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अफगानियों के साथ भारत

अफगानिस्तान के मुद्दे पर आज राजधानी में हुई सर्वदलीय बैठक से जो स्वर उभरा है उसे एकमत से सभी राजनीतिक दलों ने अफगानिस्तान के लोगों के साथ एकजुटता का इजहार किया है।

अफगानिस्तान के मुद्दे पर आज राजधानी में हुई सर्वदलीय बैठक से जो स्वर उभरा है उसे एकमत से सभी राजनीतिक दलों ने अफगानिस्तान के लोगों के साथ एकजुटता का इजहार किया है। इससे यही सन्देश जाता है कि पूरा भारत इस संकट की घड़ी में अफगानी जनता के साथ खड़ा होने की कसम उठाता है और उन्हें आशवस्त करता है कि उनकी इच्छा का सम्मान करना भारत अपना कर्त्तव्य मानता है। भारत यह कभी नहीं भूल सकता कि महात्मा गांधी के आजादी के आन्दोलन के शबाब पर आने से पहले इस देश की स्वतन्त्रता के कुछ दीवानों ने 1 दिसम्बर, 1915 को काबुल में ही’ मथुरा’ के राजा महेन्द्र प्रताप की ‘आरजी हिन्द हुकूमत’की बुनियाद रखते हुए इसे आजाद हिन्दोस्तान की निर्वासित सरकार घोषित किया था। इसके प्रधानमन्त्री मौलवी बरकतुल्लाह थे और गृहमन्त्री मौलवी ओबैदुल्लाह सिन्धी थे। इस सरकार ने अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद छेड़ने का एलान किया था। दिल्ली के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों द्वारा गद्दी से उतारे जाने के बाद भारत की यह पहली भारतीयों द्वारा बनाई गई सरकार थी। बेशक राजा महेन्द्र प्रताप का यह सपना उस समय की वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से साकार नहीं हो सका था मगर अफगानी जनता ने राजा महेन्द्र प्रताप को अपने सिर-आंखों पर बैठाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। 
यह प्रथम विश्व युद्ध का समय था और तभी दुनिया के मुस्लिमों का ‘खिलाफत’ आन्दोलन भी शुरू हुआ था जो मूल रूप से अंग्रेजों के ही खिलाफ था। इसी वजह से महात्मा गांधी ने इस आन्दोलन का भारत में समर्थन करने की घोषणा भी की थी। इस एेतिहासिक घटना से ही हम समझ सकते हैं कि प्राचीन इतिहास से लेकर वर्तमान इतिहास तक भारत-अफगानिस्तान के सम्बन्ध किस कदर मजबूत धागे से बन्धे हुए हैं। यह सनद रहनी चाहिए कि 1973 तक इस मुल्क पर राज करने वाले हर शहंशाह ने भारत का साथ तब भी दिया जब 1947 तक अंग्रेज हुकूमत इसके विदेशी मामलों को देखती थी और आजादी मिलने के बाद भी। इसलिए बहुत साफ है कि भारत ऐसी कठिन समय में अफगानी जनता का साथ नहीं छोड़ सकता। अमेरिका जिस तरह इस मुल्क को आतंकवादी और आदमखोर तालिबानियों के हवाले करके काबुल से जा रहा है उसमें इस बात की बू शुरू से ही आ रही है कि हमारे पड़ोसी पाकिस्तान की आतंकियों को पनाह देने की रणनीति सफल हो गई है।
अमेरिका बेशक विश्व शक्ति हो सकता है मगर 2001 में तालिबानियों का मुकाबला करने के लिए जब उसने अपनी फौजें नाटों संगठन के देशों की फौजों के साथ उतारी थीं तो पाकिस्तान को अपने साथ लेकर अलकायदा के इस्लामी जेहादी आतंकवाद के विरुद्ध अपनी मुहीम को जायज रंग देने की कोशिश की थी क्योंकि पाकिस्तान एक इस्लामी देश था और खुद को ‘इस्लाम का किला’ तक कहने से गुरेज नहीं करता था। मगर इसके लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से बहुत बड़ी कीमत वसूली और तालिबानों को ठंडा करने के नाम पर यह देश भारी-भरकम फौजी जखीरा भी खड़ा करता रहा। दूसरी तरफ पाकिस्तान खुद अफगान शरणार्थियों को पनाह देने के नाम पर तालिबानी मदरसों में इन्हें आतंकवाद का प्रशिक्षण देता रहा और ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ जैसा संगठन खड़ा करवाता रहा।  इसी के बरगलाने पर सबसे पहले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अच्छे और बुरे तालिबान का फलसफा पेश किया। 
भारत को सबसे पहले सोचने की जरूरत है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन जिस तरह तालिबानियों के ‘चचा’ बन कर 80 अरब डालर का फौजी सामान उनके लिए छोड़ कर गये हैं उसका इस्तेमाल आखिर किसके खिलाफ होगा। तालिबान पाकिस्तान को अपना दूसरा घर बता रहे हैं और शान से इसके पेशावर व क्वेटा जैसे शहरों में बैठ कर अफगानिस्तान की हुकूमत पर कब्जा करने के मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं। आखिरकार दोहा में 2018 में तालिबानियों और अमेरिका के बीच जो समझौता हुआ उसके पीछे कौन था? बिना शक यह पाकिस्तान ही था जो तालिबानों के उदार चेहरे की वकालत करता घूम रहा था। हम इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि जिस तरह अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और इस देश के पंजशीर प्रान्त के नेता अमरुल्लाह सालेह ने एक भारतीय राष्ट्रीय न्यूज चैनल को दिये गये साक्षात्कार में कहा है कि पाकिस्तान की फौज व आईएसआई ने अमेरिका काे बेवकूफ बना कर उसे अफगनिस्तान को बदहाली में छोड़ने को उकसाया उससे साफ है कि अफगानी तालिबानों की मदद के लिए पाकिस्तान अब खुल कर मैदान में आयेगा और अमेरिकी जो फौजी जखीरा छोड़ कर गये हैं उसका संचालन ये पाकिस्तानी तालिबानियों के भेष में करेगा जिससे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में दहशतगर्दी का बहुत बड़ा खतरा कभी भी खड़ा हो सकता है।
पाकिस्तान के सन्दर्भ में हमें यह समझना होगा कि यहां कि कथित चुनी हुई सरकारें बराये नाम ही होती हैं। असली हुकूमत फौज और आईएसआई की ही होती है। अतः अब वह समय आया लगता है जब एशिया व भारतीय उपमहाद्वीप की सुरक्षा के लिए भारत को उस ‘सुरक्षा त्रिकोण’ की अवधारणा को पुनः जागृत करना होगा जो ‘भारत-चीन-रूस’ के बीच 90 के दशक में मूर्त हुई थी। बेशक चीन व पाकिस्तान के सम्बन्धों के चलते यह फिलहाल मुमकिन नहीं कही जा सकती मगर अफगानिस्तान में अराजकता या तालिबानी इस्लामी हुकूमत के नाजिल होने की सूरत में इसकी संभावनाओं से इन्कार भी नहीं किया जा सकता। कूटनीतिज्ञों को फिलहाल यह बहुत दूर की कौड़ी लग सकती है मगर अन्तर्राष्ट्रीय जरूरतों के दबाव में कभी भी कुछ भी नामुमकिन नहीं होता।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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