भारत -जापान का सहयोग

Summary :

जापान के साथ भारत के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक सम्बन्ध इस प्रकार रहे हैं कि इस देश में बौद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या आज भी कम नहीं है और सनातन धर्म के कई देवी–देवताओं की पूजा भी इसके लोग करते हैं। इसके साथ ही भारत की आजादी के बाद जापान के साथ भारत के सम्बन्ध बहुत दोस्ताना रहे जिन्हें भारत में आर्थिक उदारीकरण शुरू होने के बाद नये पंख लगे और जापान ने भारत के औद्योगीकरण व व्यावसायिक टैक्नोलोजी उन्नयन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके सबूत में सबसे बड़ा तथ्य यह है कि भारत में मोटर-वाहन क्रान्ति करने में जापानी…

जापान के साथ भारत के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक सम्बन्ध इस प्रकार रहे हैं कि इस देश में बौद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या आज भी कम नहीं है और सनातन धर्म के कई देवी–देवताओं की पूजा भी इसके लोग करते हैं। इसके साथ ही भारत की आजादी के बाद जापान के साथ भारत के सम्बन्ध बहुत दोस्ताना रहे जिन्हें भारत में आर्थिक उदारीकरण शुरू होने के बाद नये पंख लगे और जापान ने भारत के औद्योगीकरण व व्यावसायिक टैक्नोलोजी उन्नयन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके सबूत में सबसे बड़ा तथ्य यह है कि भारत में मोटर-वाहन क्रान्ति करने में जापानी कम्पनी सुजुकी ने 80 के दशक से ही प्रयास करने शुरू कर दिये थे और बाद में मारुती मोटर वाहन कम्पनी के साथ सांझा उपक्रम स्थापित कर मोटर वाहनों को भारत के मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं की जरूरत बनाया।

इसके साथ ही भारत में मेट्रो रेल स्थापित करने में भी जापानी कम्पनियों ने सहयोग किया और अब यह बुलेट ट्रेन परियोजना को भी सिरे चढ़ा रहा है। अतः बदलते विश्व क्रम में और भूराजनीतिक उथल-पुथल के चलते दोनों देशों के बीच के सम्बन्ध समूची एशियाई उनति के लिए बहुत मायने रखते हैं जिनके लिए हिन्द महासागर क्षेत्र की सुरक्षा भी बहुत मायने रखती है। जापान की प्रधानमन्त्री श्रीमती सनाए तकाइची आजकल भारत के तीन दिवसीय दौरे पर आयी हुई हैं। वह दोनों देशों के बीच होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने आयी हैं जिसमे उनकी प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता हुई और इसके बाद संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ।

इस बयान में कहा गया है कि जापान आगामी दस वर्षों के दौरान भारत में छह लाख करोड़ रुपए का निवेश करेगा और भारत की आर्थिक सुरक्षा व समृद्धि में हर स्तर पर उसका साथ देगा। दोनों देशों ने ऊर्जा व आर्थिक सुरक्षा के क्षेत्र में आपसी सहयोग को और मजबूत बनाने का भी अह्वान किया और हिन्द महासागर क्षेत्र को सामरिक प्रतियोगिता से मुक्त रखते हुए शान्तिपूर्ण समुद्री मार्ग बनाये रखने पर भी जोर दिया। इस सन्दर्भ में हिन्द महासागर-प्रशान्त क्षेत्र में जिन चार देशों का संगठन क्वाड काम कर रहा है जापान उसका महत्वपूर्ण सहयोगी है। इस संगठन में अमेरिका, आस्ट्रेलिया व जापान के साथ भारत शामिल है। वस्तुतः यह इस समुद्री क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को सन्तुलित रखने का यह ऐसा प्रयास है जिससे हिन्द महासागर सामरिक अखाड़ा न बन सके और विश्व व्यापार के लिए इसके समुद्री मार्ग सुगम बने रहें।

इसलिए प्रधानमन्त्री श्री मोदी का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि भूराजनीतिक उथल- पुथल के बीच दोनों देशों में जो आपसी विश्वास बना हुआ है वह हमारी सबसे बड़ी रणनीतिक पूंजी है। गौर से देखा जाये तो विश्व राजनीति में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी नीतियों की वजह से जिस प्रकार का अस्थिर व अशान्त माहौल बना रखा है और एशिया में जिस तरह वह चीन की आर्थिक ताकत को देखते हुए उसके प्रति अपने पारंपरिक रवैये में नरमी बरतते दिखाई पड़ रहे हैं उससे एशिया की अन्य आर्थिक ताकतों के समक्ष अपने सम्यक विकास का संकट खड़ा हो सकता है जिसे देखते हुए भारत व जापान के बीच आर्थिक सहयोग का विशिष्ट महत्व है।

इस सिलसिले में देखा जाये तो दोनों देशों ने आपसी आर्थिक हितों को मजबूत रखने से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ) तक के क्षेत्र में परस्पर सहयोग बढ़ाये जाने का जो समझौता किया है वह भविष्य की भारत की पीढि़यों के लिए सुरक्षा का माहौल पैदा करने में सहायक होगा। जापान की पहचान भारत में यह भी है कि यह देश प्रौद्योगिकी स्थानान्तरण करने में हिचकिचाता नहीं है और भारत के विशाल बाजार व इसके उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति के अनुरूप अपने उत्पादों का व उत्पादन करता है। फिलहाल भारत में जापान की 1500 कम्पनियां हैं परन्तु इन सभी का कारोबार आटोमोबाइल क्षेत्र में ही अधिकतम है। जापान ने वादा किया है कि वह भारत में अपनी कम्पनियों की संख्या दुगनी करेगा और अन्य क्षेत्रों में भी विविधीकरण करेगा।

प्रधानमन्त्री मोदी का यह कहना कि भारत व जापान की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की सम्पूरक हैं, जिनकी जड़ें सांस्कृतिक क्षेत्र से लेकर आधुनिकतम टैक्नोलोजी के प्रयोग तक फैली हुई हैं, बताता है कि दोनों देशों के बीच जन-कल्याण हेतु कारोबार बढ़ाने की असीम संभावनाएं मौजूद हैं और दोनों देश मिल कर आर्थिक श्रेष्ठता की ओर बढ़ सकते हैं। इसके समानान्तर जापानी प्रधानमन्त्री सनाए तकाइची का यह कहना कि बदलते भूराजनैतिक वातावरण में जिस तरह आर्थिक स्रोतों का सैनिकीकरण हो रहा है और वैश्विक बाजार व्यवस्था के नियमों की जिस प्रकार अनदेखी की जा रही है उसके चलते यह जरूरी हो गया है कि आवश्यक खनिज पदार्थों की सप्लाई शृंखला को जल्दी से जल्दी से खड़ा किया जाये, बताता है कि भारत व जापान मिलकर ऐसा आर्थिक सुरक्षा का वातावरण बनाना चाहते हैं जिससे उन्हें अपने-अपने विकास में पैदा की जाने वाली बाधाओं का सामना न करना पड़े।

श्रीमती तकाइची का यह भी कहना कि श्री मोदी और मैं एक भाई- बहिन की तरह आपसी सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने के बारे में एक ही तरह सोचते हैं, स्पष्ट करता है कि जापान के मन में भारत के प्रति स्नेह की कमी नहीं है और वह सभी प्रमुख क्षेत्रों में इसके साथ सहयोग करना चाहाता है। वास्तव में दोनों देशों के सम्बन्ध इसी आपसी विश्वास पर टिके हुए हैं जिनके चलते जापान भारत के क्रमवार विकास में सहभागी भी बना है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में हाल ही में जिस प्रकार युद्ध का दौर चलने की वजह से ईंधन ऊर्जा की सप्लाई में जिस तरह की रुकावटे आयी हैं उससे भी पार पाने के लिए दोनों देशों के बीच बनी सहमति महत्वपूर्ण कही जायेगी।

जापान भी अपनी अधिकतम ऊर्जा की जरूरत आयात द्वारा ही पूरी करता है अतः भारत में ईंधन तेल व गैस के सुरक्षित भंडारों को विकसित करने में भी वह भारत को आवश्यक टैक्नोलोजी मदद देगा। कुल मिला कर जापानी प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा को बहुत उपयोगी माना जा रहा है और एशिया महाद्वीप के लिए इसे एक निर्णायक मोड़ कहा जा रहा है।

Aditya Chopra

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