एशियाई खेलों में भारत

Summary :

भारत ने जापान में सम्पन्न हुई एशियाई खेलों में कुल 85 पदकों के साथ अपना अभियान समाप्त किया, जिसमें 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य पदक शामिल हैं। दो सप्ताह चले इस खेल उत्सव में भारत को ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल हुईं। क्रिकेट के पुरुषों और महिला मुकाबले में भारत ने स्वर्ण पदक जीते। हॉकी में भारत ने शानदार ढंग से खेला। भारतीय पुरुष टीम ने फाइनल में मलेशिया को 5-1 से हराकर खिताब बरकरार रखा और लॉस एंजलिस 2028 को ओलम्पिक कोटा हासिल किया। इस जीत के साथ ही हॉकी एशियाई खेलों में कबड्डी और क्रिकेट के बाद तीसरा…

भारत ने जापान में सम्पन्न हुई एशियाई खेलों में कुल 85 पदकों के साथ अपना अभियान समाप्त किया, जिसमें 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य पदक शामिल हैं। दो सप्ताह चले इस खेल उत्सव में भारत को ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल हुईं। क्रिकेट के पुरुषों और महिला मुकाबले में भारत ने स्वर्ण पदक जीते। हॉकी में भारत ने शानदार ढंग से खेला। भारतीय पुरुष टीम ने फाइनल में मलेशिया को 5-1 से हराकर खिताब बरकरार रखा और लॉस एंजलिस 2028 को ओलम्पिक कोटा हासिल किया। इस जीत के साथ ही हॉकी एशियाई खेलों में कबड्डी और क्रिकेट के बाद तीसरा ऐसा खेल बन गया ​जिसमें पुरुष और महिला टीमों ने गोल्ड मैडल जीते।

खेलों में व्यक्तिगत उपलब्धियां भी हासिल हुईं। कुमकुम मोहोड एशियन गेम्स में व्यक्तिगत रिकर्व गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उन्होंने शूट-ऑफ में शानदार धैर्य दिखाते हुए गोल्ड अपने नाम किया। उनकी इस जीत से भारत ने महिला व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में एलए 2028 ओलम्पिक कोटा भी हासिल किया। वहीं, नीरज चौहान ने पुरुष व्यक्तिगत रिकर्व में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर भारत के आर्चरी अभियान का समापन किया। गोल्फ में प्रणवी उर्स ने इतिहास रचते हुए एशियन गेम्स में व्यक्तिगत गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने ‘की उपलब्धि हासिल की।

उन्होंने अदिति अशोक और दीक्षा डागर के साथ महिला टीम स्पर्धा में भारत को सिल्वर मेडल दिलाने में भी योगदान दिया। सभी पदक विजेता खिलाड़ियों को बहुत-बहुत बधाई लेकिन यह खेल जगत के लिए आत्ममंथन का विषय भी है। ऐसा इसलिए जरूरी है कि 2022 के चीन के हांगझोऊ में​ पिछले एशियाई खेलों में 106 पदक जीतकर इतिहास रचने वाला भारत इस बार पदक तालिका में 85 तक सिमट गया। 1990 के बीजिंग एशियाई खेलों को भारत के सबसे खराब प्रदर्शन के लिए याद ​किया जाता। जब 195 सदस्यीय दल केवल एक गोल्ड मैडल जीत पाया था और पदक तालिका में 11वें स्थान पर रहा था।

इस बार संतोष की बात यह है कि भारत भले ही पदकों का शतक नहीं लगा सका लेकिन पदक तालिका में वह चौथे स्थान पर है। 3 गोल्ड मैडल तो हमें उन खेलों में मिले हैं जो बहुत कम देश खेलते हैं। जिन पर भारत का पहले से कब्जा है। पुरुष हॉकी में स्वर्ण पदक जीतने से राहत मिली है। राहत इसलिए क्योंकि इस जीत ने एक निराशाजनक साल में अपने सम्मान को बचा लिया। पहलवान अमन सहरावत ने बीमारी और गैर हाजरी के साल को स्वर्ण पदक में बदल दिया। ​निशानेबाजी में दो गोल्ड जीते हैं जिन्हें उत्साहजनक माना जा सकता है। एथलेटिक्स में हमारा प्रदर्शन निराशाजनक रहा। हमें उसमें एक गोल्ड मिला है।

भारत की इस दुर्गति की सबसे बड़ी वजह एथलेटिक्स में हुआ बड़ा उलटफेर है। ऐतिहासिक रूप से एथलेटिक्स हमेशा से एशियाई खेलाें में भारत का सबसे मजबूत किला रहा है, जिसने देश को सबसे ज्यादा सोने के तमगे दिलवाए हैं लेकिन इस बार जापान में एथलेटिक्स का पूरा खाता सोने के मामले में लगभग सूना पड़ा रहा है। ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में जिन खिलाड़ियों से पक्के गोल्ड की उम्मीद थी, वे दबाव में बिखर गए या अपनी लय हासिल नहीं कर सके। जैसे, भारत की महिला 4×4 टीम ने रिले रेस में देश को एक गोल्ड मेडल दिलवाया।

भारत को सबसे तगड़ा झटका जापान, दक्षिण कोरिया, कतर, बहरीन, ईरान और उज्बेकिस्तान की टीमों ने दिया है। इन देशों के खिलाड़ियों ने रणनीतिक रूप से भारतीय खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए पोडियम रेस से बाहर कर दिया।
अगर हम आंकड़ों का विश्लेषण करें तो 2022 का प्रदर्शन एक सुखद अपवाद जैसा लगता है। 70 वर्षों के इतिहास में भारत का औसतन स्थान 6वां और 8वां रहा है। हमारे पास बड़ी सफलताओं को दोहराने की कोई टिकाऊ व्यवस्था नहीं है। भारत के खेल तंत्र ट्रेनिंग, इन्फ्रास्टर्क्चर और खिलाड़ियों के सामने बहुत सी चुनौतियां बरकरार हैं। भारत मेजबान जापान और चीन से मुकाबला करने से तो दूर वह चीन के छोटे से हिस्से ​हांगकांग की बराबरी पर जूझ रहा है।

अमेरिका और इजराइल से युद्ध से जूझने वाले ईरान के स्वर्ण पदक भी हम से ज्यादा हैं। इस बार जापान गए भारतीय दल में 495 सदस्य रहे और इनकी ट्रे​निंग पर 800 करोड़ रुपए खर्च हुए। यदि भारत को इस दयनीय स्थिति से बाहर निकलना है तो उसे चीन से सबक लेना होगा। 1978 के बैंकाक एशियाई खेलों में चीन पदक तालिका में अपने प्रतिद्वंद्वी जापान से पीछे रहकर दूसरे स्थान पर रहा था। उस एक हार ने चीन की खेल नीतियों को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद चीन ने ऐसा गियर बदला कि उसने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों से लेकर 2026 के जापान एशियाई खेलों तक चीन हर बार तालिका में नंबर-1 पर रहा है।

हम हमेशा क्रिकेट को दोष देते रहते हैं और कहते हैं कि क्रिकेट ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। बाकी खेलों पर कोई ध्यान नहीं ​दिया जाता, यह तर्क गलत है। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी क्रिकेट खेलते हैं लेकिन एथलेटिक्स और अन्य खेलों में भी वह पीछे नहीं हैं। भारत को अगर आगे बढ़ना है तो खेल संघों को खेल संस्कृति पैदा करनी होगी और खिलाडि़यों को तैयार करने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार कर सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।

Aditya Chopra

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