूरे कानून को ही वे कृषि विरोधी मानते हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि जब संविधान में कृषि पूरी तरह राज्यों का विशिष्ट विषय है तो केन्द्र सरकार क्यों इस क्षेत्र के लिए कानून बनाना जरूरी समझती है। इसका मुख्य कारण यह है कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के दौर में कृषि क्षेत्र को पुरानी संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था के मानकों से बांधे नहीं रखा जा सकता। ऐसा होने पर कृषि क्षेत्र में पूंजी सृजन ( कैपिटल फार्मेशन) नहीं हो सकता। इसके विकास के लिए जरूरी है कि कृषि में निजी निवेश की मिकदार लगातार बढ़े। यह फार्मूला अमेरिकी व यूरोपीय देशों का है। इन देशों में कृषि विपणन की खुली बाजार व्यवस्था है मगर एक नुक्ता यह है कि वहां की सरकारें दिल खोल कर कृषि अनुदान भी देती हैं। इसके साथ ही इन देशों की आबादी भी बहुत कम है और खेती में बहुत कम लोग लगे होने के बावजूद उनकी पैदावार प्रति हैक्टेयर भारत के मुकाबले चार गुना होती है। भारत में हमने अपनी खेती का विकास बहुत सिलसिलेवार ढंग से इस प्रकार किया है कि एक तरफ प्रति हैक्टेयर पैदावार भी बढे़ और दूसरी तरफ खेती से निकल कर लोग दूसरे उद्योग-धन्धों में जायें। इसके बावजूद भारत में आज भी साठ प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर करती है। दूसरी तरफ कृषि उपज के आयात पर प्रतिबन्ध समाप्त हो जाने से भारत के किसानों पर अपनी उपज के गैर प्रतियोगी होने का खतरा मंडराता रहता है। भारत में बागबानी (फल आदि) की उपज दुनिया में सबसे ज्यादा होती है, इसके बावजूद विदेशी फल इसके बाजारों में धड़ल्ले से बिकते हैं। इसी वजह से सरकार इस क्षेत्र को खुली बाजार व्यवस्था से बांधना चाहती है जिससे निजी क्षेत्र इसमें निवेश करके विपणन प्रणाली को विस्तार दे, परन्तु यह इतना आसान काम नहीं है, इसके लिए समूचे कृषि क्षेत्र के अर्थशास्त्र को इस तरह बदलना होगा कि किसानों को हर सूरत में अपनी उपज की लाभप्रद कीमत पाने की गारंटी रहे। इसी वजह से किसान न्यूनतम समर्थन प्रणाली को संवैधानिक स्वरूप देने की मांग कर रहे हैं। अतः मौजूदा गतिरोध को तोड़ना बहुत जरूरी है। इसका सबसे सरल रास्ता यह बचता है कि संसद की शरण में पुनः जाकर सर्वसम्मति बनाकर कानूनों को नया रूप दिया जाये। वैसे भी कानूनों में संशोधन करने के लिए संसद के पास जाना ही होगा। किसानों को जिद छोड़कर बीच के रास्ते पर पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। अतः 8 जनवरी को इस समस्या का अंतिम हल निकलना चाहिए।  

Aditya Chopra

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