कई बार आश्चर्य भी होता है कि जब सांस्कृतिक गर्भनाल थी तो ‘लंहदा पंजाब’ (पाक पंजाब) चढ़दे पंजाब (भारतीय-पंजाब) को बर्बाद करने पर क्यों उतारू हो गया। वर्ष 1947 से पहले पूरा पंजाब एक विशाल समृद्ध प्रांत था। चलिए ‘लंहदा पंजाब’ और ‘चढ़दे पंजाब’ के भूगोल को भी ज़रा समझ लें। ‘पाक-पंजाब’, अपने वर्तमान देश का सबसे बड़ा प्रांत है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में भी इसकी देन सर्वाधिक है। राजधानी लाहौर है और अन्य प्रमुख नगरों में फैसलाबाद, रावलपिंडी, गुजरांवाला, मुल्तान, बहावलपुर, साहीवाल आदि शामिल हैं। डेरा गाजी खान, पाक-गुजरात, सरगोधा और हड़प्पा व मोहनजोदाड़ो सरीखे विरासती शहर यहीं है।
कुल क्षेत्रफल 205,344 वर्ग किलोमीटर है। लगभग पूरे पाक-पंजाब में पंजाबी भाषा ही बोली जाती है। हालांकि लिखते समय लिपि शाहमुखी ही रहती है और ‘गुरुमुखी-लिपि’ भारतीय पंजाब के लिए छोड़ दी गई है। भारतीय पंजाब अब एक प्रमुख और विकसित राज्य है। इसकी राजधानी चंडीगढ़ (जो हरियाणा की भी संयुक्त राजधानी है) है। क्षेत्रफल 50362 वर्ग किलोमीटर है और यहां की जनसंख्या लगभग 2.77 करोड़ (2011 की जनगणना के अनुसार)। आधिकारिक राजभाषा पंजाबी (गुरुमुखी लिपि) है। प्रमुख शहरों में लुधियाना, अमृतसर, जालंधर, पटियाला, होशियारपुर, गुरदासपुर और बठिंडा आदि उल्लेखनीय हैं।
‘पंजाब’ शब्द फारसी भाषा के दो शब्दों- पंज (यानी पांच) और आब (यानी पानी या नदियां) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ ‘पांच नदियों का क्षेत्र’ है। ये पांच ऐतिहासिक नदियां सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम थीं। सन् 1947 के विभाजन के बाद चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब में चली गईं। भारतीय पंजाब के पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर में जम्मू और कश्मीर, उत्तर-पूर्व में हिमाचल प्रदेश तथा दक्षिण में हरियाणा और राजस्थान स्थित हैं।
भारतीय पंजाब का एक बार फिर से भाषाई आधार पर पुनर्गठन हुआ और वर्तमान भारतीय पंजाब 1 नवंबर 1966 को अस्तित्व में आया, जब इसके हिंदी भाषी क्षेत्रों को अलग कर हरियाणा राज्य बनाया गया और पहाड़ी इलाकों को हिमाचल प्रदेश में मिला दिया गया। भारतीय पंजाब को भारत का ‘अन्न का कटोरा’ कहा जाता है। देश के कुल क्षेत्रफल का बहुत छोटा हिस्सा होने के बावजूद यह भारत के केंद्रीय खाद्यान्न भंडार (विशेषकर गेहूं और चावल) में अभूतपूर्व योगदान देता है। कृषि के अलावा यहां साइकिल, खेलों का सामान और मशीनरी के कई लघु एवं मध्यम उद्योग व आधुनिक टेक्नोलॉजी केंद्र भी प्रमुख हैं।
इसके अतिरिक्त इस भारतीय पंजाब में हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी और सीमित संख्या में उर्दू पत्र-पत्रिकाएं भी अस्तित्व में आई। बैसाखी, लोहड़ी और गुरु पर्व यहां भी और वहां भी बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं। भांगड़ा और गिद्धा यहां के सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य हैं। प्रमुख स्थलों में अमृतसर का विश्व प्रसिद्ध हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) पंजाब का सबसे प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है। इसके अलावा जलियांवाला बाग और दुर्गियाना मंदिर भी अमृतसर में स्थित हैं।
सरहदें खिंच जाने के बाद भी दोनों पंजाब का दिल एक साथ धड़कता है। उनकी संस्कृति आज भी पूरी तरह साझी है। दोनों तरफ पंजाबी भाषा बोली जाती है। हालांकि ‘चढ़दे पंजाब’ में इसे गुरमुखी लिपि में लिखा जाता है, जबकि लहंदे पंजाब में इसे शाहमुखी (उर्दू जैसी) लिपि में लिखा-पढ़ा जाता है। बाबा फरीद, बुल्ले शाह, वारिस शाह और सुल्तान बाहू जैसे सूफी संतों की मजारें लहंदे पंजाब में हैं लेकिन उनकी कविताएं और हीर-रांझा की कहानियां दोनों तरफ के पंजाबियों के खून में बसी हैं। दोनों तरफ कुर्ता-चादरा, परांठे, लस्सी और सरसों का साग उतने ही चाव से पसंद किए जाते हैं।
दोनों पंजाब को जोड़ने और अलग करने वाला यह सबसे प्रसिद्ध आधिकारिक भौगोलिक बिंदु अटारी-वाघा में है। यह स्थल भारतीय पंजाब के अमृतसर और पाकिस्तानी पंजाब के लाहौर शहर के बीच स्थित है। यहां हर शाम होने वाली ‘लोअरिंग ऑफ द फ्लैग्स’ ‘सेरेमनी’ दोनों देशों के पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय है। यह सीमा लम्बी अवधि तक दोनों देशों के बीच व्यापार और सीमित पारगमन का मुख्य मार्ग भी रहा है। दोनों पंजाब की सीमा केवल कागजी नहीं है बल्कि कुछ स्थानों पर रावी और सतलुज नदियां प्राकृतिक सीमा का काम करती हैं। ये नदियां कई जगहों पर भारत और पाकिस्तान के बीच सांप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी बहती हैं जिससे सीमा सुरक्षा काफी जटिल हो जाती है।
भारतीय पक्ष द्वारा घुसपैठ और तस्करी को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर ऊंचे कंटीले तारों की बाड़ लगाई गई है, जिस पर रात के समय फ्लडलाइट्स (तेज रोशनी) जलाई जाती हैं। अंतरिक्ष से भी यह चमकती हुई सीमा रेखा साफ नजर आती है। सीमा रेखा के उस पार स्थित श्री करतारपुर साहब स्थित एक विशेष गलियारा है जो भारतीय पंजाब के डेरा बाबा नानक को पाकिस्तानी पंजाब में स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब (करतारपुर) से जोड़ता है।
यह गलियारा भारतीय सिख तीर्थयात्रियों को बिना वीजा के अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर गुरुद्वारा साहिब के दर्शन करने की अनुमति देता है और दोनों पंजाब के बीच एक सांस्कृतिक पुल का काम करता है। दोनों ही पंजाब अपने-अपने देशों के अन्नदाता कहलाते हैं। चढ़दे पंजाब ने ‘हरित क्रांति’ के जरिए भारत को आत्मनिर्भर बनाया, तो लहंदे पंजाब के पास विशाल नहर प्रणाली है जो पाकिस्तान की रीढ़ है। सिखों के पहले गुरु, गुरु नानक देव जी का जन्म स्थान (ननकाना साहिब) और उनका अंतिम विश्राम स्थल (श्री करतारपुर साहिब) लहंदे पंजाब में ही रह गए।
साल 2019 में खोला गया ‘करतारपुर कॉरिडोर’ चढ़दे और लहंदे पंजाब को जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक पुल साबित हुआ था। इससे भारतीय तीर्थयात्री बिना वीजा के बाबा नानक के दर पर शीश नवा सकते थे। मगर इन दिनों यह गलियारा भी ठप्प है। सोशल मीडिया, यूट्यूब और संगीत ने इन दूरियों को मिटा दिया है। आज दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे से मिलने और अपनी साझी विरासत को सहेजने के लिए तड़पते हैं। पंजाबी में एक मशहूर कहावत है-‘जिन्होंने लाहौर नहीं देखा, वो जन्मा ही नहीं’ और यह भावना आज भी दोनों पंजाबियों के दिलों को आपस में जोड़े रखती है।
मगर दुर्भाग्यवश सीमापार अर्थात पाक-पंजाब में आतंकवादी कट्टरपंथियों ने अपनी अनेक ‘नर्सरी’ बना लीं। वहां से आतंकवाद के निर्यात का धंधा आरम्भ कर दिया गया। इसके साथ ही वहीं से नशीले-द्रव्यों का धंधा भी आरंभ कर दिया गया। पहलगाम-सरीखी नापाक वारदातों को अंजाम दे डाला। अभी भी आतंकवाद, नशीली दवाओं और जहर उगलने का सिलसिला जारी है। ‘लहंदे पंजाब’ में ‘चढ़दे पंजाब’ की बर्बादी की साजिशें लगातार जारी हैं। गुरुओं, फकीरों, संतों की वाणी (बाणी) लहंदे पंजाब के राजनीतिज्ञों को सुनाई क्यों नहीं दे रही, इसकी सघन जांच बेहद जरूरी है। क्यों उन्हें बाबा फरीद, मियां मीर, बाबा नानक, वारिस शाह व पाक पवित्र वचनों के सिलसिलों की दस्तकें सुनाई नहीं दे रही।


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