भारत-चीन सीमा विवाद ऐसी समस्या है जो आजाद भारत को अंग्रेजी विरासत के रूप में मिली थी क्योंकि चीन ने 1914 में भारत-तिब्बत व चीन के बीच खिंची उस मैकमोहन रेखा को कभी स्वीकार ही नहीं किया जिसे इस वर्ष शिमला में बैठ कर तीनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच निर्धारित किया गया था। इसकी मूल वजह यह थी कि चीन ने अंग्रेजों द्वारा तिब्बत को दिया गया एक स्वतन्त्र देश का दर्जा स्वीकार नहीं किया था और उसका प्रतिनिधि शिमला की मेज से उठ कर बाहर चला गया था।
15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो अंग्रेज यह समस्या तब के भारत के कर्णधारों के लिए छोड़ गये जिसे प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने चीन के साथ भरपूर दोस्ताना सम्बन्धों के जरिये हल करने के प्रयास किये और उसके साथ पंचशील समझौता किया जिसमें एक-दूसरे देश के प्रति अनाक्रमणकारी रवैया अपनाते हुए सभी मसलों के हल शान्तिपूर्वक तरीके से निपटाने का अहद सह-अस्तित्व की भावना के साथ किया गया था। मगर चीन ने 1962 में भारत की पीठ में छुरा घोपते हुए विश्वासघात किया और भारत पर सैनिक आक्रमण कर दिया तथा उसकी फौजें असम के तेजपुर तक पहुंच गई।
उस समय तक स्वतन्त्र भारत की रक्षा तैयारियां बहुत सीमित थीं क्योंकि भारत के बंटवारे के समय अंग्रेजों ने संयुक्त देश हिन्दोस्तान की रक्षा पंक्ति को भी विभक्त कर डाला था। जबकि दूसरी तरफ चीन की अपार सैनिक शक्ति थी। इसके बावजूद भारत की अन्तर्राष्ट्रीय साख की वजह से जबर्दस्त दबाव के चलते चीनी सेनाएं पीछे हटीं और पुरानी जगह पर पहुंची मगर इस प्रक्रिया के दौरान चीन ने भारत का अक्साई-चिन इलाका अपने कब्जे में ले लिया जो कि आज भी उसके ही नियन्त्रण में है लेकिन 1963 में पाकिस्तान ने चीन के साथ नया समझौता किया और पाक अधिकृत कश्मीर का भारत-चीन के बीच का बहुत संजीदा समझा जाने वाला चार हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका उसे सौगात में दे दिया जिस पर चीन ने बाद में दुनिया की सबसे ऊंची काराकोरम सड़क का निर्माण किया।
1962 के बाद भारत-चीन के आपसी दोस्ताना सम्बन्ध लगभग नगण्य हो गये जो 80 के दशक में स्व. राजीव गांधी के शासनकाल के दौरान कायदे से स्थापित हुए। इसके बाद नरसिम्हा राव शासनकाल में दोनों देशों के बीच सीमा पर शान्ति व सौहार्द बनाये रखने के कई समझौते हुए लेकिन फिर भी चीन ने यदा-कदा भारतीय सीमा क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश करना नहीं छोड़ा और इसे अपने देश की सीमा होने की अवधारणा कहा लेकिन जब 2003 में केन्द्र में भाजपानीत एनडीए की सरकार स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में काम कर रही थी तो इसने तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकार कर लिया और बदले में चीन ने उस सिक्किम राज्य को भारत का अंग मंजूर कर लिया जिसे 1972 के करीब प्रधानमन्त्री रहते हुए स्व. इदिरा गांधी ने भारतीय संघ का हिस्सा बनाया था।
मगर इसके ठीक बाद चीन ने अपने देश का एक नक्शा जारी किया जिसमें भारत के अरुणाचल प्रदेश को चीन का अंग दिखाया गया था। इस पर उस समय भारत की संसद में जमकर हंगामा हुआ और तब सरकार ने चीन की सहमति से यह फैसला किया कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए एक उच्च स्तरीय वार्ता तन्त्र स्थापित हो जिसमें भारत की तरफ से इसके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार व चीन की तरफ से उनके समकक्ष पदाधिकारी शामिल हों लेकिन 2004 में केन्द्र में कांग्रेसनीत यूपीए की मनमोहन सरकार काबिज हो गई और उसने वाजपेयी सरकार की नीति का पूरा सम्मान करते हुए वार्तातन्त्र को व्यावहारिकता प्रदान की।
तब से लेकर अब तक इस वार्ता तन्त्र की 24 बैठकें हो चुकी हैं मगर नतीजा कुछ नहीं निकला है जबकि इसके विपरीत चीन ने इस बीच भारत के लद्दाख में गलवान घाटी में घुस कर हमारे 20 जांबाज सैनिकों को शहीद कर दिया। बेशक भारत ने भी इसका करारा जबाव दिया। मगर इसके साथ यह भी हकीकत है कि चीन बीच-बीच में अरुणाचल प्रदेश के सीमा से लगे क्षेत्रों की स्थिति बदलने का प्रयास कर रहा है और अनाधिकार प्रवेश करके इस क्षेत्र के गांवों के निकट नई बस्तियां बसा रहा है और हमारे इलाके के गांवों व नदियों तक के नाम बदल रहा है। इसका प्रमुख कारण यह माना जा रहा है कि वार्तातन्त्र के बीच यह समझ बनी हुई है कि सीमांचल के जो इलाके जिस देश द्वारा प्रशासित होंगे वह उसी का इलाका माना जायेगा।
इस फार्मूले की घोषणा संसद के भीतर ही स्व. प्रणव मुखर्जी ने मनमोहन सरकार के मन्त्री रहते हुए दी थी।
इसके साथ ही प्रणव दा ने ही 2006 में देश का रक्षामन्त्री रहते हुए अपनी चीन यात्रा के दौरान बीजिंग की धरती पर ही खड़े होकर यह कहा था कि ‘आज का भारत 1962 का भारत नहीं है’। जिसका आशय यही था कि चीन को अपनी सैनिक मानसिकता को छोड़ कर भारत के साथ आपसी सहयोग के मार्ग पर आना पड़ेगा। क्योंकि दोनों देशों के पास इस मार्ग पर चलते हुए अपना-अपना विकास करने की असीम संभावनाएं हैं। बेशक चीन फिलहाल दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है मगर भारत उसके शक्तिशाली पड़ोसी देश के रूप में भी विद्यमान है।
अतः उसकी सैनिक मानसिकता दोनों देशों के बीच कभी सामान्य व सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाने की दिशा तय नहीं कर सकती। भारत फिलहाल ब्रिक्स देशों के संगठन का मुखिया है और इसके शिखर नेताओं की बैठक अगले महीने नई दिल्ली में होने जा रही है जिसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी भाग लेने आयेंगे। अतः उनकी भारत यात्रा से पहले वार्तातन्त्र की बैठक में यदि कोई आपसी सहमति सीमा के मुद्दे पर बनती है अथवा इस दिशा में निर्णायक फैसला होता है तो वह स्वागत योग्य होगा।
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोभाल मंगलवार को बीजिंग में होने वाली इस 25वीं बैठक में भाग लेंगे और चीन की ओर से वहां के विदेश मन्त्री श्री यांग। पिछली 24 बैठकों के बारे में अभी तक जिस मुकाम तक पहुंचा जा चुका है उनके चलते ही हमें भारत-चीन सीमा पर अतिक्रमण की खबरें मिलती रहती हैं जो कि बन्द होनी चाहिए।


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