दाल गल गई क्या?

Summary :

भारतीयों को दालें बहुत पसंद हैं। भारतीय परिवार रोजाना दाल बनाते हैं। दालों को लेकर मुहावरे भी काफी लोकप्रिय हैं। दे दाल में पानी, जूतियों में दाल बंटना, दाल में काला या दाल गल गई आदि मुहावरे आज बोलचाल में काफी प्रचलित हैं। दाल अब गरीबों का ही खाना नहीं, बल्कि अमीरी के अमृत्व को भी प्राप्त कर चुकी है। दाल जो निभे नाल, यह सच है कि दाल आम आदमी की पसंद है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील में अमेरिका ने चुपचाप फैक्ट श​ीट यानि तथ्य पक्ष में कई ​िबन्दु बदल दिए हैं। खासतौर पर दालों को टैरिफ की सूची से हटा…

भारतीयों को दालें बहुत पसंद हैं। भारतीय परिवार रोजाना दाल बनाते हैं। दालों को लेकर मुहावरे भी काफी लोकप्रिय हैं। दे दाल में पानी, जूतियों में दाल बंटना, दाल में काला या दाल गल गई आदि मुहावरे आज बोलचाल में काफी प्रचलित हैं। दाल अब गरीबों का ही खाना नहीं, बल्कि अमीरी के अमृत्व को भी प्राप्त कर चुकी है। दाल जो निभे नाल, यह सच है कि दाल आम आदमी की पसंद है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील में अमेरिका ने चुपचाप फैक्ट श​ीट यानि तथ्य पक्ष में कई ​िबन्दु बदल दिए हैं। खासतौर पर दालों को टैरिफ की सूची से हटा दिया गया है। 500 अरब डॉलर की खरीद को लेकर पक्का वादा जैसी भाषा को नरम बनाया है और डिजिटल सर्विस टैक्स हटाने का दावा भी वापिस ले ​िलया है। फैक्ट शीट का नया वर्जन जारी होने के बाद यह साफ है कि भारतीय दालें संरक्षित रहेंगी और यह भी नहीं कि 500 अरब डॉलर का आयात भारत द्वारा किया ही जाएगा। विपक्ष और ट्रेड डील के आलोचक इस बात को लेकर शोर मचा रहे थे कि भारत ने अपने कृषि क्षेत्र को अमेरिका के​ लिए खोल दिया है जिससे हमारा कृषि क्षेत्र और किसान प्रभावित होंगे और 500 अरब डॉलर की खरीद की प्रतिबद्धता को लेकर भी हमारा व्यापार घाटा बढ़ जाएगा।
केन्द्र सरकार लगातार स्पष्ट कर रही है कि भारत के कृषि क्षेत्र को पूरी तरह संरक्षण दिया गया है और कृषि उत्पादों को ट्रेड डील से बाहर रखा गया है। अमेरिकी रुख में नरमी से अब भारतीय किसानों को अमेरिकी दालों के साथ प्रतिस्पर्धा से कोई खतरा नहीं होगा। दालों की खेती से लाखों किसान जुड़े हुए हैं इस​िलए यह बदलाव बड़ी राहत की खबर है। पहले कहा गया था कि भारत अमेरिका से हर वर्ष 9 लाख करोड़ का आयात करेगा लेकिन अब कहा गया है कि भारत ऐसा करने का इरादा रखता है। पहले यह एक पक्का सौदा जैसा लग रहा था, अब यह सम्भावित योजना जैसा लग रहा है। अब भारत पर शर्तों का दबाव कम हो गया है। अब यह खरीद विमान, तकनीकी समान, ऊर्जा, कीमती धातुएं और कोयले जैसे क्षेत्रों से जुड़ी बताई गई है। संशोधित फैक्ट शीट से यह स्पष्ट है कि ट्रेड वार्ता में कुछ पेंच अभी भी बरकरार हैं और भारत ने वार्ता में अपनी रणनीतिक मजबूती बरकरार रखी हुई है। अब सवाल यह है कि क्या भारत और अमेरिका में दाल पूरी तरह से गल गई है यानि बात पूरी तरह से बन गई है या अभी कुछ बिन्दु बाकी हैं। क्या ट्रम्प भारत पर मेहरबानी कर रहे हैैं? या वह भारत के महत्व को समझते हैं। ट्रम्प जैसे अस्थिर मानसिकता वाले राजनीतिज्ञों पर कितना भरोसा किया जा सकता है।
भारत पर ट्रम्प की मेहरबानी की बड़ी वजह है कि वो भारत के साथ डील को फाइनल करना चाहते हैं। रूसी तेल की खरीद पर जो गाड़ी अटकी हुई है, वो उस पर भारत को मनाना चाहते हैं। अमेरिका एग्रीकल्चर सेक्टर, 500 अरब डॉलर के बाजार, डिजिटल सर्विस टैक्स आदि पर भारत की शर्तों को मान रहा है। भारत के पक्ष में इन फैसलों को मानकर अमेरिका तेल के लिए भारत पर दवाब बना सकता है। अमेरिका की चाहत है कि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पूरी तरह से बंद हो जाए, जिसके लिए वो सालभर से कोशिशें कर रहा है। कभी टैरिफ लगाकर, कभी धमकी देकर तो कभी रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर ट्रेड डील में भी उसने रूसी तेल की खरीद बंद रखने की शर्त रखी है। हालांकि भारत ने साफ किया है कि उसे जहां से सस्ता तेल मिलेगा, वो वहां से खरीदेगा। सरकार ने गत दिनों एक संसदीय समिति को साफ किया है कि भारत उन देशों से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा, जहां से उसे सस्ता और सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला तेल मिलता रहेगा। सरकार ने साफ किया है कि भारतीय तेल कंपनियां भू-राजनीतिक स्थिति और गैर-प्रतिबंधित स्रोतों को देखते हुए तेल की खरीदारी जारी रखेेगी। इसका अर्थ यही है कि व्यापार वार्ता में रूस से तेल की खरीदारी को लेकर भी मामला अभी फंसा हुआ है। डोनाल्ड ट्रम्प की सियासत हमेशा डीलबाजी पर टिकी रही है। पहले कड़े बयान, फिर नरम रुख आैर फिर नया दबाव। कहा यह भी जा रहा है कि फैक्ट शीट में संशोधन अमेरिका की आंतरिक राजनीति का परिणाम है। अमेरिका के किसान उद्योग आैर टैक उद्यमी भी भारत से जल्द डील का दबाव डाल रहे हैं। अमेरिका ने अभी कुछ धार कम की है लेकिन तलवार पूरी तरह से हटाई नहीं।
सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या अमेरिका भविष्य में कृषि क्षेत्र के ​िलए कोई और रास्ता ढूंढेगा और दबाव डालकर दूसरे शब्दों का इस्तेमाल करेगा। वैश्विक उद्योग और व्यापार अनिश्चितता से भरा हुआ है। अमेरिका अपने घरेलू उपकरणों के ​िलए बाजार चाहता है और भारत अपनी स्वतंत्र नीति को बनाए रखना चाहता है। अमेरिका की चाल यह दिखाई देती है ​कि कृषि पर भारत की बातों को मानकर रूस से तेल की खरीदारी को पूरी तरह से रोकने की अपनी शर्त मनवा ले। वह चाहता है कि भारत अमेरिका आैर वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीदारी करे। भारत और यूरोपीय संघ की ट्रेड डील से अमेरिका भी दबाव में है। भारत अपने परखे हुए मित्र रूस को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहेगा।
भारत जैसे बड़े बाजार को छोड़ना अमेरिका के​ लिए भी आसान नहीं होगा। अमेरिका भारत के साथ ऐसी मनमानी नहीं कर सकता जैसा कि उसने अन्य देशों के साथ किया है। ​िफलहाल भारत के लिए साकारात्मक संकेत तो है लेकिन भारत को अमेरिका की फैक्ट शीट और व्यापार वार्ता से जुड़े बयानों के हर शब्द, हर पंक्ति और हर संशोधन पर पैनी नजर रखनी होगी। ट्रेड डील केवल व्यापार नहीं बल्कि सम्प्रभुत्ता का सवाल है। व्यापार वार्ता पर मार्च में अंतिम हस्ताक्षर होने हैं। तब तक भारत को पूरी तरह से सतर्क रहना होगा।

Aditya Chopra

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