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गो-इमरान-गो

पाकिस्तान के वजीरे आजम इमरान खान ने आज अपने मुल्क को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां एक ‘अंधा’ दूसरे ‘अंधे’ से पूछ रहा है कि यह रास्ता किधर जायेगा? मगर इसमें इमरान खान की कोई खता नहीं है क्योंकि इस मुल्क की बुनियाद में ही मुहम्मद अली जिन्ना मजहब की ऐसी ‘बारूदी’ मिट्टी डाल कर गया है जिसमें लोकतन्त्र या जम्हूरियत की फसल कभी ‘लह-लहा’ ही नहीं सकती।

पाकिस्तान के वजीरे आजम इमरान खान ने आज अपने मुल्क को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां एक ‘अंधा’ दूसरे ‘अंधे’ से पूछ रहा है कि यह रास्ता किधर जायेगा? मगर इसमें इमरान खान की कोई खता नहीं है क्योंकि इस मुल्क की बुनियाद में ही मुहम्मद अली जिन्ना मजहब की ऐसी ‘बारूदी’ मिट्टी डाल कर गया है जिसमें लोकतन्त्र या जम्हूरियत की फसल कभी ‘लह-लहा’ ही नहीं सकती। अतः इमरान खान ने अपनी हरकतों से पाकिस्तान को आज ठीक वैसे ही हालात में लाकर खड़ा कर दिया है जैसे 1958 में बने थे और तब पूरे मुल्क में मार्शल लाॅ लागू करके जनरल अयूब को वहां के राष्ट्रपति सिकन्दर मिर्जा ने प्रशासक नियुक्त कर दिया था। मगर तब के पाकिस्तान के सियासतदानों में अपनी हिन्दोस्तानी रवायतों की कुछ हया बाकी थी जिसकी वजह से उस समय के मुस्लिम लीग के नेता मरहूम इब्राहीम इस्माइल चुन्दरीगर ने प्रधानमन्त्री पद से इसलिए इस्तीफा दे दिया था कि नेशनल एसेम्बली में उनकी पार्टी ने बहुमत खो दिया था और इसका मुजाहिरा उनकी विरोधी पार्टियों ने एसेम्बली के इजलास से पहले ही कर दिया था। मगर इमरान खान हर कीमत पर प्रधानमन्त्री पद पर बने रहना चाहते हैं और इसके लिए अपने मुल्क को दांव तक पर लगाने की बाजी लगा रहे हैं। उन्होंने अपनी पार्टी तहरीके इंसाफ छोड़ने वाले 22 सांसदों को ‘बिका’ हुआ माल बता कर पूरे विपक्ष को ही अमेरिका की शह पर अपनी सरकार गिराने का हामी बता दिया है और इसके लिए एक ऐसी चिट्ठी का हवाला दिया है जो वाशिंगटन से ही लिखी गई और उसमें धमकी दी गई कि इमरान के हटने पर पाकिस्तान के अमेरिका से सम्बन्ध अच्छे हो सकते हैं। 
अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में इस तरह के खत किसी ‘शेख चिल्ली’  का ख्वाब ही हो सकता हैं। असलियत तो यह है कि इमरान खान ने पाकिस्तान को ‘भिखमंगा’ मुल्क इस तरीके से बनाया है कि आज कोई इस्लामी देश तक इसे एक कौड़ी भी उधार देने को तैयार नहीं है। पूरे पाकिस्तान में महंगाई इस कदर है कि कभी भी श्रीलंका जैसे हालात बन सकते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है मुसलमानों के ​लिए बरकत का महीना कहे जाने वाले रमजान के दौरान उचित मूल्य की दुकानों से केवल 40 किलो आटा खरीदने की पाबन्दी लगा दी गई है। अन्य जरूरी वस्तुओं की बात करना तो फिजूल है। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनीतिज्ञ बने इमरान खान की समझ में यही नहीं आ रहा है कि लोकतन्त्र क्रिकेट का खेल नहीं होता है कि अन्तिम ओवर की अन्तिम गेंद तक मैच जीतने की उम्मीद रखी जाये। लोकतन्त्र कुछ सिद्धान्तों पर टिका होता है और उनमें सबसे बड़ा सिद्धान्त सीधे लोगों द्वारा चुने हुए सदन में प्रधानमन्त्री का बहुमत होता है। पाकिस्तान में कोई दल बदल कानून नहीं है और इस देश का सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि इमरान की पार्टी छोड़ कर जाने वाले सांसदों को  वोट डालने से नहीं रोका जा सकता। मगर इमरान खान अपने हुकूमत में रहने का फायदा उठा कर विपक्षी दलों को कथित चिट्ठी के आधार पर गद्दार तक बताने से नहीं चूक रहे और उनके खिलाफ अपनी देश की जनता को भड़का कर सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं  और बार-बार राष्ट्रीय सम्बोधन करके अपने खिलाफ विपक्ष द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव को विदेशी साजिश करार दे रहे हैं। ऐसा करके वह भूल रहे हैं कि वे पाकिस्तान के लोगों द्वारा चुने हुए नुमाइन्दों को उनके संवैधानिक हक से बेदखल कर रहे हैं और पाकिस्तान में जम्हूरियत का भविष्य समाप्त कर रहे हैं ।
 भारत को चिन्ता केवल इस बात की है कि कहीं पाकिस्तान गृह युद्ध में न उलझ जाये जिसका असर इस भारतीय उपमहाद्वीप की शान्ति पर पड़े क्योंकि पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है। खुदगर्जी में इमरान खान यह तक भूल बैठे हैं कि वह कोई क्रिकेट टीम के कप्तान नहीं बल्कि एक देश के प्रधानमन्त्री हैं और उनके हर कारनामे को दुनिया के महत्वपूर्ण देश खास कर एशिया की ताकतें बड़े गौर से देख रही हैं। उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए जिस तरह पाकिस्तान को ही दांव पर लगाने की गुस्ताखी की है उसका असर उपमहाद्वीप की शान्ति व स्थिरता पर भी पड़ सकता है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान की सेना के जनरल बाजवा का सक्रिय होना स्वाभाविक प्रक्रिया है और कुछ मायनों में वह सक्रिय भी हो चुके हैं क्योंकि उन्होंने आज ही अपने मुल्क में आयोजित एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्यक्रम में यह कहा कि अमेरिका के साथ उनके मुल्क के सम्बन्ध अच्छे रहे हैं और पाकिस्तान से सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को ही होता है। लगे हाथ उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध के सिलसिले में रूस पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी कर दी। जो लोग भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति के जानकार हैं वे समझ सकते हैं कि जनरल बाजवा के इस कथन का पाकिस्तान की अन्दरूनी राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है।
पाकिस्तान के हित में यही होगा कि इतवार को इसकी राष्ट्रीय एसेम्बली का इजलास सभी कायदे-कानूनों के तहत हो और उसमें हार-जीत का फैसला नियमों के अनुसार हो। मगर इमरान खान  एसेम्बली के इजलास में भी कोहराम मचाने और अफरा-तफरी मचाने की तरकीबे निकाल रहे हैं और इसके लिए उन्होंने अपनी पार्टी के नेता शेख रशीद को सड़कों पर बद अणनी फैलाने के काम  लगा दिया है।  पाकिस्तान तो पहले से ही पूरी दुनिया में ‘बेनंग-ओ-नाम’ मुल्क के तौर पर मशहूर है अब इमरान खान इसे अपनी ‘बेगैरती’ से बेइमान मुल्क बनाने पर तुले हुए हैैं। वक्त का तकाजा है कि गो- इमरान- गो।

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