‘जन्तर-मन्तर’ का स्वर्णिम अतीत

Summary :

वर्ष 1990 से जिस ऐतिहासिक परिसर के मैदान को आंदोलनों ने रौंद डाला है, उसका अपना एक स्वर्णिम अतीत भी है। उसका एक विलक्षण स्वरूप वर्ष 1558 के बाद से सामने आने लगा था, जब दिल्ली के मुगल सम्राट अकबर ने अपनी राजधानी आगरा में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। उससे पहले मुगलिया शासन वर्तमान ‘पुराना किला’ से चलता था। लालकिला बाद में मुगलिया सल्तनत के शासन का केंद्र बना था। अकबर ने वर्ष 1652 में आमेर (जयपुर) की राजकुमारी से विवाह किया और उसके बाद से मुगलों व कछवाहा राजपूत-वंश में पारिवारिक संबंध स्थापित हो गए थे। वही राजपूत…

वर्ष 1990 से जिस ऐतिहासिक परिसर के मैदान को आंदोलनों ने रौंद डाला है, उसका अपना एक स्वर्णिम अतीत भी है। उसका एक विलक्षण स्वरूप वर्ष 1558 के बाद से सामने आने लगा था, जब दिल्ली के मुगल सम्राट अकबर ने अपनी राजधानी आगरा में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। उससे पहले मुगलिया शासन वर्तमान ‘पुराना किला’ से चलता था। लालकिला बाद में मुगलिया सल्तनत के शासन का केंद्र बना था।
अकबर ने वर्ष 1652 में आमेर (जयपुर) की राजकुमारी से विवाह किया और उसके बाद से मुगलों व कछवाहा राजपूत-वंश में पारिवारिक संबंध स्थापित हो गए थे। वही राजपूत महारानी कालांतर में जहांगीर की जन्मदात्री बनी।
उन्हीं नए संंबंधों के चलते अकबर ने आमेर (जयपुर) के राजा सवाई मान सिंह को वर्तमान ‘कनॉट प्लेस’ वाला भूखण्ड दे दिया था। उसी भूखण्ड पर कालांतर में वर्तमान जन्तर-मन्तर का निर्माण हुआ था। यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि इसके निर्माता राजा जय सिंह द्वितीय ने स्वयं अपने हाथों से इस वेधशाला के यंत्रों के मोम के मॉडल बनवाए थे। पूरा मॉडल भी इसी महाराजा ने स्वयं तैयार किया था। इसी निर्माण से उसको सब्र नहीं हुआ। बाद में उसी ने जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी ऐसी ही वेध शालाएं बनवाई। दरअसल निर्माण की यह दास्तान मुगल सम्राट अकबर के कार्यकाल में शुरू हुई थी। अकबर ने जब मुुगलिया सल्तनत की राजधानी आगरा में स्थानांतरित की तो उसने दिल्ली का यह वर्तमान भूखण्ड (कनॉट प्लेस क्षेत्र) अपने मित्र सवाई राजा मान सिंह को दिया था। ‘जन्तर-मन्तर’ का निर्माण इसी पर आरम्भ कराया। इसे बनाने में छह वर्ष लगे थे।
दरअसल इसके निर्माता राजा जय सिंह (द्वितीय) छोटी उम्र से ही गणित ज्योतिष एवं खगोल-शास्त्र में गहरी दिलचस्पी रखते थे। हालांकि उन्होंने 25 जनवरी, 1700 में ही अपने पिता की मृत्यु के बाद सत्ता संभाली थी लेकिन गणित व ज्योतिष से उसका रिश्ता नहीं छूटा। वर्ष 1727 में उन्होंने इन्हीं विषयों की अधिक जानकारी जुटाने के लिए अपने विद्वानों का एक दल यूरोप की ओर भेजा था। इस दल ने गैलीलियो, कॉपरनिक्स व न्यूटन के बारे में अनेक तथ्य-परक दस्तावेज एकत्र किए और उन्हीं को आधार बनाकर ‘जन्तर-मन्तर’ का निर्माण आरंभ कराया गया।
दिल्ली का यह ‘जन्तर मन्तर’ एक खगोलीय वेधशाला है। यह इमारत प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है। वैसे दिल्ली का जंतर-मंतर समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है। उन दिनों हिन्दू और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों में ग्रहों की स्थिति को लेकर बहस छिड़ गई थी। इसे खत्म करने के लिए सवाई जय सिंह ने जंतर-मंतर का निर्माण करवाया था। ग्रहों की गति नापने के लिए यहां विभिन्न प्रकार के उपकरण लगाए गए थे। सम्राट-यंत्र सूर्य की सहायता से वक्त और ग्रहों की स्थिति की जानकारी देता है। जब मिस्र यंत्र वर्ष के सबसे छोटे और सबसे बड़े दिन को नाप सकता है। राम-यंत्र और जय प्रकाश यंत्र खगोलीय पिंडों की गति के बारे में बताते हंै।
उन्होंने अपने कार्यकाल में बहुत से खगोल विज्ञान से सम्बंधित यंत्र एवम पुस्तकें भी एकत्र कीं। प्रमुख खगोलशास्त्रियों को विचार हेतु एक जगह एकत्र भी किया। हिन्दू, इस्लामिक और यूरोपीय खगोलशास्त्री सभी ने उनके इस महान कार्य में अपना बराबर योगदान दिया। अब न तो ‘जेन जी’ को फुर्सत है, न ही किसी अन्य युवा संगठन को कि वे उस परिवार को देखें तो सही, जिसे वे रौंदते चले जा रहे हैं। राजा जय सिंह तथा उनके राज ज्योतिषी पं. जगन्नाथ ने इसी विषय पर ‘यंत्र प्रकार’ तथा ‘सम्राट सिद्धांत’ नामक ग्रंथ भी लिखे। 54 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु के बाद देश में ये वेधशालाएं बाद में बनने वाले तारामंडलों के लिए प्रेरणा और जानकारी का स्रोत रही हैं। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर में स्थापित राम-यंत्र के जरिए एक प्रमुख खगोलविद द्वारा विज्ञान दिवस पर आसमान के सबसे चमकीले ग्रह शुक्र की स्थिति नापी गयी थी। इस अध्ययन में नेहरू-तारामंडल के खगोलविदों के अलावा ‘एमेच्योर एस्ट्रोनामर्स एसोसिएशन’ और गैर सरकारी संगठन ‘स्पेस’ के सदस्य भी शामिल थे। कनॉट प्लेस स्थित स्थापत्य कला का यह अद्वितीय नमूना जंतर- मंतर दिल्ली के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यह एक वेधशाला है। इसमें 13 खगोलीय यंत्र लगे हुए हैं। जयपुर की बसावट के साथ ही तत्कालीन महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जंतर-मंतर का निर्माण कार्य शुरू करवाया।
इसका मुख्य भाग 70 फीट ऊंचा, आधार पर 114 फीट लंबा और 10 फीट मोटा है। इसमें 128 फीट लंबा (39 मीटर) कर्ण है जो पृथ्वी की धुरी के समानांतर है और उत्तरी ध्रुव की ओर इशारा करता है। त्रिभुज के दोनों ओर एक चतुर्भुज है जिसमें घंटे, मिनट और सैकेंड दर्शाने वाले अंश हैं। सम्राट-यंत्र के निर्माण के समय, सूर्यघड़ी पहले से ही मौजूद थी। यह सम्राट-यंत्र दो सेकंड तक की सटीकता से स्थानीय समय की गणना कर सकता है और इसे दुनिया की सबसे बड़ी सूर्यघड़ी माना जाता है। वर्तमान जंतर-मंतर के निर्माता राजा जस सिंह (द्वितीय) अपने समय के बहुत बड़े ज्योतिषी भी थे। उन्होंने अपनी ज्योतिषी-गणना के आधार पर आज वाली स्थिति का भी अनुमान लगा लिया था। अपने राज ज्योतिष पंडित जगन्नाथ के साथ मिलकर उन्होंने जो ज्योतिष-ग्रंथ भी रचा था, उसमें यह संकेत भी दिए गए थे कि कुछ दशकों के बाद यह परिसर अपना आकर्षण खो बैठेगा। मगर एकाध दशक बाद ही इसकी गरिमा बहाल हो जाएगी। बहरहाल वर्तमान स्थिति में देश एक ऐसे माहौल से गुजर रहा है जिसमें से गुजरने वाले स्वयं भी नहीं जानते कि उनकी दिशा क्या है? इन दिनों की उठा-पटक एक पूरे ‘कन्फ्यूजन’ के दौर से गुजर रही है।

Dr. Chander Trikha