विषधर! मेरे पहलू में एक दोस्त बनकर आए थे तुम
पर डंसना तेरी फितरत थी, तुझे चाहना मेरी मजबूरी
आखिरकार इतने वर्षों बाद बीएमसी में ठाकरे परिवार का सितारा अस्त हो गया, भाजपा वाले तहे दिल से इसके लिए राज ठाकरे का शुक्रिया अदाकर रहे हैं। ठाकरे परिवार के ’हिंदुत्व’ पर पहली बार भाजपा के ‘हिंदुत्व’ का सिक्का चल गया। बीएमसी चुनाव शिवसेना उद्धव के अस्तित्व के लिए एक अग्नि परीक्षा समान था, क्योंकि बीएमसी का बजट इतना बड़ा था कि उद्धव को पार्टी चलाने के लिए ईंधन वहीं से प्राप्त होता था। सूत्रों की मानें तो बीएमसी चुनाव से ऐन पहले उद्धव व राज ठाकरे की मौजूदगी में उनके कोर ग्रुप की एक अहम बैठक आहूत हुई थी। जिसमें माना जाता है कि उद्धव ने राज से आग्रह किया कि उन्हें न तो उत्तर भारतीयों के खिलाफ, न ही दक्षिण भारतीयों या फिर गुजरात के लोगों के खिलाफ किसी भी प्रकार की अभद्र भाषा का उपयोग करना है, क्योंकि यह अब पहले वाली मुंबई नहीं रह गई है, जिस पर 70 फीसदी मराठी लोगों का दबदबा है। अब यह बराबर का आंकड़ा है, पर राज ठाकरे कहां अपनी आदत से बाज आने वाले थे वे तो ‘लुंगी को पंूगी बनाने की रसमलाई’ आस्वादन में जुट गए। फिर जो नतीजे आए गैर मराठी इलाकों मसलन उत्तर व पूर्वी मुंबई से शिवसेना उद्धव और मनसे साफ हो गई। हां, मराठी बहुल दक्षिण व सेंट्रल मुंबई ने इन दोनों भाइयों की बची-खुची इज्जत बचा ली, पर 65 सीट जीत कर भी उद्धव की पार्टी के जीत का स्ट्राइक रेट जहां मात्र 39 फीसदी रहा, भाजपा ने अपना स्ट्राइक रेट 66 फीसदी कर लिया, वहीं बड़बोले व बददिमाग राज ठाकरे की पार्टी का स्ट्राइक रेट महज़ 11 फीसदी रहा। अपने दम पर लड़ रही कांग्रेस ने 16 फीसदी स्ट्राइक रेट के हिसाब से दलित व मुस्लिम इलाकों में अच्छा प्रदर्शन किया, वह 24 सीट जीत गई। उद्धव ने राज से यह भी आग्रह किया था कि वह कम सीटों पर चुनाव लड़ लें, पर राज 53 सीटों की डिमांड पर अड़ गए थे। अब उद्धव को लग रहा है कि उन्हें राज के बजाए कांग्रेस के साथ जाना चाहिए था, तब शायद उनकी इतनी बुरी हालत नहीं होती और राज भी तब अकेले लड़ते और 1-2 सीटों पर सिमट जाते और तब शायद राज को उनकी असली औकात का अंदाज़ा भी हो जाता।
घर का भेदी थरूर कहलाए
केरल कांग्रेस कोर कमेटी की एक अहम बैठक आहूत थी, जो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी की रणनीति तय करने के लिए बुलाई गई थी। इस बैठक में शशि थरूर को आमंत्रित ही नहीं किया गया था। इस बात को लेकर शशि थरूर ने जमीन-आसमान एक कर दिया कि उन्हें भी बैठक में शामिल होना है। इसके बाद केरल कांग्रेस प्रमुख के.सुधाकरन ने फौरन दिल्ली बात की और उन्हें इस पूरे वाकये से अवगत कराया। दिल्ली के कहने पर शिश थरूर को उस जरूरी मीटिंग का हिस्सा बना लिया गया। कहते हैं उस बैठक में कांग्रेस के मात्र 14 नेता शामिल थे, जिन्हें साफ ताकीद दी गई थी कि इस मीटिंग के बारे में किसी को भी मीडिया से कोई बात नहीं करनी है और न ही कोई बयान देना है, क्योंकि यहां आगामी चुनाव को लेकर पार्टी की अहम चुनावी रणनीति के बारे में बात हो रही है। पर आदत से मजबूर थरूर ने कुछ लोकल चैनल से बात कर ली, उन्हें पार्टी की अहम रणनीतियों के बारे में ज्यादा कुछ तो नहीं बताया, पर जब अगले दिन का अखबार आया तो उसमें उस बैठक की पूरी रिपोर्ट आद्योपांत छपी थी, हर छोटी-बड़ी डिटेल्स के साथ। कांग्रेस के आला नेताओं के मुंह खुले रह गए, फौरन दिल्ली शिकायत की गई, यह मोर्चा केसी वेणुगोपाल ने संभाला तो पार्टी अध्यक्ष खड़गे के ऑफिस से वेणुगोपाल से कहा गया ’आइंदा से इन्हें (थरूर को) किसी मीटिंग में बुलाने की कोई जरूरत नहीं है, इस बात का सदा ध्यान रखा जाए।’
बीजू जनता दल में बगावत
बीजू जनता दल ने अपने पटकुरा विधानसभा से विधायक अरविन्द महापात्रा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। सनद रहे कि अरविन्द ओडिशा के वरिष्ठ राजनेता बिजॉय महापात्रा के पुत्र हैं, बिजॉय महापात्रा बीजू जनता दल के को-फाऊंडर रहे हैं और 2000 में नवीन पटनायक ने इनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। दरअसल अपने खराब स्वास्थ्य के मद्देनज़र नवीन पटनायक इन दिनों बीजद के लिए काफी कम समय निकाल पाते हैं, राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी लगता है कि धीरे-धीरे बीजद भी एक डूबते जहाज में शुमार होता जा रहा है। सो, कई लोग जो पुराने जनता दल की पृष्ठभूमि से हैं वे राज्य में एक गैर भाजपा व गैर कांग्रेस दल के गठन के पक्षधर हैं। माना जाता है कि अरविन्द महापात्रा ने इसकी पहल की और उनके आवास पर बीजद के 18 विधायक जुटे जिन्होंने एक नए दल के गठन पर अपनी सहमति दर्ज कराई। समझा जाता है कि आने वाली गर्मियों तक इस नए दल का ऐलान हो सकता है। यह खबर जब नवीन पटनायक को लगी तो उन्होंने आनन-फानन में अपनी पार्टी के दो विधायकों यानी अरविन्द महापात्रा और सनातन महाकुड को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया। पर पार्टी में बगावत की लुती तो लग चुकी है।
क्या धामी को अभयदान मिल गया है?
एकबारगी फिर से जब अंकिता हत्याकांड मामले को लेकर उत्तराखंड सुलग रहा है, इसकी तपिश भगवा आभामंडल को बेतरह झकझोर रही है और ऐसे में कयासों के बाजार गर्म थे कि क्या इस मामले में भाजपा ने मुख्यमंत्री धामी के रूप में बलि का बकरा ढूंढ लिया है? यहां तक कि धामी के उत्तराधिकारियों के नाम भी सियासी हलकों में मचलने लगे थे। इसी बीच धामी दिल्ली जाते हैं, माना जाता है कि एक तरह से उन्हें अभयदान मिल गया लगता है। सूत्रों का दावा है कि धामी ने अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं के बकायदा नाम लिए और अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि ये लोग हैं (मसलन रितु खंडूरी, अनिल बलूनी आदि) जो इन्हें ठीक से काम नहीं करने दे रहे और न ही इस वज़ह से वे अपने मंत्रिमंडल का पूर्ण विस्तार ही कर पा रहे हैं। सनद रहे कि वहां की विधानसभा स्पीकर रितु खंडूरी को पार्टी के केंद्रीय महामंत्री बीएल संतोष का पूरा समर्थन हासिल है, पार्टी के एक बड़े नेता भी रितु खंडूरी को राज्य की अगली मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं, इस मुहिम को भाजपा के बड़े नेताओं का भी समर्थन प्राप्त बताया जाता है। वहीं एक और नेता हैं धन सिंह रावत जो गुजरात लॉबी के सहारे खुद को मुख्यमंत्री पद की रेस में बरकरार रख रहे हैं, अनिल बलूनी तो हमेशा की तरह एक शाष्वत उम्मीदवार हैं। सौरभ बहुगुणा भी इस बहती गंगा में हाथ धोने को आतुर हैं। कहते हैं धामी ने इन नेताओं के कारनामों की एक मोटी फाइल ऊपर तक पहुंचा दी है और साथ ही अपनी मंशा भी स्पष्ट कर दी है कि ‘अगर भाजपा भ्रष्टाचार से कोई समझौता न करने की अपनी घोषित नीति के साथ ही आगे बढ़ना चाहता है तो फिलवक्त उनके पास धामी से साफ-सुथरा कोई दूजा चेहरा नहीं है।’ समझा जाता है कि अब पार्टी की ओर से भी धामी को इशारा मिल गया है कि वे गुजरात मॉडल की तर्ज पर ही अब अपने मंत्रिमंडल को नया चेहरा-मोहरा प्रदान कर सकते हैं, सो, धामी गुजरात मॉडल को उत्तराखंड में दुहराने की तैयारियों में जुट गए हैं, भले ही उत्तराखंड में सड़क पर जनता हो, पर धामी की हर सड़क दिल्ली तक जाती है, क्योंकि देवभूमि में इन दिनों आवाजें हिरासत में मौन हैं।
भाजपा में ओबीसी नेताओं का उभार
भाजपा आज की तारीख में सबकी पार्टी है। हर धर्म हर जात को तवज्जो मिल रही है। पीएम मोदी पिछड़ों की राजनीति के नए चैंपियन बन कर उभरे, उनकी इसी सोच की बदौलत विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में भी पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले नेताओं की निकल पड़ी। मिसाल के तौर पर बिहार में सम्राट चौधरी, यूपी में केशव प्रसाद मौर्य या फिर हरियाणा में नायब सिंह सैनी। एक मजे की बात देखिए कि सम्राट, मौर्य व सैनी के आपसी रिश्ते भी बेहद मधुर, दोस्ताना व सामंजस्यपूर्ण हैं। इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में जब तारापुर में सम्राट जमीन पर थोड़े कमजोर दिख रहे थे तो स्वयं योगी आदित्यनाथ ने उन्हें फोन कर चुनाव प्रचार के लिए तारापुर आने की इच्छा व्यक्त की थी, पर चतुर सुजान सम्राट इस प्रस्ताव को हवा में उड़ा गए, बोले- ‘मेरी सीट तो निकल ही रही है, आपको वहां जाना चाहिए जहां हमारे उम्मीदवार कांटे की लड़ाई में फंसे हैं।’ इसी तरह जब सम्राट के पुत्र का एडमिशन झारखंड स्थित देवघर के ‘आरके मिशन स्कूल’ में नहीं हो पा रहा था तो सीधे हेमंत सोरेन के दखल से यह मुमकिन हो पाया। जब नितिन नबीन को यूं अचानक भाजपा का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष घोषित किया गया तो जब नबीन को पहली बार दिल्ली से पटना आना था तो सम्राट चौधरी भी सीधे दिल्ली पहुंच गए और नबीन के साथ उसी फ्लाइट से पटना एयरपोर्ट उतरे। जब पूर्ण पार्टी अध्यक्ष चुने जाने से महज़ पांच दिन पहले नितिन नबीन को अपने चूड़ा-दही के भोज के सिलसिले में फिर से पटना जाना था तो बकायदा भाजपा के तमाम सीनियर नेताओं को पहले से दिल्ली का संदेश चला गया कि उन्हें अपने अध्यक्ष की अगवानी के लिए पटना एयरपोर्ट पर हाजिरी लगानी होगी, सो वहां सम्राट को भी आना पड़ा और नित्यानंद राय को भी। वहीं यूपी के एक और पिछड़ी जाति के नेता पंकज चौधरी, जिन्हें यूपी प्रदेश भाजपा का हालिया दिनों में मुखिया बनाया गया है, शायद उनसे कहा गया है कि वे मोदी सरकार में मंत्री रहते हुए यूपी भाजपा की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं।
कुलदीप का क्या होगा?
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के सुपुत्र और पल-पल अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलने में माहिर कुलदीप बिश्नोई इन दिनों अपनी राजनीतिक निर्वासन से खासे आहत जान पड़ते हैं। काफी अरमान लेकर वे भाजपा के पाले में आए थे, पर उन्हें यहां कुछ खास मिला नहीं। उनके पुत्र अजय भव्य बिश्नोई को भले ही इस दफे भाजपा ने विधानसभा चुनाव का टिकट दे दिया था, पर इस बार यानी 2024 के विधानसभा चुनाव में वे आदमपुर सीट से चुनाव हार गए। जबकि नवंबर 2022 के विधानसभा के उपचुनाव में वे इसी सीट से विजयी हुए थे, भव्य 2024 तक हरियाणा विधानसभा के सबसे युवा सदस्य में शुमार होते थे। इन दिनों न तो कुलदीप की और न ही उनके पुत्र भव्य की भाजपा में कोई खास पूछ या उपयोगिता रह गई है और कहीं न कहीं कुलदीप भाजपा के बड़े नेता इस रवैए से भी आहत है। सूत्रों की मानें तो इससे पहले कुलदीप कांग्रेस के कुछ शीर्ष नेताओं से गुप्त मीटिंग कर चुके हैं और कांग्रेस में जाने की अपनी संभावनाओं को टटोल रहे हैं। माना जाता है कि इसके बाद वे हरियाणा के भाजपा प्रभारी और भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं से मिलकर अपने मन की बात रख चुके हैं। कुलदीप ने भाजपा के सीनियर नेताओं के समक्ष अपनी यह मांग दुहराई है कि उन्हें या फिर उनके पुत्र भव्य को भाजपा अपने कोटे से राज्यसभा में लेकर आए, अन्यथा उन्हें भी अपने लिए नई संभावनाओं के द्वार टटोलने होंगे। कुलदीप जानते हैं कि अब हरियाणा में भी छोटी पार्टियों के अस्तित्व पर ग्रहण लग गया है, चौटाला परिवार की पार्टियां भी अपना वजूद बचाने के लिए स्ट्रगल कर रही हैं। हरियाणा में भी कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई ही बची रह गई है, सो कुलदीप भी इन्हीं में से किसी एक के पाले में बने रहना चाहते हैं।
…और अंत में
कांग्रेस नेता व पेशे से वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी पिछले दिनों सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे, सनद रहे कि ये चतुर्वेदी वही हैं जिन्होंने मुलायम परिवार पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा दर्ज कराया हुआ है, पिछले काफी वर्षों से वे मुलायम-अखिलेश के खिलाफ इस मामले को धार दे रहे हैं। सोनिया से मिलकर वकील चतुर्वेदी ने कुछ इस अंदाज में अपना दर्द बयां किया, बोले- ‘मैडम, मैं आज तक समझ नहीं पाया कि सपा को लेकर कांग्रेस का स्टैंड क्या है? हमारी उनसे दोस्ती है या फिर हम दो अलग राजनीतिक धाराएं हैं जो साथ नहीं चल सकते। मेरा केस तो ‘ओपन एंड शट केस’ है, जिसमें अखिलेश को तुरंत सजा हो सकती है, पर पार्टी कभी मजबूती से मेरे पीछे खड़ी ही नहीं होती।’ सोनिया कुछ देर सोच में डूब गई, फिर उन्होंने हौले से कहा- ‘हम भी चाहते हैं सपा अपनी जगह पर रहे, पर इसके लिए हमें कितना आगे बढ़ना है, हमें बस यही सोचना है।






















