हिंदी भवन में आयोजित हुआ उर्दू मुशायरा !

Summary :

जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने हिंदी भवन में उर्दू मुशायरे की अनुमति दे दी तो इससे कई बातें जग ज़ाहिर हुईं। पहली तो यह कि उर्दू आज भी सबके दिल की भाषा है, विशेषकर ग़ैर-मुसलमानों की। दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार में उर्दू के प्रति प्यार तो आवश्यक हो सकता है, वैमनस्य कदापि नहीं, जैसा कि आतिफ़ रशीद ने कहा है कि यदि उर्दू ख़ालिदा ख़ानम है तो हिंदी बेगम राजकुमारी। उर्दू अकादमी दिल्ली द्वारा हिंदी भवन, आईटीओ नई दिल्ली में जश्न-ए-आज़ादी के अवसर पर मुशायरे का आयोजन किया गया। देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रसिद्ध शायरों ने…

जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने हिंदी भवन में उर्दू मुशायरे की अनुमति दे दी तो इससे कई बातें जग ज़ाहिर हुईं। पहली तो यह कि उर्दू आज भी सबके दिल की भाषा है, विशेषकर ग़ैर-मुसलमानों की। दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार में उर्दू के प्रति प्यार तो आवश्यक हो सकता है, वैमनस्य कदापि नहीं, जैसा कि आतिफ़ रशीद ने कहा है कि यदि उर्दू ख़ालिदा ख़ानम है तो हिंदी बेगम राजकुमारी।
उर्दू अकादमी दिल्ली द्वारा हिंदी भवन, आईटीओ नई दिल्ली में जश्न-ए-आज़ादी के अवसर पर मुशायरे का आयोजन किया गया। देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रसिद्ध शायरों ने इसमें शिरकत की और बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोताओं के समक्ष अपना कलाम पेश किया। इसकी शुरुआत वंदे मातरम् और राष्ट्रगान से हुई। उर्दू के वे तमाम कद्रदान जो यह समझ रहे थे कि उर्दू ऑक्सीजन पर है या कोमा में जा चुकी है, उस समय गलत साबित हुए जब उन्होंने दिल्ली के हिंदी भवन के पूरी तरह भरे हुए सभागार की कुर्सियों और दीवारों से सटी मुशायरे का आनंद लुटने वाली उतनी ही बड़ी भीड़ को देखा। इस वार्षिक मुशायरे का आयोजन स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने तथा देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाता है, जैसे इस शेर में दिखाया गया है :
“आने वाली नस्लें तुम पर
फक्र करेंगी ऐ हिन्दोस्तां,
कि हमने तेरे दामन को
ख़ून से सींचा था!”
सच्ची बात है, आज़ादी की लड़ाई में जो भरपूर आंदोलन उर्दू भाषा का रहा है वह किसी और भाषा में नहीं, जैसे अशफ़ाक़ुल्ला खान का शेर है :
“वतन की राह में वतन के
नौजवान शहीद होंगे,
वतन के वास्ते हम अपनी
जान भी क़ुर्बान करेंगे!”
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष, आतिफ़ रशीद ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का पैग़ाम देते हुए कहा कि बक़ौल रेखा जी, उर्दू तो उनके दिल में निवास करती है, साझा विरासत की जुबान है और आपसी भाईचारे व हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए इसका बड़ा सहयोग और बलिदान है। दिल्ली में उर्दू के उत्थान के लिए आज कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। इस मुशायरे ने लाल किले के मुशायरे, शंकर-शाद मुशायरे, डेविकोस मुशायरे और जश्न-ए-बहार मुशायरे की याद दिला दी। साम्प्रदायिकता से पूरी तरह मुक्त वातावरण में उर्दू की लोकप्रियता का वास्तविक अंदाज़ा ऐसे ही आयोजनों में लगाया जा सकता है।
सीमाओं के आर-पार साझा संस्कृति और अंतरधार्मिक सौहार्द की भाषा उर्दू को राजनीतिक और धार्मिक वैमनस्य से उपजी बनावटी नफ़रत का खामियाज़ा भुगतना पड़ा है। उर्दू को पाकिस्तान और आतंकवाद से जोड़कर भी बहुत नुक्सान पहुंचाया गया। 1947 के बाद उर्दू को साम्प्रदायिक सोच का सामना करना पड़ा। भाषा के विरोधियों ने यह मान लिया कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार है। यह पूरी तरह गलत है-भाषाओं का न कोई धर्म होता है, न कोई क्षेत्र और न ही किसी एक समुदाय से उनका संबंध। प्रख्यात उर्दू विद्वान माजिद निज़ामी कहते हैं -उर्दू केवल शेर-ओ-शायरी, ग़ज़ल, क़व्वाली, मसनवी और मर्सिया का नाम नहीं है। यह हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है। उर्दू हमारे मानवीय मूल्यों और साझा संस्कृतियों से उपजे समन्वयवादी सांस्कृतिक परिवेश की भाषा है।
ऐतिहासिक रूप से उर्दू समाचार-पत्रों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय उद्देश्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उर्दू के महत्व को समझते हुए राष्ट्रीय नेताओं ने “इंकलाब ज़िंदाबाद” जैसे सुभाष चंद्र बोस के नारों, राम प्रसाद बिस्मिल की “सरफरोशी की तमन्ना” और इकबाल की “सारे जहां से अच्छा” जैसी रचनाओं को अपनाया। उर्दू केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि यह एक प्रिय संस्कृति और जीवन जीने का एक तरीका है।” सभी शायरों ने शानदार अशआर पेश किए, जिन पर श्रोताओं की ओर से लगातार “मुकर्रर”, “सुभानअल्लाह”, “लाजवाब”, “बेहतरीन” जैसे उद्गार सुनाई देते रहे और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा वातावरण गूंजता रहा। यही असली भारत की पहचान है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का पैग़ाम है “उर्दू प्रेम की भाषा है, जहां दर्द भी काव्यात्मक सुनाई देता है। यह केवल संवाद नहीं करती, बल्कि सम्मोहित कर लेती है। देशभर के शायरों को इस मुशायरे के मंच पर लाकर हम अपनी राष्ट्रीय विरासत के विभिन्न सूत्रों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं।’’

फिरोज बख्त अहमद