ईरान में पिछले कुछ समय से मुद्रा रियाल की कीमत में लगातार गिरावट, महंगाई दर के 50 प्रतिशत तक पहुंचने, बेरोजगारी संकट के गम्भीर होने और गहराते ऊर्जा संकट के बीच आक्रोशित लोगों ने मुल्ला छोड़ो ईरान के नारों के साथ आंदोलन शुरू कर दिया है और इस आंदोलन में ‘जेन-जेड’ की बड़ी भूमिका है। ईरान के 21 प्रांतों में लोग बागी तेवरों में हैं। हिंसक प्रदर्शनों में 7 लोग मारे जा चुके हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई नाराज जनता के निशान पर हैं। तेहरान और अन्य शहरों में विश्वविद्यालय और व्यावसायिक इलाके विरोध के प्रमुख केन्द्र बनकर उभरे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से ईरान पर हमले की धमकी ने भी असंतोष को और हवा दी है। इजराइल भी अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ जहर उगल रहा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ईरान में विरोध प्रदर्शनों के पीछे इन दोनों देशों की साजिश हो। पिछले वर्ष सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र ने देश के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों को फिर से लागू कर दिया था, जिन्हें 10 वर्ष पहले हटा लिया गया था।
ईरान में जनता का विद्रोह 1979 की इस्लामिक क्रांति की याद दिला रहा है। 46 साल पहले की अगर बात की जाए तो जिस तरह इस्लामिक कट्टरपंथियों ने देश की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट किया है उसी तरह आवाम ईरान से मजहबी कट्टरपंथ वाली सत्ता को उखाड़ फेंकने पर आमादा नजर आ रही है। ईरान में मुल्ला लीव ईरान जैसे नारे सरेआम लग रहे हैं। पिछले तीन दिन से लगातार जोर पकड़ रहे इस आंदोलन में अब जेन-जेड भी कूद पड़े हैं। हिजाब को लेकर जिस जन क्रांति को 3 साल पहले अयातुल्लाह अली खामनेई ने जोर जुल्म के दम पर दबा दिया था वो ईरान में अब नए न्यायों के साथ सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर उबाल मार रही है। मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा। ईरान में तानाशाही बर्दाश्त नहीं।
गिरती अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, व्यापक भ्रष्टाचार और ईंधन एवं खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों को लेकर जनता बुरी तरह से त्रस्त तो है ही लेकिन देश में ऊर्जा संकट और जल संकट भी लोगों के गुस्से का कारण है। तेहरान और कई बड़े अन्य शहरों में पानी देने वाले अधिकांश बांध लगभग खाली पड़े हैं। ईरान दुनिया के सबसे सख्त इंटरनेट नियंत्रण वाले देशों में भी शामिल है। ऐसा दिखाई दे रहा है िक देश पर शासन कर रही धार्मिक सत्ता व्यवस्था के प्रति व्यापक असंतोष है। लोग आज भी रजाशाह पहलवी के दौर को याद करते हैं। उस दौर में समाज काफी खुला हुआ था। उनके बाद उनके बेटे रजा पहलवी के शासन में भी ईरान पश्चिमी देशों से ज्यादा खुला था। विश्वविद्यालयों में महिलाओं की संख्या बहुत अधिक थी। उन्हें अपने हिसाब से कपड़े पहनने पर कोई रोक-टोक नहीं थी। महिलाओं को सड़कों पर भी पश्चिमी शैली के कपड़ों में देखा जा सकता था। 70 के दशक में तो ईरान में पश्चिमी सभ्यता का बोलबाला था। रजा पहलवी के दौर में भी हिजाब और बुर्के पर बैन लगा रहा लेकिन कट्टरपंथियों ने रजा पहलवी को अमेरिका की कठपुतली करार देते हुए विद्रोह कर दिया था। धार्मिक सत्ता ने ईरान में शरिया कानून लागू किया और कई सारी पाबंदियां लगा दी गईं। महिलाओं की आजादी छीन ली गई। इस्लामिक क्रांति ने खुले ईरान को बंद कर दिया। ईरान में मौजूदा संकट केवल राज्य और समाज के लोकतांत्रिकरण की लोगों की इच्छा और इसके प्रति रूढ़िवादी प्रतिक्रिया और विरोध तक सीमित नहीं है। उसके पीछे एक बड़ा कारण ईरान में राजनीतिक गुटबाजी और आंतरिक सत्ता संघर्ष भी है।
ईरान की जनता खामनेई और इस्लामी शासन की सम्पूर्ण वैधता पर ही सवाल उठा रही है। अधिकांश प्रदर्शनकारी अपने माता-पिता के विपरीत ईरानी क्रांति की संतान हैं। ये युवा पीढ़ी 1979 की क्रांति से अछूती है और एक नया ईरान चाहती है। इनमें से अधिकांश या तो क्रांति के समय मौजूद नहीं थे या इतने छोटे हैं कि उन्हें क्रांति याद नहीं है। ये युवा इस बात की याद दिलाते हैं कि ईरान की एक ही छवि 35 वर्ष से कम आयु के 70 प्रतिशत लोगों की मानसिकता को प्रतिबिंबित नहीं करती है। युवा ईरानियों की लोकतंत्र की खोज ने न केवल “वलायत-ए फकीह” के सिद्धांत की स्थिति और उसकी वैधता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि रूहानी सरकार और उसकी चुनावी वैधता को भी चुनौती दी है लेकिन किसी न किसी तरह, यह कहना बेहद मुश्किल है कि ईरान में चल रही मौजूदा अशांति किसी तरह से ऐसी ज्वाला में तब्दील हो जाएगी जो ईरान के धार्मिक शासन को जलाकर राख कर दे। हालांकि, 2009 की तरह एक बार फिर, ईरानी शासन खुद को वैधता के एक अभूतपूर्व संकट में फंसा हुआ पा रहा है।
1990 के दशक से ही ईरान में असंतोष एक बड़ी समस्या रही है। धार्मिक सत्ता ने युवाओं और श्रमिक वर्ग पर काफी अत्याचार िकए हैं। खामनेई की सत्ता ने लगातार आंदोलनों का दमन किया और मानवाधिकारों को कुचला है। ईरान में 2022 और 2023 में देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे। यह प्रदर्शन उस समय हुए थे जब 22 वर्षीय युवती महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। उस पर हिजाब से जुड़े सख्त इस्लामी कानूनों का पालन न करने का आरोप लगाया गया था। इन प्रदर्शनों के दौरान सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी और 20 हजार से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारियां की गई थीं और कई लोगों को
फांसी दे दी गई थी। ईरान में चल रही मौजूदा अशांति ऐसी आग में बदल सकती है जो ईरान की धार्मिक सत्ता व्यवस्था को जलाकर राख कर दे, ऐसा
कहना अभी मुश्किल है। ईरान एक ऐसे मोड़ पर है जिसे दुनिया नजर अंदाज नहीं कर सकती। लगता तो यही है कि ईरान में लोकतंत्र की लहर बेकाबू होने की कोशिश कर रही है। देखना होगा कि सत्ता के दमन चक्र का कितना विरोध वहां की जनता कर पाती है।
ईरान में ‘जेन-जेड’ का विरोध
Summary :
ईरान में पिछले कुछ समय से मुद्रा रियाल की कीमत में लगातार गिरावट, महंगाई दर के 50 प्रतिशत तक पहुंचने, बेरोजगारी संकट के गम्भीर होने और गहराते ऊर्जा संकट के बीच आक्रोशित लोगों ने मुल्ला छोड़ो ईरान के नारों के साथ आंदोलन शुरू कर दिया है और इस आंदोलन में ‘जेन-जेड’ की बड़ी भूमिका है। ईरान के 21 प्रांतों में लोग बागी तेवरों में हैं। हिंसक प्रदर्शनों में 7 लोग मारे जा चुके हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई नाराज जनता के निशान पर हैं। तेहरान और अन्य शहरों में विश्वविद्यालय और व्यावसायिक इलाके विरोध के प्रमुख केन्द्र…



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