भारत में छात्रों और युवाओं में आत्महत्या गम्भीर चिंता का विषय बन चुकी है। परीक्षा में असफलता आईआईटी, आईआईएम में अकादमिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता प्रमुख कारण तो है ही लेकिन इसके साथ ही निराशा, हताशा और अवसाद भी मनोवैज्ञानिक कारण है। अगर आंकड़ों की बात करें तो भारत में प्रतिवर्ष 13 हजार से अधिक छात्र आत्महत्या करते हैं। हर छात्र की मौत एक खामोश चीख है। एक ऐसी चीख जो एक राष्ट्र के रूप में हम सभी को झकझोर देती है। इसके बावजूद उच्च शिक्षा में आत्महत्याओं की रोकथाम के लिए अभी तक कोई ढांचा मौजूद नहीं है जो संस्थागत विफलता को उजागर करता है। आईआईटी दिल्ली के परिसर में इमारत की छठी मंजिल से कूदकर एमएससी भौतिकी के छात्र ऋषिकेश ने आत्महत्या कर ली। 2023 के बाद संस्थान में यह आठवीं आत्महत्या है। ऋषिकेश की आत्महत्या के बाद संस्थान के छात्र आक्रोिशत हो उठे। इस साल संस्थान में यह आत्महत्या का दूसरा मामला है। मार्च महीने में भी परिसर में स्थित एक अपार्टमैंट में 19 वर्षीय छात्र मृत पाया गया। आक्रोशित छात्रों ने छात्र कल्याण िवभाग की एसोसिएट डीन प्रोफैसर के इस्तीफे, मौतों की जांच और मृतक छात्र के परिवार के लिए एक करोड़ रुपए की मांग को लेकर प्रदर्शन भी किया।
छात्रों ने आरोप लगाया कि संस्थान का प्रशासन संवेदनशील और उदासीन हो चुका है। जब छात्र अपनी समस्याओं के बारे में बात करने की कोशिश करते हैं तो उनसे कहा जाता है कि आप सामना नहीं कर सकते तो आप को चले जाना चाहिए। प्रशासन में सहानुभूति नाम की कोई भावना नहीं है। यद्यपि प्रशासन ने ऋषिकेश की मां को 6 लाख रुपए के साथ-साथ सभी िचकित्सा देने का ऐलान किया लेकिन एक अकेली मां उस पैसे का क्या करेगी जिसका एक मात्र सहारा बेटा छिन गया। वो पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रही थी। आत्महत्या करने वाले छात्र ने इस साल की शुरूआत में अपने पिता की मृत्यु के बाद मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण एक सैमेस्टर के लिए पढ़ाई छोड़ दी थी। उसका इलाज भी चला आैर एक महीने बाद वह छात्रावास में लौट भी आया था लेकिन उसका नाम छात्रावास के रिकॉर्ड से हटा दिया गया था। उसे दोबारा छात्रावास में जगह नहीं दी गई और अंततः उसने अपनी मां के साथ किराये का मकान लिया। निश्चित रूप से छात्र मानसिक दबाव में रहा होगा। स्टूडैंट अफेयर ऑफिस ने ऋषिकेश के साथ मोरल प्रोफाइलिंग की थी। छात्रावास का कमरा न देना, प्रोजैक्ट न िमलना और प्रशासनिक फैसलों ने उसको मानसिक रूप से तोड़ा और इससे उसकी गरिमा को ठेस पहुंची।
संस्थान के छात्र मैंटल हैल्थ व्यवस्था पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि 30 महीनों में आईआईटी दिल्ली परिसर में आठ छात्रों की आत्महत्या के बाद मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बनाई गई विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और उस पर उठाए गए कदमों की जानकारी सार्वजनिक की जाए। जिन राज्यों में बड़ा शैक्षणिक तंत्र मौजूद है या फिर वे क्षेत्र जहां सरकारी नियंत्रण से बाहर शिक्षा की होड़ आैर प्रतिस्पर्धा सबसे तेज है वहां एक जैसे पैटर्न उभरते हैं। यािन ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पढ़ाई के िलए जाने वाले छात्र, जाति-आधारित भेदभाव जो अलग-अलग तरीकों से उन्हें “प्रतिष्ठित” संस्थानों से बाहर धकेलता है। अगर वे वहां पहुंच भी पाते हैं और परिवार की आर्थिक चिंताओं का वह दबाव जो न सिर्फ किसी युवा की स्कूल चुनने की स्वतंत्रता छीन लेता है, बल्कि उनके लिए स्कूल का अनुभव भी बोझिल बना देता है। जब छात्र परिवार से “स्कूल का दबाव” छिपाते हैं तो वे अपनी सारी घबराहट और चिंता उसी सीखने के माहौल में लेकर आते हैं जो अंततः उन्हें और असुरक्षित बनाता है। एनसीआरबी यह सवाल नहीं पूछता कि “शैक्षणिक दबाव” क्या सचमुच सब पर बराबर पड़ता है जबकि सच यह है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
पिछले साल, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से अविभाज्य है और यह भी कहा कि आत्महत्या रोकथाम के लिए एक एकीकृत, लागू करने योग्य ढांचे के संबंध में देश में विधायी और नियामकीय अभाव है। कठोर परीक्षा प्रणाली, माता-पिता की अपेक्षाएं, व्यक्ति की सीमाएं और असफलता का भय युवा मन पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि छात्र आत्महत्याओं को केवल आंकड़ों तक सीमित कर दिया गया है और समाज इन त्रासदियों के प्रति उदासीन होता जा रहा है। सफलता को प्राथमिकता देने और वैकल्पिक करियर के रास्ते बंद करने वाली संपूर्ण शिक्षा प्रणाली इस दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार है। बढ़ती आकांक्षाओं और घटते अवसरों के बीच असंतुलन ने भारी तनाव पैदा कर दिया है-युवाओं के लिए एक तनावपूर्ण स्थिति। इसे एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देखा जाना चाहिए जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। माता-पिता को भी अपने बच्चों के करियर विकल्पों और योग्यता पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए और उन्हें कठिन परिस्थितियों में नहीं धकेलना चाहिए। सरकार की एक मजबूत निगरानी तंत्र लागू करने और छात्रों में चिंता कम करने के लिए कुछ सहायता संरचनाएं बनाने में निवेश करने की आवश्यकता है। कार्य बल ने छात्रवृत्ति वितरण में व्यापक देरी, अनियमितताओं और असमानताओं को एक प्रमुख कारण के रूप में पहचाना है जो आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के तनाव को बढ़ा रहा है। छात्रों की आत्महत्याएं व्यक्तिगत संकट नहीं बल्कि सामूहिक उपेक्षा आैर अपर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य ढांचे की अभिव्यक्ति है। पूर्व न्यायाधीश एस. रवीन्द्र भट्ट की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त छात्र आत्महत्याओं पर राष्ट्रीय कार्य बल ने इन त्रासदियों को व्यक्तिगत समस्या के रूप में नहीं बल्कि संस्थागत, सामाजिक और सांस्कृतिक पतन का परिणाम माना है और कार्य बल ने स्थायी समाधान की ओर बढ़ने के लिए संस्थागत ढांचे की स्थापना पर बल दिया था लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
एक खामोश चीख
Summary :
भारत में छात्रों और युवाओं में आत्महत्या गम्भीर चिंता का विषय बन चुकी है। परीक्षा में असफलता आईआईटी, आईआईएम में अकादमिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता प्रमुख कारण तो है ही लेकिन इसके साथ ही निराशा, हताशा और अवसाद भी मनोवैज्ञानिक कारण है। अगर आंकड़ों की बात करें तो भारत में प्रतिवर्ष 13 हजार से अधिक छात्र आत्महत्या करते हैं। हर छात्र की मौत एक खामोश चीख है। एक ऐसी चीख जो एक राष्ट्र के रूप में हम सभी को झकझोर देती है। इसके बावजूद उच्च शिक्षा में आत्महत्याओं की रोकथाम के लिए अभी तक कोई ढांचा मौजूद नहीं है…


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