हिमालय आैर तलहटी में आई भीषण बाढ़ से नेपाल में महाविनाश हो चुका है। जल प्रलय ने हजारों लोगों को पलभर में ही निगल लिया है और 300 से ज्यादा भारतीय पर्यटक अभी भी लापता हैं। भोटेकाेशी और त्रिशूली गलियारे में व्यापक क्षति हुई है, बस्तियां बह गई हैं। बहुमंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह गिरीं और हाइड्रोपाॅवर तथा अन्य बुनियादी ढांचे तबाह हो गए। नेपाल पर खतरा अभी भी टला नहीं है। चीन-नेपाल सीमा पर एक और झील फटने से दूसरी बार बाढ़ आने की चेतावनी दे दी गई है। नेपाल की त्रासदी हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की नाजुकता का स्मरण करा रही है।
हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन और हिमनद झीलों का टूटना कोई नई बात नहीं है। 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में भारी बारिश के कारण आई बाढ़ और भूस्खलन से मंदाकिनी और अलकनंदा घाटियों में हजारों लोगों की जान चली गई थी। पांच साल पहले उत्तराखंड के चमोली जिले में आए भीषण हिमस्खलन में 200 से अधिक लोग मारे गए थे और पनबिजली परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हो गई थीं। इस आपदा का संबंध हिमालयी घाटी में हुए हिमस्खलन से था। फिर, 2023 में सिक्किम में दक्षिण ल्होनक हिमनद झील के ढहने से तीस्ता घाटी में पानी की एक विशाल धारा बह निकली, जिसमें कम से कम 50 लोग मारे गए और बांधों, पुलों और सड़कों को नुकसान पहुंचा। हालांकि, इन आपदाओं और बुधवार की त्रासदी में एक महत्वपूर्ण अंतर है। बुधवार की त्रासदी मानसून के चरम मौसम में हुई, जब नदियों में पहले से ही पर्याप्त पानी होता है। उफनती नदी, जिसमें बड़े-बड़े पत्थर होते हैं, किनारों और ढलानों को काट सकती है और रास्ते में और अधिक मलबा जमा कर सकती है। इसी बीच नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने ने भारत और चीन से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों पर नेपाल के साथ मिलकर काम करने और एक पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने की अपील की है। भारत, चीन और नेपाल को िमलकर हिमालय का प्रबंधन करना बेहद जरूरी है। क्योंकि यह तीनों देश एक ही पर्वत प्रणाली का हिस्सा हैं। नेपाल की त्रासदी के बाद भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश में बाढ़ के खतरे ने यह स्पष्ट कर िदया है िक हिमालय में आने वाली आपदायें किसी भी देश की सीमाओं को नहीं देखतीं। जिस पानी ने लोगों की जानें ली हैं वह नहीं जानता कि यह िकसका इलाका है या वह किन लोगों को मार रहा है। रबी लामिछाने ने चेतावनी देते हुए कहा कि हिमालय हमारी संस्थाओं की तुलना में तेजी से बदल रहा है। उन्होंने भारत, चीन से सामूहिक कार्रवाई के लिए तत्काल आह्वान किया। हिमालय में जो भी िपघलता है वही समुद्र में आ जाता है। चीन, नेपाल, भारत आैर भूटान आपस में जुड़े हुए हैं आैर इन देशों का साझा अस्तित्व और भविष्य हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा पर निर्भर करता है।
नेपाल में आई बाढ़ के लिए चीन को जिम्मेदार माना जा रहा है। आरोप है कि अगर चीन नेपाल को पूर्व चेतावनी देता तो त्रासदी को कम किया जा सकता था। इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन हिमालय को टाइम बम बना रहा है। चीन हिमालय में महापरियोजनाओं का निर्माण कर रहा है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा के निकट तिब्बत के मेदोग काऊंटी में नदी पर िवद्युत परियोजना बनाई जा रही है। तिब्बत-नेपाल सीमा पर ग्यिरोंग बंदरगाह का विस्तार चीन बैल्ट एंड रोड परियोजना के तहत कर रहा है। त्रिशूली नदी और अन्य क्षेत्रों के आसपास हिमालयी ढलानों पर भारी इंजीनियरिंग काम हो रहा है। चीन ने नेपाल, भूटान और भारत के साथ िववादित सीमाओं पर िकलेबंद बस्तियां स्थापित कर ली हैं। चीन ल्हासा से यादोंग तक रेल लाइन बना रहा है। निर्माण में पहाड़ी सुरंगे खोदना और भूकम्पीय क्षेत्रों में विस्फोट शामिल है। सवाल उठ रहा है कि हिमालय की अपनी ढलानों पर चल रहे बड़े पैमाने के कटिंग, सुरंग निर्माण, सड़क विस्तार आदि ने प्राकृतिक जल निकासी को कितना बदल दिया है। अब यह जरूरी हो गया है कि भारत, चीन, नेपाल, भूटान एकीकृत कमान बनाकर काम करें और उपग्रहों के जरिये पिघलते ग्लेशियरों पर नजर रखें।
बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के बीच साझा पर्यावरण नीति तैयार करें। तीनों देश मिलकर नदियों के बहाव और पानी के स्तर पर रियल टाइम डेटा साझा करें। भले ही इन देशों में कई मुद्दों पर मतभेद हों लेकिन भविष्य में लोगों की बेशकीमती जिन्दगियों को बचाने के लिए परियोजनाओं के भूवैज्ञानिक खतरों का मूल्यांकन करना भी जरूरी है। हिमालय अब अस्थिर हो चुका है। इससे पहले कि कोई और बड़ी त्रासदी आए राजनीतिक मतभेदों को अलग रखकर हिमालय की परिस्थितिकी को बचाना इन देशों के लिए अनिवार्य है। भारत संकट की घड़ी में नेपाल के साथ खड़ा है आैर लगातार राहत सामग्री भेज रहा है। भविष्य में भारत को भी संवेदनशील क्षेत्रों में िनगरानी बढ़ानी होगी। क्योंकि त्रासदियां निष्क्रिय उपेक्षा का परिणाम होती हैं। यदि हमने तूफानों से लड़ना सीख लिया है तो फिर बाढ़ की त्रासदियों से भी निपटने के तरीके अपनाकर तबाही को कम किया जा सकता है।
हिमालय का प्रबंधन
Summary :
हिमालय आैर तलहटी में आई भीषण बाढ़ से नेपाल में महाविनाश हो चुका है। जल प्रलय ने हजारों लोगों को पलभर में ही निगल लिया है और 300 से ज्यादा भारतीय पर्यटक अभी भी लापता हैं। भोटेकाेशी और त्रिशूली गलियारे में व्यापक क्षति हुई है, बस्तियां बह गई हैं। बहुमंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह गिरीं और हाइड्रोपाॅवर तथा अन्य बुनियादी ढांचे तबाह हो गए। नेपाल पर खतरा अभी भी टला नहीं है। चीन-नेपाल सीमा पर एक और झील फटने से दूसरी बार बाढ़ आने की चेतावनी दे दी गई है। नेपाल की त्रासदी हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की नाजुकता…


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