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जेतली, चिदम्बरम और कश्मीर

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कांग्रेस नेता श्री पी. चिदम्बरम ने जम्मू-कश्मीर मसले पर यह कहकर कि जब इस राज्य के लोग ‘आजादी’ की बात करते हैं तो उनका आशय ‘वृहद स्वायत्तता’ से होता है, राजनीतिक माहौल को इस कदर गरमा दिया है कि मोदी सरकार के वित्तमन्त्री श्री अरुण जेतली ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आजादी और स्वायत्तता की मांग राष्ट्रहित के खिलाफ हैं। बिना शक भारत राज्यों का एेसा संघ (यूनियन आफ इंडिया) है जिसमें संविधानतः सभी राज्यों के अधिकारों का बंटवारा केन्द्र की संगठित शक्ति के विभिन्न ध्रुवों से ही होता है। संकटकालीन या संविधान की अनुपालना में कोताही बरतने की लापरवाही किये जाने पर केन्द्र संविधान के अनुच्छेद 355 और 356 के तहत एेसे प्रदत्त सभी अधिकारों को अपने नियन्त्रण में लेने का अधिकार भी रखता है परन्तु इसी संविधान में राज्य, केन्द्र व समवर्ती सूची बनाकर केन्द्र व राज्यों के पृथक व सम्मिलित अधिकारों का आवंटन भी किया गया है जिससे किसी प्रकार का भ्रम न बना रहे, परन्तु जम्मू-कश्मीर के मामले में भारतीय संविधान में पृथक अनुच्छेद 370 जोड़कर इसे विशेष अधिकार दिये गये और इसके लिए अलग से राज्य संविधान की व्यवस्था की गई, इसके साथ ही अनुच्छेद 371 के तहत भी भारत के कुछ राज्यों की व्यवस्था सामान्य से अलग बनाने के इंतजाम किये गये।

एेसे राज्यों में पूर्वोत्तर के राज्य विशेष रूप से हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य का मसला कांग्रेस या भाजपा के नजरिये से देखने का सवाल नहीं है बल्कि भारत के नजरिये से देखने का मुद्दा है। यह एेतिहासिक सत्य है कि जब 26 अक्तूबर, 1947 को इस रियासत के महाराजा हरि सिंह ने भारतीय संघ में अपनी रियासत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये थे तो उस समय पं. नेहरू के नेतृत्व में बनी केन्द्र की राष्ट्रीय सरकार में भारतीय जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी उद्योगमन्त्री की हैसियत से शामिल थे और पूरे नेहरू मन्त्रिमंडल ने विलय शर्तों पर अपनी सहमति प्रदान की थी। इसकी प्रमुख शर्त जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की ही थी। अतः यह स्वयं सिद्ध है कि उस समय डा. मुखर्जी ने विलय शर्तों को राष्ट्रहित में माना था। उन्होंने 1950 में नेहरू मन्त्रिमंडल से इस्तीफा पाकिस्तान के साथ वह समझौता होने के विरोध में दिया था जिसे नेहरू-लियाकत समझौता कहा जाता है। अतः कश्मीर को विशेष दर्जा दिये जाने के फैसले में कांग्रेस व भाजपा दोनों ही बराबर रूप से भागीदार हैं। जब नेहरू जी कश्मीर मसले को राष्ट्रसंघ में लेकर गये तब भी डा. मुखर्जी उनकी सरकार में मन्त्री थे। अतः जाहिर तौर पर उस समय राष्ट्रीय नजरिये का सवाल था, लेकिन इसके बाद जिस तरह परिस्थितियों ने करवट बदली उनका जिक्र मैं इसी स्तम्भ में कई बार कर चुका हूं जिसके बारे में सुधि पाठकों को बार-बार याद दिलाने की जरूरत नहीं है।

प्रश्न केवल इतना है कि जम्मू-कश्मीर के हालात 1953 में स्व. शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त किये जाने के बाद दिसम्बर 1974 तक सामान्य नहीं हुए, जब पुनः स्व. शेख के  साथ स्व. इंदिरा गांधी ने समझौता करके अपनी पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की बागडोर उनके हाथ में सौंप दी थी। शेख साहब और इंदिरा जी की मृत्यु के बाद केन्द्र में राजीव सरकार से लेकर अब तक जितनी भी सरकारें काबिज हुई हैं सभी इस राज्य की मूल समस्या के हल करने में असफल कही जा सकती हैं, लेकिन इन सरकारों ने एक काम बड़े इत्मीनान से इस राज्य में कर डाला अर्थात ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।’ इसकी मूल वजह यही रही कि सभी सरकारों ने जन अपेक्षाओं के स्थान पर अपनी राजनीतिक अपेक्षाओं पर बल दिया जबकि इस राज्य की मूल समस्या राजनीतिक ही है। यह महत्वपूर्ण है कि जब केन्द्र में भाजपा नीत श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और इसमें जम्मू-कश्मीर की प्रमुख पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस शामिल थी तथा राज्य में इस पार्टी के नेता डा. फारूक अब्दुल्ला की सराकर थी तो सन् 2000 के लगभग राज्य विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करके स्वायत्तता की मांग की गई थी। सवाल खड़ा किया जा सकता है कि उस समय एेसी मांग राष्ट्र विरोधी क्यों नहीं थी और क्यों उस समय एेसी मांग करने वाली पार्टी हिन्दोस्तान की सरकार में शिरकत कर रही थी। मेरा आशय केवल इतना है कि जन अपेक्षाओं से आंखें मूद कर हम समस्या का समाधान किसी भी तौर पर नहीं निकाल सकते, मगर चिदम्बरम साहब यह कैसे कह सकते हैं कि आजादी का मतलब अधिक स्वायत्तता से है।

1989 से 2017 तक जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने इस राज्य के लोगों में अलगाववाद को मजहब की रोशनी में दिखाने की हिमाकत की है। इसका केवल एक ही कारण नहीं कहा जा सकता बल्कि कट्टरपंथियों के साथ पाकिस्तान में सक्रिय इस्लामी जेहादियों का गठजाेड़ भी है। एेसे गठजोड़ को तोड़ने के लिए यदि मोदी सरकार ने फौज की ताकत का इस्तेमाल किया है तो वह किसी भी संप्रभु राष्ट्र की सुरक्षा के लिए जायज कदम कहा जा सकता है परन्तु इससे आगे सेना की बड़ी भूमिका तलाशना भयंकर भूल होगी और कश्मीरी जनता को अलग-थलग करना होगा जबकि यहां की जनता कभी भी पाकिस्तान के हक में नहीं रही है और हमेशा वक्त पड़ने पर इसने भारतीय संघ की मजबूती के लिए काम किया है। यह बात अलग है कि यहां के लोग अपने विशेष दर्जे को अपना मौलिक अधिकार मानते हैं। पिछली मनमोहन सरकार में माननीय चिदम्बरम गृहमन्त्री भी रहे और उन्हें इस राज्य की परिस्थितियों के बारे में पूरा अनुमान न हो, एेसा नहीं माना जा सकता अतः स्वायत्तता और आजादी के मायने एक कैसे हो सकते हैं ? 1980 में पंजाब में अकाली दल ने भी आनन्दपुर साहब प्रस्ताव पारित करके पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता की ही मांग की थी ! अतः जम्मू-कश्मीर की मौजूदा हालत को देखते हुए हमें दलीय राजनीति से ऊपर उठकर मूल समस्या का स्थायी हल खोजना होगा।

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