पाकिस्तान लंबे समय से स्वयं को सिखों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों का हितैषी बताने का प्रयास करता रहा है। करतारपुर कॉरिडोर से लेकर विभिन्न गुरुद्वारों के संरक्षण तक, पाकिस्तान की ओर से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि वहां धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान किया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। पाकिस्तान एक ओर सिख श्रद्धालुओं को अपने देश में स्थित गुरुद्वारों के दर्शनों के लिए आमंत्रित कर यह दिखाता है कि वह सिख भावनाओं की कदर करता है मगर इसके विपरीत वह श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ करने में कोई कसर नहीं छोड़ता जिसका पुख्ता प्रमाण इस बात से मिलता है कि पांचवें सिख गुरु अर्जन देव जी के शहीदी पर्व पर दर्शनों के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं को बसों में बिठाकर शहर दर्शन के बहाने ले जाकर उन्हें सूफी नाईट में छोड़ दिया गया जिस घटना ने संसारभर के सिखों के हृदय चोटिल किया है।
निश्चित तौर पर यह पाकिस्तान प्रशासन और उसकी खुफिया एजेन्सी की ही साजिश का हिस्सा हो सकता है, हालांकि देखा गया कि दिल्ली कमेटी और शिरोमणि कमेटी का कोई नुमांइदा इनके झांसे में नहीं आया, वहीं खैबर पख्तूनख्वा के मर्दान स्थित पंचायती गुरुद्वारा सिंह सभा में बुजुर्ग सेवादार दंपति जगन नाथ और आशावंती की निर्मम हत्या ने एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। मामले का सबसे भयावह पहलू यह है कि गिरफ्तार आरोपी शेर शाह ने कथित रूप से यह दावा किया कि उसने यह अपराध ‘‘जन्नत कमाने’’ के लिए किया, यदि यह बयान सही है तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं बल्कि कट्टरपंथी सोच के उस खतरनाक स्वरूप को उजागर करता है जो समाज में नफरत और हिंसा को वैध ठहराने की कोशिश करता है।
इसके साथ ही यह समझना आवश्यक है कि किसी भी धर्म की मूल शिक्षाएं निर्दाेष लोगों की हत्या को उचित नहीं ठहरातीं। इस्लाम सहित दुनिया के सभी प्रमुख धर्म मानवता, करुणा, न्याय और शांति का संदेश देते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति या समूह द्वारा हिंसा को धार्मिक पुरस्कार से जोड़ना धर्म की नहीं, बल्कि कट्टरपंथी और विकृत व्याख्या की अभिव्यक्ति है। निर्दाेष लोगों की हत्या को पुण्य बताने वाली मानसिकता न केवल मानवता के विरुद्ध है, बल्कि स्वयं धर्म के मूल सिद्धांतों के भी विरुद्ध है। पाकिस्तान जहां दुनियाभर के सिखों को अपने ऐतिहासिक गुरुद्वारों के दर्शन के लिए आमंत्रित करता है, वहीं कई बार यात्रियों की गतिविधियों पर अत्यधिक नियंत्रण, आवाजाही पर प्रतिबंध या विवादास्पद सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन जैसे घटनाक्रम प्रश्न खड़े करते हैं।
ऐसे मामलों में पारदर्शिता और धार्मिक संवेदनशीलता का अभाव दोनों देशों के बीच बने विश्वास को कमजोर करता है। पाकिस्तान के लिए चुनौती केवल गुरुद्वारों के जीर्णाेद्धार या विदेशी श्रद्धालुओं को वीजा देने तक सीमित नहीं है। असली परीक्षा यह है कि क्या वहां रहने वाले अल्पसंख्यक नागरिक स्वयं को समान अधिकारों और सुरक्षा के साथ जीवन जीने योग्य महसूस करते हैं। यदि धार्मिक स्थलों के सेवादार तक सुरक्षित नहीं हैं तो यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है। आज आवश्यकता है कि पाकिस्तान सरकार इस घटना की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराए, दोषियों को कठोर दंड दिलाए तथा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए।
क्या भाजपा पंजाबियों में विश्वास की फसल उगा पाएगी? : पंजाब की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह पिछले कुछ समय से राज्य में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रही है उससे स्पष्ट है कि वह इस बार पंजाब में केवल उपस्थिति दर्ज कराने नहीं, बल्कि एक गंभीर दावेदार के रूप में उतरना चाहती है। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व का पंजाब दौरा, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति सम्मान का प्रदर्शन, स्थानीय नेताओं को आगे बढ़ाना तथा स्वयं को पंजाब की भावनाओं से जोड़ने के प्रयास इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं, हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चर्चित नेतृत्व द्वारा अमृतसर दरबार साहिब में माथा टेकना, पगड़ी धारण करना और सेवा करना केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
इसी प्रकार स्मृति ईरानी सहित कई नेताओं द्वारा अपने पंजाबी मूल अथवा पंजाब से भावनात्मक संबंधों का उल्लेख करना भी राज्य के मतदाताओं के साथ निकटता स्थापित करने का प्रयास है। भाजपा के वरिष्ठ नेता तरुण चुघ को राष्ट्रीय स्तर पर महत्व देना और केवल सिंह ढिल्लो को प्रधानगी देकर सिख चेहरे के तौर पर आगे करना भी इसी रणनीति की कड़ी माना जा रहा है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या प्रतीकों और संदेशों की यह राजनीति पंजाब के मतदाताओं का विश्वास जीतने के लिए पर्याप्त होगी? पंजाब में राजनीति केवल विकास, सड़क और रोजगार के प्रश्नों पर नहीं चलती। यहां सम्मान, पहचान, संघीय ढांचे, कृषि और समुदाय से जुड़े मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भाजपा को यह साबित करना होगा कि वह पंजाब को केवल चुनावी दृष्टि से नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं को समझते हुए देखती है। दशकों तक भाजपा पंजाब में कनिष्ठ साझेदार की भूमिका में रही।
अकाली दल ग्रामीण क्षेत्रों और सिख मतदाताओं में प्रभाव रखता था, जबकि भाजपा का आधार मुख्यतः शहरी और हिंदू मतदाता रहे। दोनों दलों का गठबंधन एक-दूसरे की कमजोरियों की भरपाई करता था। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भाजपा यदि अकालियों से गठबंधन करती है तो उसका लाभ अकालियों को तो होगा। गांवों, किसान समुदाय और पारंपरिक पंथक क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ अभी भी सीमित मानी जाती है। गुरमत कैंप: समय की मांग और सिखी के भविष्य की मजबूत नींव : गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के लिए केवल मनोरंजन और आराम का समय नहीं होतीं, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व, संस्कार और पहचान को मजबूत करने का भी महत्वपूर्ण अवसर होती हैं। आज का दौर तेज़ी से बदलती तकनीक, सोशल मीडिया और वैश्विक संस्कृति का दौर है।
ऐसे में क्या हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा, विरासत और धर्म से जुड़ी रह पाएगी? सिख समाज के सामने यह चुनौती गंभीर है, क्योंकि सिख धर्म का आधार केवल परंपराएं नहीं, बल्कि गुरबाणी और गुरु साहिबानों की शिक्षाएं हैं। यदि नई पीढ़ी गुरबाणी को समझने में सक्षम नहीं होगी, तो उसका अपने धर्म से जुड़ाव धीरे-धीरे केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा। ऐसे समय में दिल्ली गुुरुद्वारा कमेटी द्वारा आयोजित गुरमत कैंप नई पीढ़ी को सिखी, पंजाबी भाषा और गुरमत विचारधारा से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरे हैं।
आज से पांच वर्ष पूर्व मात्र 4 हजार बच्चों से इनकी शुरुआत की गई थी तो दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका, महासचिव जगदीप सिंह काहलो और धर्म प्रचार मुखी जसप्रीत सिंह करमसर की सोच थी कि दिल्ली के बच्चों को इन कैंपों में शामिल कर उनमें मातृ भाषा और धर्म का प्रचार किया जाएगा जिसके लिए बकायदा धार्मिक पुस्तकें भी तैयार की गई और दिल्ली के सभी क्षेत्रों की सिंह सभाओं में इन कैंपों को आयोजित किया गया मगर देखते ही देखते आज यह कैंप देश के अन्य शहरों में भी खुल चुके हैं। इतना ही नहीं विदेशों से भी दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी द्वारा तैयार पुस्तकों की मांग आने लगी है।


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