आई.एस.आई. का फर्जी सिखों के सहारे भारत विरोधी अभियान

Summary :

पाकिस्तान द्वारा एक ओर सिख समुदाय के प्रति उदारवादी नीति अपनाते हुए सिख मसलों को गंभीरता से लेने की बात की जाती है, सिखों को उनके धार्मिक स्थलों के दर्शनों के लिए समय-समय पर पाकिस्तान आने का न्यौता दिया जाता है, मगर वहीं दूसरी ओर पिछले लगभग 13 वर्षों से पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी पर्व को भारत के विपरीत जाकर अलग तारीखों से मनाया जाता रहा है। इस बार शहीदी पर्व 18 जून को आ रहा है और समूचा संसार इसी दिन शहीदी पर्व को मनाएगा परन्तु पाकिस्तान में एक बार फिर से 16 जून को…

पाकिस्तान द्वारा एक ओर सिख समुदाय के प्रति उदारवादी नीति अपनाते हुए सिख मसलों को गंभीरता से लेने की बात की जाती है, सिखों को उनके धार्मिक स्थलों के दर्शनों के लिए समय-समय पर पाकिस्तान आने का न्यौता दिया जाता है, मगर वहीं दूसरी ओर पिछले लगभग 13 वर्षों से पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी पर्व को भारत के विपरीत जाकर अलग तारीखों से मनाया जाता रहा है। इस बार शहीदी पर्व 18 जून को आ रहा है और समूचा संसार इसी दिन शहीदी पर्व को मनाएगा परन्तु पाकिस्तान में एक बार फिर से 16 जून को शहीदी पर्व मनाया जा रहा है, हालांकि इस बार यह देखने को मिला है कि भारत से जाने वाले सिख श्रद्धालुओं के द्वारा 18 जून को ही शहीदी पर्व समागम किए जायेंगे, जिसकी जानकारी शिरोमणि कमेटी द्वारा सरकार को लिखे पत्र से प्राप्त हुई है।

देखा जाए तो भारत की सिख जत्थेबं​दियों की बड़ी जीत माना जा सकता है, जिसमें अहम रोल दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका, महासचिव जगदीप सिंह काहलो और विशेष तौर पर परमजीत सिंह चंडोक ने अदा किया है। दूसरी ओर पिछले लंबे समय से पाकिस्तान भारत विरोधी दुष्प्रचार और मनोवैज्ञानिक युद्ध को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाता रहा है। कभी आतंकवाद के माध्यम से, कभी सोशल मीडिया के जरिए और कभी धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग करके भारत के खिलाफ झूठा नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की जाती रही है लेकिन अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं वह न केवल चिंताजनक हैं बल्कि पूरी सिख कौम की धार्मिक पहचान और सम्मान पर सीधा हमला भी है।

रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. से जुड़े तत्व भारत, भारतीय सेना, भारतीय मीडिया और देश के सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ जहर उगलने के लिए मुस्लिम और ईसाई युवाओं को सिखों के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर फर्जी सिख पहचान बनाकर भारत विरोधी वीडियो और सामग्री प्रसारित की जा रही है, ताकि दुनियाभर में यह भ्रम फैलाया जा सके कि सिख समुदाय भारत के खिलाफ खड़ा है। यह केवल फर्जी प्रचार नहीं बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र प्रतीत होता है।

लाहौर के काशिफ अली आशिक उर्फ काशिफ रांझा द्वारा ‘‘सरदार एस.के.पी.’’ नाम से कथित रूप से संचालित फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट इसका एक उदाहरण बताया जा रहा है। आरोप है कि इस पहचान के माध्यम से दर्जनों भारत विरोधी वीडियो प्रसारित किए गए। इसी प्रकार सरदार मुहम्मद बिलावल नामक व्यक्ति द्वारा ‘‘सिद्धू 39 वाला’’ नाम से सिख स्वरूप धारण कर सोशल मीडिया गतिविधियां चलाने पर भी पाकिस्तानी सिखों ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मामले को स्वयं पाकिस्तान के सिख समुदाय ने उठाया है।

पाकिस्तान के सिख नेताओं और सामाजिक संगठनों ने स्पष्ट कहा है कि गैर-सिख व्यक्तियों द्वारा पगड़ी और सिख पहचान का इस्तेमाल कर झूठी प्रसिद्धी हासिल करना तथा राजनीतिक या धार्मिक एजेंडा चलाना पूरी सिख बिरादरी के सम्मान के खिलाफ है। यह विरोध किसी दूसरे देश द्वारा नहीं, बल्कि पाकिस्तान में रहने वाले सिखों द्वारा उठाया गया है जिससे इस मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है। ऑपरेशन ब्लू स्टार रोका जा सकता था? आज भी यह सवाल उठता है कि क्या ऑपरेशन ब्लू स्टार टाला जा सकता था? क्या पंजाब को उस भयावह दौर से बचाया जा सकता था? और क्या कुछ राजनीतिक नेताओं की गलत रणनीतियों ने हालात को इतना बिगाड़ दिया कि अंततः सेना को दरबार साहिब परिसर में प्रवेश करना पड़ा? पंजाब में तनाव 1978 के निरंकारी-सिख संघर्ष के बाद धार्मिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण तेजी से बढ़ा।

इसी दौरान पंजाब केसरी के संस्थापक सम्पादक लाला जगत नारायण जी एक प्रमुख आवाज बनकर सामने आए। वह पंजाब केसरी और हिंद समाचार समूह के संस्थापक थे। लाला जगत नारायण जीे खुलकर उग्रवाद, अलगाववाद और भिंडरांवाले की नीतियों की आलोचना करते थे। उन्होंने अपने लेखों में पंजाब में बढ़ती कट्टरता और हिंसा के खिलाफ लगातार लिखा। यही कारण था कि वह उग्रवादी तत्वों के निशाने पर आ गए। 9 सितंबर, 1981 को उनकी हत्या कर दी गई। उनकी हत्या ने पूरे पंजाब में सनसनी फैला दी और हिंदू-सिख संबंधों में तनाव और बढ़ गया। जरनैल सिंह भिंडरांवाले की इस हत्या के मामले में संदेह के आधार पर गिरफ्तारी भी हुई, हालांकि बाद में तत्कालीन केंद्र सरकार ने संसद में कहा कि उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले और उन्हें रिहा कर दिया गया।

भिंडरांवाले की लोकप्रियता उनकी गिरफ्तारी और रिहाई के बाद और अधिक बढ़ गई। चार दशक बाद आज भी एक सवाल यही उठता है कि दरबार साहिब परिसर के अंदर हथियारों और गोला-बारूद का इतना बड़ा जखीरा कैसे पहुंचा। यह तथ्य ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा है कि 1983-84 तक परिसर के कुछ हिस्सों को किलेबंद कर दिया गया था और हथियारबंद लोग वहां मौजूद थे लेकिन यह कैसे हुआ, इस पर आज भी विवाद है। कोई सर्वमान्य न्यायिक निष्कर्ष नहीं है जो किसी एक संस्था या व्यक्ति को निर्णायक रूप से जिम्मेदार ठहराए। यदि शुरुआती चरण में ही स्थिति पर नियंत्रण किया जाता तो शायद इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। कृपाण आस्था का प्रतीक, विवाद का नहीं

ब्रिटेन में हाल ही में कृपाण को लेकर छिड़ी बहस ने एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक सुरक्षा और सामुदायिक जिम्मेदारी जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने ला दिया है। साउथैम्पटन में एक छात्र की हत्या में कृपाण के इस्तेमाल के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने इस पर दी गई कानूनी छूट समाप्त करने की मांग की है लेकिन किसी एक व्यक्ति के अपराध के आधार पर पूरे सिख समुदाय की धार्मिक पहचान पर प्रश्नचिह्न लगाना न केवल अनुचित है? सिख धर्म में कृपाण कोई सामान्य हथियार नहीं है। यह पांच ककारों में से एक पवित्र प्रतीक है, जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, निर्बलों की रक्षा करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। गुरु साहिबानों ने कृपाण को आक्रमण का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और मानवता की रक्षा का प्रतीक बनाया था।

इतिहास गवाह है कि सिख गुरुओं और सिख समुदाय ने हमेशा अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सर्वाेच्च बलिदान दिए। भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि किस प्रकार धार्मिक आस्था और राष्ट्रीय एकता साथ-साथ चल सकती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में सिखों को कृपाण धारण करने का विशेष अधिकार दिया गया है। यह अधिकार किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि भारत की बहुलतावादी संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

दुनिया के बहुत कम देशों में किसी धार्मिक प्रतीक को संविधान में इतनी स्पष्ट मान्यता प्राप्त है। यह दर्शाता है कि भारत ने सिख समुदाय की आस्था का सम्मान करते हुए उसे राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न अंग माना है लेकिन अफसोस इस बात का है कि इतनी बड़ी घटना पर अभी तक किसी खालिस्तानी संगठन के द्वारा एक शब्द नहीं बोला गया।

Team Desk