एक राष्ट्र-एक चुनाव का जन –विमर्श

Summary :

पूरे देश में इस समय एक राष्ट्र-एक चुनाव के मुद्दे पर सार्वजिनक रूप से गरमागरम बहस छिड़ी हुई है और इस सन्दर्भ में संसद की गठित संयुक्त संसदीय समिति भी पूरे देश का दौरा कर रही है। इस समिति के अध्यक्ष पूर्व केन्द्रीय मन्त्री व लोकसभा सांसद श्री पी.पी. चौधरी हैं जिन्होंने पिछले दिनों ही इस बारे में दिल्ली की मुख्यमन्त्री श्रीमती रेखा गुप्ता से सलाह-मशविरा भी किया जिसमें श्रीमती गुप्ता ने कहा कि समय की मांग को देखते हुए वह दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल इस प्रकार संशोधित करने के लिए तैयार हैं जिससे दिल्ली के चुनाव लोकसभा चुनावों के…

पूरे देश में इस समय एक राष्ट्र-एक चुनाव के मुद्दे पर सार्वजिनक रूप से गरमागरम बहस छिड़ी हुई है और इस सन्दर्भ में संसद की गठित संयुक्त संसदीय समिति भी पूरे देश का दौरा कर रही है। इस समिति के अध्यक्ष पूर्व केन्द्रीय मन्त्री व लोकसभा सांसद श्री पी.पी. चौधरी हैं जिन्होंने पिछले दिनों ही इस बारे में दिल्ली की मुख्यमन्त्री श्रीमती रेखा गुप्ता से सलाह-मशविरा भी किया जिसमें श्रीमती गुप्ता ने कहा कि समय की मांग को देखते हुए वह दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल इस प्रकार संशोधित करने के लिए तैयार हैं जिससे दिल्ली के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ ही हो सकें। सामान्यतः दिल्ली के चुनाव लोकसभा चुनावों के लगभग एक वर्ष बाद होते हैं।

परन्तु यह मामला केवल दिल्ली का नहीं बल्कि भारत के 28 राज्यों का है जहां अलग-अलग समय पर उनकी विधानसभाओं का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में कोई साल ही ऐसा जाता होगा जहां किसी राज्य में चुनाव न होते हों। इसके साथ ही स्थानीय निकायों के चुनाव भी विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर होते रहते हैं। चुनावों की इस भरमार की वजह से भारत में अलग-अलग समय पर चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता लागू करता रहता है जिसका सीधा असर विभिन्न विकास कार्यों पर पड़ता है। यह तस्वीर का सीधा और सरल पहलू है मगर दूसरा पहलू यह है कि भारत ‘राज्यों का संघ’ देश है जिसमें संविधान में राज्यों को भी कुछ विशेषाधिकार दिये गये हैं जिनमें हर पांच साल के लिए प्रादेशिक सरकारों का गठन सबसे प्रमुख है।

ये सरकारें जनता द्वारा डाले गये वोट के आधार पर ही गठित होती हैं और इनका कार्य अपने-अपने राज्य की जनता की समस्याएं प्रादेशिक स्तर पर हल करने का होता है। संविधान में केन्द्र व राज्य सरकारों के अधिकारों की पृथक- पृथक सूचियां हैं जिनसे शक्ति लेकर राज्य सरकारें अपना काम करती हैं। मगर इसके बावजूद संविधान में एक शक्तिशाली केन्द्र की परिकल्पना मौजूद जिसके तहत केन्द्र सरकार के पास यह अख्तियार रहता है कि वह किसी भी राज्य मे संविधान या कानून के शासन के चरमराने की स्थिति में वहां राज्यपाल के माध्यम से अपना शासन लागू कर सके। स्वतन्त्र भारत में राज्यपाल के पद के सृजन का उद्देश्य यही था कि हर हालत में किसी भी राज्य में किसी भी राजनैतिक दल की लोगों द्वारा चुनी गई सरकार केवल संविधान के अनुसार ही चलनी चाहिए।

राज्यपाल किसी भी राज्य में संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति के प्रतिनि​धि ही होते हैं और उनका कार्यकाल राष्ट्रपति की प्रसन्नता पर ही निर्भर करता है। वह चुने हुए नहीं होते। इस प्रकार राज्यपालों के माध्यम से राज्यों की सरकारें राष्ट्रपति की सतत निगरानी में रहती हैं। इसके साथ केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी भी राज्य सरकारों पर रहती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में केन्द्र व राज्य सामूहिक तौर पर जन कल्याण के काम करते हैं और राज्य सरकारें केन्द्र की परियोजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने का काम करती हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे अधिकार भी हैं जो समवर्ती सूची में आते हैं अर्थात उनसे सम्बन्धित मामलों में केन्द्र व राज्य दोनों के ही अधिकार होते हैं।

भारत की यह व्यवस्था अमेरिका के लोकतन्त्र से पूरी तरह अलग है। हालांकि अमेरिका में भी हर साल इसके 50 राज्यों में किसी न किसी चुने हुए सदन के लिए चुनाव होते रहते हैं मगर इस देश में राज्यों की स्वतन्त्र सत्ता इस प्रकार स्थापित है कि हर राज्य का अपना अलग चुनाव कानून होता है। इसी वजह से अमेरिका राज्यों का संयुक्त देश या फेडरेशन है। लेकिन भारत की भौगोलिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए ही अंग्रेजी शासनकाल के दौरान इसे एक समुच्य राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलाने के लिए हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। इसकी वजह यह थी कि अंग्रेजों ने 1919 के भारत सरकार कानून के तहत इसे एक संघीय राज्य नहीं माना था और विभिन्न जातीय वर्गों व सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को मानने वाले एक जमधट्टे के रूप में स्वीकारा था।

परन्तु 1928 में जब कांग्रेस नेता श्री मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में इस पार्टी ने भारत का संविधान लिखने के लिए एक समिति गठित की तो उसने अपनी रिपोर्ट में सिद्ध किया कि भारत में रहने वाले विभिन्न मत-मतान्तरों व जातीय गुटों व सम्प्रदायों की पहचान एक संघीय देश भारत के रूप में है। इस समिति में पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर नेता जी सुभाष चन्द्र बोस तक शामिल थे। इस समिति ने तब भारत के लोगों की विविधता का संज्ञान लेते हुए ही राज्यगत आधार पर भारत की संरचना की परिकल्पना को साकार रूप देते हुए राज्यों व केन्द्र सरकार के अधिकारों को भी नियत किया था। परन्तु अंग्रेज चाहते थे कि भारत में राज्यों को इतने अधिकार दिये जायें जिससे मजबूत केन्द्र की स्थापना असंभव हो जाये।

इस मामले में उनके साथ मुस्लिम लीग थी जिसने मोती लाल समिति का बहिष्कार किया था। इसीलिए 1935 में जब अंग्रेज पुनः ‘भारत सरकार कानून’ लाये तो उन्होंने राज्यों को लगभग स्वतन्त्र इकाई के रूप में छोड़ दिया जिसकी वजह से जब भारत में पाकिस्तान बनाने की मांग को लेकर मुस्लिम लीगी नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने खूनी साम्प्रदायिक दंगे कराये तो तत्कालीन अंग्रेज वायसराय लार्डबावेल ने केबिनेट मिशन के तहत बनी कार्यकारी केन्द्र सरकार को किसी भी हरकत में आने से रोक दिया। बंटवारे का पहला दंगा कोलकाता में 16 अगस्त 1946 को शुरू हुआ जिसमें कम से कम दस हजार लोग मारे गये। इसके बाद ये दंगे बिहार में फैले। अतः जब भारत आजाद हुआ तो बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान सभा के साथ मिलकर जो संविधान दिया उसमें ऐसे मजबूत केन्द्र को साकार किया जो संकटकालीन परिस्थितियों में किसी भी राज्य में हस्तेक्षप कर वहां के हालात को सुधार सके।

परन्तु भारत में बहुदलीय राजनैतिक व्यवस्था है जिसके तहत राज्य स्तर पर भी विभिन्न क्षेत्रीय दल सत्ता में आ सकते हैं। इन दलों के केन्द्र में सर्वप्रथम अपना राज्य हित रहता है और प्रायः वे राष्ट्रीय हितों से बेखबर रहते हैं जिसकी वजह से भी केन्द्र को शक्तिशाली बनाये रखने की संवैधानिक योजना सिरे चढ़ी। इस सिलसिले को अगर आगे बढ़ाया जाये तो पूरे देश में एक ही समय में विधानसभा व लोकसभा चुनाव कराना स्वयं राज्यों की राजनैतिक स्थिरता के पक्ष में भी है जिससे वहां की राज्य सरकारें अपने लोगों का अधिकाधिक विकास कर सकें और हर पांच साल बाद जनता के दरबार में जाकर अपना हिसाब दें। मगर भारत का वर्तमान संघीय ढांचा इसकी इजाजत नहीं देता है। इसके लिए हमें संविधान में ही ऐसे संशोधन करने होंगे जिससे लोकसभा समेत विधानसभाओं का कार्यकाल सुनिश्चित हो सके।

इस बारे में सबसे पहला सुझाव वाजपेयी सरकार के दौरान तत्कालीन गृहमन्त्री श्री लाल कृष्ण अडवानी का आया था और उन्होंने सुझाव दिया था कि किसी भी विधानसभा या लोकसभा में किसी सरकार के विरुद्ध लाये गये अविश्वास प्रस्ताव के साथ ही वैकल्पिक सरकार गठित करने का प्रस्ताव भी लाया जाये जिससे सदन अपने पूरे पांच साल पूरे कर सके और चुनाव समय पर ही हों। मगर उनका यह सुझाव तब किसी ने नहीं माना। अब वर्तमान समय में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का यह प्रयास है कि पूरे देश में एक बारगी ही चुनाव हों जिससे समूचा राष्ट्र एक साथ अपने प्रादेशिक व राष्ट्र प्रतिनिधियों को चुन सकें।

इसमें धन की भी भारी बचत होगी और सरकारी मशीनरी पर दबाव कम होगा तथा देश के विकास की परियोजनाएं बिना बाधा के आगे चल पायेंगी। इसके लिए मोदी सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित की थी जो अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप चुकी है। इसमें कुछ संविधान संशोधनों का भी सुझाव दिया गया है। उसके बाद ही इस पर विचार करने के लिए संसद की संयुक्त समिति का गठन किया गया है। इसमें भारत के संघीय ढांचे से बिना कोई छेड़छाड़ किये ही ऐसे उपाय करने होंगे जिनसे भारत हर वर्ष के चुनावी दौर से बच सके और इसका लोकतन्त्र भी अक्षुण्य रहे।

आखिरकार 1967 तक तो पूरे भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे और उनमें लोग राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर अपनी वरीयताओं में भेद भी रखते थे। इसी वजह से उस वर्ष नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ था और केन्द्र में कांग्रेसी सरकार ही बनी थी।

Team Desk