धुरंधर ने खालिस्तानी गतिविधियों का पर्दाफाश किया

धुरंधर

बीते दिनों रिलीज हुई फिल्म धुरंधर ने एक बेहद संवेदनशील और जटिल विषय को केंद्रित कर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। फिल्म में जिस तरह से खालिस्तानी गतिविधियों, उनके नेटवर्क और कथित तौर पर जुड़े तत्वों को दिखाने का प्रयास किया गया है, उसने समाज, राजनीति और सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को फिर से प्रासंगिक बना दिया है। आज तक यही समझा जाता रहा है कि विदेशों की धरती पर बैठकर गुरपतवंत सिंह पन्नू जैसे कुछ लोग खालिस्तानी मूवमेंट को चला रहे हैं जिनका मकसद सिखों के लिए अलग राष्ट्र की मांग है, हालांकि भारत में रहता कोई भी सिख न तो इसकी मांग करता है और न ही खालिस्तानी मूवमेंट का समर्थन।

इतना तो तय था कि खालिस्तानी मूवमेंट पाकिस्तानी खुफिया एजैंसी के इशारे पर काम करती आ रही है, जिसका मकसद भारत में दहशत का माहौल बनाए रखने का है परन्तु बालीवुड में बनी फिल्म धुरंधर ने जिस प्रकार खालिस्तानी गतिविधियों का पर्दाफाश करते हुए साफ कर दिया कि खालिस्तानी मूवमेंट के पीछे ड्रग माफिया और गैंगस्टर शामिल हैं और इसके सीधे संपर्क आईएसआई से है जिनके द्वारा इन्हें हथियार आदि सप्लाई किए जाते हैं।

इससे यह भी साफ हो गया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का दर्पण भी होता है। जब कोई फिल्म ऐसे विषयों को उठाती है, जो सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों से जुड़े हों तो उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। धुरंधर ने इसी जिम्मेदारी के साथ एक ऐसे मुद्दे को सामने लाने की कोशिश की है जिसे अक्सर या तो नजरअंदाज किया गया या फिर सीमित दायरे में ही चर्चा मिली। फिल्म यह संकेत देती है कि अलगाववादी गतिविधियां केवल विचारधारा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार इनके पीछे एक संगठित ढांचा भी काम करता है।

यह पहलू बेहद गंभीर है, क्योंकि जब किसी विचारधारा के साथ अवैध गतिविधियों या बाहरी समर्थन के आरोप जुड़ते हैं तो वह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि सुरक्षा का विषय बन जाता है। हालांकि, इस तरह के विषयों पर बनी फिल्मों को लेकर सावधानी भी उतनी ही जरूरी है। भाजपा का सिखों को सम्मान : एक समय था जब सिख समुदाय भाजपा से दूरी बनाया करता मगर पिछले कुछ समय से भाजपा द्वारा सिख समुदाय के लिए ऐसे कार्य किए गए जिससे अब सिख समुदाय का झुकाव पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में होता दिख रहा है। भाजपा ने सिखों को सम्मान देेते हुए पहले हरदीप सिंह पुरी, रवनीत सिंह बिट्टू को चुनाव हारने के बावजूद केन्द्रीय मंत्री मण्डल में शामिल किया और अब दिल्ली में उपराज्यपाल के अहम पद पर तरनजीत सिंह सन्धू को जिम्मेवारी सौंपी गई है।

तरनजीत सिंह सन्धु भी पंजाब के अमृतसर से चुनाव हारने वालों में शामिल है, बावजूद इसके उन्हें इतना अहम पद दिया गया। इससे पहले उतराखण्ड में भी सिख राज्यपाल बनाया गया है, मगर दिल्ली की अहमियत अपनी ही रहती है, क्योंकि यह देश की राजधानी है और सभी देशों के दूतावास यहां हैं इसलिए दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया जाना सिख समुदाय के लिए गर्व की बात है। तरनजीत सिंह सन्धु देश की आजादी में योगदान देने वाले स. तेजा सिंह समुन्द्री के वंशज हैं जिनका नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरी अक्षरों से दर्ज है। यह अलग बात है कि आज तक वह सुनहरी इतिहास स्कूली पाठयक्रम में शामिल नहीं है।

अब स. तरनजीत सिंह सन्धु दिल्ली की बागडौर संभाल रहे हैं ऐसे में उन्हें चाहिए कि इस ओर ध्यान देते हुए स्कूली पाठ्यक्रम में स. तेजा सिंह समुन्द्री का इतिहास दर्ज करवाएं। इस प्रकार कई वर्षों के बाद मोदी सरकार आने के बाद राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन पद पर स. इकबाल सिंह लालपुरा को बिठाया गया था जिनका कार्यकाल पूरा हो चुका है। एयर चीफ मार्शल अमरजीत सिंह भी सिख समुदाय से हैं। 10 साल दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार में तीन सिख विधायक चुने जाने के बाद भी किसी को मंत्रिमण्डल में जगह नहीं दी गई थी, पर भाजपा ने अपनी सरकार में मनजिन्दर सिंह सिरसा को मंत्री पद दिया।

उत्तराखंड और उ.प्र. में भाजपा सरकार के चलते अमनजीत सिंह बख्शी को स्टील कंस्यूमर फोर्म में चेयरमैन बनाया गया है, इस प्रकार और भी कई अहम पद सिख समुदाय को दिए गए हैं। सहजधारियों की गुरुघर में आस्था : सिख धर्म की नींव गुरु नानक देव जी ने रखी थी और गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 1699 में अनोखा खालसा पंथ सजाया और उसके बाद से ही सिख धर्म की एक तरह से स्थापना हुई। हर परिवार में बड़े बेटे को सिख बनाए जाने की प्रथा चल पड़ी। परिवार के अन्य लोग भले ही सिख न सजे हों, पर उनकी आस्था सिख धर्म में उतनी ही है जितनी सिखी स्वरूप वाले भाई की, इसलिए उन्हें सहजधारी कहकर बुलाया जाता है।

आज भी गुरुद्वारों के अन्दर अमृतवेले से लेकर देर रात्रि तक सहजधारी सेवा करते देखे जा सकते हैं मगर दुख उस समय होता है जब कट्टरवाद में विश्वास रखने वालों के द्वारा उनकी आस्था पर प्रहार किया जाता है। उनकी सेवाएं रोकी जाती हैं जो कि निन्दनीय है। प्रबन्धक कमेटियों के नुमाईंदे भी इन कट्टवादियों के प्रभाव में आकर उनकी सेवाओं पर पाबंदी लगा देते हैं जो कि नहीं होना चाहिए। भले ही उनके सिर पर केश और मुख पर दाड़ी नहीं, पर उनकी पूर्ण आस्था गुरु साहिबान के प्रति है। इन्हीं बंदिशों चलते कई सहजधारी परिवार आज गुरुघरों से दूरी बनाने लगे हैं।

उनकी मंशा रहती है कि उनके परिवार में होने वाले समागम गुरुघरों में हों, पर मर्यादा की जानकारी के अभाव के चलते उनसे कई बार मर्यादा में चूक भी हो जाती है जिसके लिए उन्हें कट्टरवादियों के द्वारा जलील किया जाता है। असल में देखा जाए तो सिख समाज आज स्वयं गुरु नानक देव जी के दिखाए मार्ग से भटकता जा रहा है। 550 सालों में गुरु नानक देव जी के रास्ते पर चलते हुए सिखी का प्रचार तो क्या ही करना था आज सिखी का दायरा कम करते चले जा रहे हैं, अगर सही मायने में सिखी का प्रचार हुआ होता तो आज कई अन्य भाईचारे के लोग सिखी के दायरे में लाए जा सकते थे जिन्हें हमने दूर कर दिया।

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