मुझे लगभग 23 साल होने जा रहे हैं बुजुर्गों की सेवा करते हुए। मैंने लाखों बुजुर्गों और उनके बहू-बेटे, बेटियों के रिश्तों को अनुभव किया है। क्योंकि बुजुर्ग आते हैं, जाते हैं (स्वर्ग सिधारते हैं) अपनी अमिट यादें, अपने अनुभव हमारे सामने छोड़ जाते हैं। कुछ दिन पहले एक समाचार मेरे सामने आया कि एक प्रसिद्ध डॉक्टर जो अब बुजुर्ग हो चुके हैं उनका बेटा-बेटी आस्ट्रेलिया में सैटल हैं, परन्तु बूढ़े मां-बाप जिन्होंने उन्हें बड़ी मेहनत से पाला-पोसा, बाद में उन्हें अकेला भारत में छोड़कर चले गए। वो बहुत गंदी हालत में रह रहे थे, जब पड़ोसियों को बहुत बदबू आई तो उन्होंने उनकी खबर ली। पत्नी मर चुकी थी और पिता अपनी गंदगी के साथ गंदे-सड़े कपड़ों में लेटे हुए थे, जिनको बड़ी मुश्किल से पड़ोसियों ने सम्भाला और अभी मालूम पड़ा कि वो भी स्वर्ग सिधार गए हैं। ऐसे बेटे-बेटी को क्या कहूं। अक्सर कहा जाता है बेटे तो बदल जाते हैं परन्तु बेटियां नहीं, पर यहां तो बेटी का बुरा हाल है। मुझे नहीं मालूम वो अपने बच्चों को क्या शिक्षा देंगे और उनसे क्या उम्मीद रखेंगे। मेरे हिसाब से तो इतिहास दोहराता है। या कोई भी किसी का दिल दुखाता है या आह लेता है उसे भुगतना पड़ता है और बच्चों के मामले में तो मैंने अक्सर देखा जो बोओगे वही काटोगे। एक तरफ बुरे बेटे-बेटियों की खबर आती है तो दूसरी तरफ श्रवण पुत्र या राम जैसे पुत्रों बहुंओं, बेटों, बेटियों की भी कमी नहीं। बहुत से ऐसे उदाहरण भी मेरे सामने आते हैं जिनको देखकर या उनके बारे में सुनकर भी गर्व महसूस होता है। पिछले दिनों की बात है बहुत बड़े उद्योगपति इनोक्स के मालिक देवेन्द्र कुमार जैन जी का देहांत हुआ। बहुत ही नेक इन्सान थे। जैसा कि आप सबको मालूम है मैं बुजुर्गों के साथ-साथ चौपाल नामक संस्था द्वारा जिसकी मैं चीफ पैटर्न हूं, उनके साथ मिलकर जरूरतमंद महिलाओं, लड़कियों को आत्मनिर्भर यानी अपने पांवों पर खड़े होने में मदद करने में भी सहायता करती हूं, जो संस्था देवेन्द्र जैसे लोगों की मदद से चलती है, जहां वे लोग धनराशि देते हैं और उस धनराशि से जरूरतमंद लड़कियों को स्वावलम्बी बनाने के लिए दिया जाता है और उन्हें वो राशि वापिस लौटानी होती है तथा उस राशि से और अन्य लड़कियों की मदद की जाती है, जिससे यह चेन चलती है तथा आगे बढ़ती जा रही है। लगभग 42,000 लड़कियों की सहायता हो चुकी है। ऐसे देवेन्द्र जैन जी जब दुनिया से चले गए तो लगा कि यह सहायता अब नहीं मिलेगी परन्तु उनके बेटे विवेक जैन, बहू नंदिता जैन, बेटी मंजू जैन, दामाद अरुण जैन आगे आए और उनकी बहू ने भरे हॉल में घोषणा की कि जैसे बाबू जी सहयोग करते थे वैसे ही वो करते रहेंगे। वाह! क्या बात है, ऐसे बहू, बेटा, बेटी, दामाद हर घर को मिलें। मैं जब उनके घर गई थी अब भी मुझे बड़ा अच्छा संस्कारिक वातावरण मिला। उनकी बहू, बेटी में मैंने बहुत संस्कार देखे, मुझे बहुत अच्छा लगा।
ऐसे ही हमारे वरिष्ठ नागरिक केसरी के बहुत से सदस्य हैं, जो चले गए परन्तु उनकी बहुएं, बेटे आगे आकर वैसे ही सहायता करते हैं। क्योंकि मैंने दोनों कामों को करते देखा है। बुजुर्गों के लिए कम लोग आगे आते हैं, परन्तु कई बहुएं ऐसी हैं जैसे पंजाबी बाग ब्रांच की सीमा अग्रवाल चली गईं परन्तु उनकी बहू मोनिका अग्रवाल आगे आकर वैसे ही बुजुर्गों को एडोप्ट कर रही हैं। वैसे ही मनोज सिंघल अपनी मां मालती सिंघल के जाने के बाद बुजुर्गों की सहायता कर रहे हैं। यही नहीं मोनिका अग्रवाल अपनी सासू मां का जन्मदिन भी ब्रांच में आकर मना रही हैं। ऐसे ही तलवार परिवार जिनकी तीसरी पीढ़ी आकर सेवा कर रही है, योगदान दे रहे हैं। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिनकी दूसरी, तीसरी पीढ़ी आकर योगदान दे रही है।
कहने का भाव यह है ऐसे बेेटे-बेटियां भी हैं जो जीते जी तो मां-बाप की सेवा करते ही हैं, उनके जाने के बाद भी उनकी सेवा, उनकी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं। सो आज के युग मेें बेटे-बेटियां हद से बुरे भी हैं और बड़ी हद से अच्छे भी हैं।
आज के युग में बेटे-बेटियां और बहुएं…
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मुझे लगभग 23 साल होने जा रहे हैं बुजुर्गों की सेवा करते हुए। मैंने लाखों बुजुर्गों और उनके बहू-बेटे, बेटियों के रिश्तों को अनुभव किया है। क्योंकि बुजुर्ग आते हैं, जाते हैं (स्वर्ग सिधारते हैं) अपनी अमिट यादें, अपने अनुभव हमारे सामने छोड़ जाते हैं। कुछ दिन पहले एक समाचार मेरे सामने आया कि एक प्रसिद्ध डॉक्टर जो अब बुजुर्ग हो चुके हैं उनका बेटा-बेटी आस्ट्रेलिया में सैटल हैं, परन्तु बूढ़े मां-बाप जिन्होंने उन्हें बड़ी मेहनत से पाला-पोसा, बाद में उन्हें अकेला भारत में छोड़कर चले गए। वो बहुत गंदी हालत में रह रहे थे, जब पड़ोसियों को बहुत बदबू…


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