उमर अब्दुल्ला का भगवा के समक्ष ‘सरेंडर’?

‘हमारी पतंगंे भी जाकर बार-बार उलझती रहीं इन्हीं दरख्तों की जिन डालों से
पैरों से कुचले हैं हमने भी इनके सूखे पत्ते जो धूप से बचाते रहे हमें सालों से’
भाजपा विरोध के आडंबर से जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस के संग अपना सियासी मंच सजाने वाले उमर अब्दुल्ला ने क्या अपना असली रंग दिखा दिया है? नहीं तो क्या वज़ह है कि पिछले दिनों श्रीनगर से वे भागे-भागे दिल्ली पहुंचे जहां भाजपा के एक बड़े नेता के घर उनकी एक अहम मीटिंग आहूत थी। सूत्रों की मानें तो यह मुलाकात कोई सवा घंटे तक चली। उमर का विनम्र प्रतिवेदन हाजिर था- ‘मैं सबको साथ लेकर चलने में यकीन रखता हूं, मुझे सही तौर पर अपनी सरकार चलाने के लिए आप लोगों के सहयोग की भी जरूरत है। मेरे लायक कोई काम हो तो मैं हाजिर हूं।’ यह एक तरह का सियासी समर्पण ही था, क्योंकि इससे महज़ एक सप्ताह पूर्व ही कांग्रेस ने अपने दो विधायकों के नाम उमर को सौंपे थे, जिन्हें उनकी सरकार में मंत्री बनाया जाना था, उमर की रजामंदी हासिल होने के बाद ही कांग्रेस शीर्ष ने अपने इन दोनों लोगों के नाम उमर को सौंपे थे। पर भाजपा के इस बड़े नेता से अहम मुलाकात के बाद उमर की सियासत ने भी एक नई करवट ले ली, तय हुआ कि वे अपनी सरकार से कांग्रेस को बाहर ही रखेंगे ताकि आने वाले दिनों में प्रदेश में कांग्रेस में एक बड़ी टूट को सिरे चढ़ाया जा सके और टूटे हुए कांग्रेसी विधायकों में से ही किसी को सरकार में मंत्री बनाने की पहल हो। दोनों नेताओं के दरम्यान बातचीत में यह भी तय हुआ कि ‘कम से कम तीन महीने के अंतराल पर ये दोनों नेतागण आमने-सामने की मुलाकात करेंगे जिससे कि भविष्य में भी आपसी रिश्तों में यह सौहार्द्र बना रहे।’
आय से अधिक सम्पत्ति केस और उमर
सौ टके का सवाल कि आखिर उमर के साथ क्या अनहोनी हो गई कि उन्हें यूं घुटनों पर आना पड़ा? विश्वस्त सूत्रों की मानें तो अब्दुल्ला परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला मुंह बाए खड़ा है। उमर को इस बारे में केंद्र से अभयदान चाहिए। सूत्रों का दावा है कि उमर के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में शिकायतकर्ता उनका कोई विरोधी नहीं, बल्कि उनकी ही पार्टी का एक लोकसभा सांसद हैं, जिनसे इन दिनों उमर का छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। यह सांसद उमर की ही पार्टी से कई बार विधायक और उनकी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। सूत्रों का दावा है कि सांसद महोदय ने उमर की संपत्तियों का ब्यौरा जांच एजेंसियों को देते हुए यह भी बताया है कि उमर के अकेले दिल्ली में चार फ्लैट और एक कमर्शियल स्पेस है, इसके अलावा उनका लंदन में एक घर भी है। इनकी कई संपत्तियां उनकी एक पत्रकार मित्र के नाम पर होने का दावा भी किया गया है। क्या यही एक बड़ी वज़ह है कि उमर भाजपा की शरण में आने को मजबूर हुए हैं?
जब रावण से
मिले अखिलेश
पिछले दिनों संसद भवन स्थित अखिलेश के ऑफिस में उनसे एक खास व्यक्ति मिलने पहुंचे, वे हैं नगीना संसदीय सीट से सांसद चंद्रशेखर रावण। अखिलेश पहले से ही कुछ लोगों से घिरे बैठे थे, रावण को अंदर आते देख उन्होंने अपने लोगों से फौरन बाहर जाने को कहा जिससे वे अकेले में इस निर्दलीय सांसद के साथ कुछ जरूरी बातें कर सकें। रावण ने छूटते ही अखिलेश से कह दिया कि ‘अगर 27 के विधानसभा चुनाव में दलित वोटर्स सपा के साथ नहीं जुड़ेगा तो पश्चिमी यूपी में साइकिल की रफ्तार थम सकती है।’ फिर रावण अपनी पार्टी के लिए अखिलेश से 25 सीट मांग बैठे, अखिलेश ने कहा- ‘यह संख्या बहुत ज्यादा है, इतना हम दे नहीं पाएंगे।’ तो रावण ने कहा कि ’आपने 22 में जयंत के लिए 25 सीटें छोड़ी थीं?’ अखिलेश ने कहा- ‘हां छोड़ी थीं, पर वे जीत पाए सिर्फ 8, इस बार हम सहयोगियों के लिए उतनी ही सीटें छोड़ पाएंगे, जितनी वे जीतने का माद्दा रखते हैं।’ फिर अखिलेश की सलाह पर रावण धर्मेंद्र यादव से मिलने उनके घर पहुंचे, 3 फरवरी की रात को, इत्तफाक से उस दिन धर्मेंद्र का जन्मदिन भी था, सो रावण ने पहले उन्हें जन्मदिन की बधाई दी, फिर आगे के लिए बातचीत शुरू हो गई, धर्मेंद्र ने बातचीत की शुरूआत में ही रावण को याद दिला दिया कि ‘भूलिए मत इस बार का चुनाव आप हमारी मदद के बगैर जीत नहीं सकते थे, क्योंकि आपकी सीट पर साढ़े सात लाख मुस्लिम वोटर हैं जो सपा से सहानुभूति रखने वाले हैं।’ फिर धर्मेंद्र ने दो टूक कहा ‘हम आपकी आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के लिए 10 सीटें छोड़ सकते हैं, पर हम जानते हैं कि इस पर लड़ने के लिए आपके पास योग्य उम्मीदवारों का टोटा है तो हमारी शर्त है कि इन 10 में से भी हम 5 पर अपने लोग उतारेंगे, जो आपके सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे।’ धर्मेंद्र की बात सुनकर किंचित सकपका गए रावण और उन्होंने सपा के इस प्रस्ताव पर सोचने के लिए थोड़ा वक्त मांगा है।
क्या पप्पू यादव से नाराज़ है गांधी परिवार?
बिहार के लोकप्रिय सांसद पप्पू यादव यूं तो प्रियंका गांधी के घो​िषत हनुमान में शुमार होते हैं, पर बिहार चुनाव के बाद आखिरकार ऐसा क्या हुआ है कि प्रियंका उनका फोन ही नहीं ले रही हैं? पिछले दिनों संसद भवन में जब पप्पू अपनी पत्नी रंजीत रंजन के साथ मौजूद थे तो यह दंपत्ति नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से टकरा गया। जरूरी दुआ सलाम के बाद पप्पू ने महसूस किया कि राहुल उनसे बात करने में सहज नहीं हो पा रहे हैं। यहां तक कि राहुल ने छूटते ही तंज कर दिया कि ‘बिहार में जो हमारा भला करना था वह आपने कर ही दिया, लगे हाथ तेजस्वी को कांग्रेस से दूर कर दिया।’ इस पर पप्पू ने राहुल से कहा कि ‘वे एक बार मिलने का वक्त दें, मिलकर वे सारी बातें समझा देंगे।’ पर राहुल ने उन्हें टालते हुए कहा कि ‘इन दिनों उनका प्रोग्राम काफी टाइट है, जब वे फ्री रहेंगे तो वे मैसेज करवा देंगे।’ इस पूरी बातचीत को वहां आसपास मंडरा रहे कुछ भाजपा के सांसद भी सुन रहे थे, राहुल के वहां से जाते ही वे पप्पू के पास आए और बोले- ‘देख लिए, इतना आप मोदी जी के लिए किए होते तो अब तक वे आपकी पीठ पर हाथ रख चुके होते।’ पप्पू से उस वक्त कोई जवाब देते नहीं बना।
असम में चुनावी
माहौल है गर्म
असम में इस दफे का विधानसभा चुनाव एक दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है, क्योंकि इस बार वहां के भगवा सीएम हिमंता बिस्वा सरमा पूरी तरह योगी स्टाइल में चुनाव लड़ रहे हैं, वे अपनी हर सभा में अब खुल कर मुसलमानों को सीधे निशाने पर ले रहे हैं। हिमंता के इस बेलौस अंदाज से हिंदू वोट एकजुट हुआ हो या नहीं, पर हां भाजपा के डर से प्रदेश के मुस्लिम वोटर जरूर कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद हो गए हैं। लगता है इस बार मुस्लिम वोटरों का ‘वोट कटवा’ पार्टियों से भी मोहभंग हुआ है, सो इस दफे अपने वोटरों को लुभाने में बदरूद्दीन अजमल जैसे महारथियों को भी पसीने आ रहे हैं। उसी तरह प्रदेश के अहोम वोटर भी कहीं न कहीं हिमंता बिस्वा की कार्यशैली से नाराज़ जान पड़ता है, सो एक बार इनका झुकाव अगर कांग्रेस की तरफ हो गया तो फिर तो कांग्रेस की लॉटरी लग सकती है। असम में 35 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, माना जाता है कि इस बार के एसआईआर में 7-8 फीसदी इनके नामों में कटौती हो गई है। सो बचे-खुचे 27-28 फीसदी भी एक निर्णायक चुनावी लड़ाई लड़ने को तत्पर हैं। प्रदेश में 13-14 फीसदी हिंदू बंगाली वोटर हैं, भाजपा इनकी स्वाभाविक पसंद है। अगर इस दफे असम में कांग्रेस की चुनावी रणनीति व उनके प्रचार अभियान में धार रही, और राहुल-प्रियंका ने यहां थोड़ा दम लगाया तो कांग्रेस की नैया यहां पार लग सकती है।

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