आज होलिका का रंगोत्सव है जिससे पूरा देश सराबोर नजर आ रहा है। यह फाल्गुन उत्सव भारत में बसन्त ऋतु की छटा बिखेरते हुए आता है और महाशिवरात्रि के दिन से पूरी भारतीय संस्कृति ‘मदनोत्सव’ के सुरूर में डूबने लगती है परन्तु इस वर्ष की होली एेसे समय में हो रही है जब पूरे विश्व में भारी राजनीतिक व सामरिक उथल-पुथल मची हुई है जिसके प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं है। पूरे पश्चिम एशिया के देशों पर य़ुद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और एेसा लग रहा है कि देर-सवेर पूरा विश्व ही कहीं इसकी चपेट में न आ जाये। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि ईरान देश को लेकर विश्व शक्ति अमेरिका का नजरिया पिछले ढाई दशक से जिस प्रकार का रहा है उससे दुनिया के इस क्षेत्र खास कर खाड़ी के मुस्लिम अरब देशों की राजनीति में भी खासा परिवर्तन आ चुका है। जहां तक भारत का सम्बन्ध है तो सत्तर के दशक से ही वह इस बारे में तब से संदिग्ध रहा है जब से उसने हिन्द महासागर क्षेत्र में स्थित टापू ‘दियेगो गार्शिया’ को पश्चिमी यूरोपीय देशों का सैनिक अड्डा बनाने का विरोध किया था।
भारत तब यह मांग पुरजोर तरीके से कर रहा था कि हिन्द महासागर क्षेत्र को ‘अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति क्षेत्र’ घोषित किया जाये परन्तु कालान्तर में जिस तरह से घटनाओं ने मोड़ लिया उसकी वजह से दियेगो गार्शिया सैनिक अड्डा बन गया और अरब सागर व हिन्द महासागर क्षेत्र में अमेरिका व चीन के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा का माहौल बनता चला गया। इसके बाद अमेरिका ने पश्चिम एशिया के विभिन्न मुस्लिम देशों में अपने सैनिक अड्डे स्थापित करने शुरू किये और आज स्थिति यह है कि इसके इन देशों में 27 सैनिक आधार हैं। अतः ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध में हमें इन सैनिक अड्डों में से कुछ पर ईरानी आक्रमण की खबरें मिल रही हैं। दरअसल पूरे पश्चिम एशिया में होली के इस मौके पर गोला-बारूद का खूनी खेल हो रहा है जिसकी वजह से भारत में भी इसकी पीड़ा देखी जा रही है। हम भारतीयों के लिए होली न केवल पृथ्वी लोक में आनन्द व प्रसन्नता की सौगात लेकर आती है, बल्कि देवलोक तक में इसकी अद्भुत छटा बिखरती है। इसी वजह से होलिका के पांच दिन बाद रंग पंचमी का त्यौहार आता है जिसे देव होलिका भी कहा जाता है। इस दिन देवता भाव-विभोर होकर रंग उत्सव मनाते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में मानवों के प्रेम व उल्लास के पर्वों को देवताओं द्वारा मनाने की भी परंपरा है। इसी कारण से कार्तिक मास की अमावस्या को जब देशभर में दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है तो उसके ठीक 15 दिन बाद पूर्णिमा के दिन देव दीपावली का त्यौहार आता है। इस दिन समूचे आकाश मंडल में विभिन्न नक्षत्रों के प्रकाश में वृद्धि होती नजर आती है और माना जाता है कि देवलोक दीपावली का पर्व मना रहा है। इसी क्रम में होली के भी देवताओं द्वारा मनाने की मान्यता है जिससे पता चलता है कि भारत की हिन्दू संस्कृति में आत्मा-परमात्मा का मिलन केवल पारलौकिक उपदेश ही नहीं बल्कि इसकी छाया हमें ‘इह लोक’ में भी देख सकते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यदि हम विश्व की वर्तमान परिस्थितियों का आंकलन करें तो पायेंगे कि ईरान व इजराइल के बीच चल रहा युद्ध मानव सभ्यता से प्रेम व स्नेह और उल्लास के भाव को विस्मृत करने का प्रयास है जिसका प्रतिकार भारतीय संविधान तक में किया गया है।
संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत वैश्विक धरातल पर विवादों और संघर्ष को समाप्त करने के लिए बातचीत द्वारा शान्तिपूर्ण हल के लिए प्रयासरत रहेगा। यह सिद्धान्त हमें भगवान बुद्ध के उपदेशों से मिला है और भारत की विदेश नीति का अविभाज्य अंग रहा है। मगर बुद्ध काल के पहले से ही है भारतीय संस्कृति की संरचना में प्रेम व स्नेह का मूल स्थायी भाव इस प्रकार रहा है कि इस देश के सभी पर्व व त्यौहार कहीं न कहीं प्रकृति के उस बदलते स्वभाव से मेल खाते रहे हैं जो इस सृष्टि की जीवन्तता के लिए आवश्यक होते हैं। होली का पर्व एेसे समय में आता है जब किसानों की फसल खेतों में पक कर तैयार खड़ी होती है। यह मानव जीवन में उल्लास भरती है और मेहनत का फल देने की इच्छा को जागृत करती है जिसका प्रसाद केवल प्रेम की छटा बिखेर कर ही प्राप्त किया जा सकता है। यही वजह है कि भारत के विभिन्न पर्व धर्म की अधर्म पर विजय से जुड़ा हुआ है क्योंकि केवल धर्म ही मनुष्य के जीवन में प्रेम व उत्साह का संचार कर सकता है। भारत में धर्म का अर्थ पूजा पद्धति से न होकर कर्त्तव्य बोध से होता है। अतःधर्म वही होता है जिस पर चलकर मनुष्य अपने दायित्व का निर्वाह करता है और इसमें बिना प्रेम व शान्ति के मनुष्य का जीवन हिंसा व क्रूरता का अभिशाप बन जाता है जिसे असुर संस्कृति भी कहा जाता है। अतः यह अकारण नहीं है कि होली पर हम होलिका दहन करके असुर संस्कृति के विनाश का संकल्प करते हैं और दशहरे पर रावण को फूंक कर दानवीय वृत्तियों के खात्मे का वचन भरते हैं। इस दृष्टि से देखें तो पश्चिम एशिया में आज जो वातावरण बना हुआ है उसे केवल भारतीय संस्कृति के मानकों से ही दुरुस्त किया जा सकता है और ईरान व अमेरिका को वार्ता की मेज पर लाकर युद्ध की विभीषिका से बचा जा सकता है परन्तु भीषण युद्ध तो छिड़ चुका है जिसके जल्दी ही समाप्त होने की संभावना इसलिए नजर नहीं आती है क्योंकि इसमें ईरान की अस्मिता ही दांव पर लग चुकी है और बदले में ईरान ने पूरे पश्चिम एशिया को ही अपने निशाने पर ले लिया है। इस मुद्दे पर भारत में भी राजनीति शुरू हो गई है मगर हमें केवल यह देखना है कि किसी भी सूरत में वह मानवता चीत्कार न कर उठे जिसका अवलम्ब केवल प्रेम व स्नेह होता है क्योंकि भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर विश्वास करने वाला दुनिया का एकमात्र देश है।
होली और प. एशिया युद्ध
Summary :
आज होलिका का रंगोत्सव है जिससे पूरा देश सराबोर नजर आ रहा है। यह फाल्गुन उत्सव भारत में बसन्त ऋतु की छटा बिखेरते हुए आता है और महाशिवरात्रि के दिन से पूरी भारतीय संस्कृति ‘मदनोत्सव’ के सुरूर में डूबने लगती है परन्तु इस वर्ष की होली एेसे समय में हो रही है जब पूरे विश्व में भारी राजनीतिक व सामरिक उथल-पुथल मची हुई है जिसके प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं है। पूरे पश्चिम एशिया के देशों पर य़ुद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और एेसा लग रहा है कि देर-सवेर पूरा विश्व ही कहीं इसकी चपेट में न आ…


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