भारत की स्वतन्त्रता के बाद हमने जिस संवैधानिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाया उसमें विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व चुनाव आयोग का एेसा चौखम्भा तन्त्र था जिसकी बुनियाद पर पूरी व्यवस्था खड़ी होती थी। इसमें भी हमारे संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका व चुनाव आयोग को सरकार का अंग नहीं बनाया और सुनिश्चित किया कि भारत का संविधान इस देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को जो एक वोट का अधिकार देता है, उसके आधार पर बहुमत से बनी सरकार सर्वदा संविधान के प्रति ही उत्तरदायी रहे , जिसकी जिम्मेदारी न्यायप्रणाली को दी गई। अतः भारत में स्वतन्त्र , निष्पक्ष व ‘अराजैतिक’ न्यायप्रणाली के जरिये प्रत्येक राजनैतिक दल पर यह जिम्मेदारी डाली गई कि वह बहुमत के आधार पर सत्ता में आने पर पूरी लोकतान्त्रिक प्रणाली को केवल संविधानोन्मुख ही बनाये रखे। विधायिका को संविधान में संशोधन करने व नये कानून बनाने का अधिकार देने के साथ ही न्यायपालिका को एेसे सभी कृत्यों को संविधान की कसौटी पर कसने की छूट केवल इसलिए दी गई जिससे किसी भी परिस्थिति में भारत में संविधान के शासन की उल्लंघना न हो।
इस नजरिये से देखें तो भारत के लोकतन्त्र में न्यायपालिका का स्थान एेसे पवित्र स्थल के रूप में निरूपित हुआ जिसके समक्ष प्रत्येक राजनैतिक दल की सरकार को अपने कामों की सफाई देनी होती है। अतः न्यायपालिका की प्रक्रियागत व्यवस्था में जिन खामियों की चर्चा कक्षा आठ के पाठ्यक्रम में शामिल ‘न्यायपालिका और भ्रष्टाचार’ के अध्याय में की गई है वह पूरी तरह से बेमानी और बदनीयती से प्रेरित है क्योंकि एेसा करके अध्याय के लेखकों ने इस कक्षा में पढ़ने वाले बालमन में लोकतन्त्र की शुद्धता के प्रति प्रारम्भ से ही सशंकित होने का भाव जगाने का काम कर डाला है। यह सौभाग्य की बात है कि इसका संज्ञान स्वयं देश की सर्वोच्च अदालत ने लिया और पाठ्य पुस्तक प्रकाशित करने वाली संस्था राष्ट्रीय शिक्षा अनुसन्धान परिषद (एनसीईआरटी) व शिक्षा मन्त्रालय को नोटिस जारी किया तथा पुस्तक के किसी भी प्रकार को प्रचार – प्रसार पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस पुस्तक को अब कक्षा आठ के पाठ्यक्रम से वापस ले लिया गया है परन्तु असली सवाल यह है कि सरकारी नियन्त्रण में चलने वाली संस्था एनसीईआरटी द्वारा इस प्रकार का प्रयास क्यों किया गया जिसे सभी सरकारी मंचों से स्वीकृति भी मिल गई। कक्षा आठ के सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रम में भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के विभिन्न अवयवों के बारे में छात्रों को ज्ञान दिया जाता है अतः उन्हें केवल उस प्रणाली के बारे में ही ज्ञान देना जरूरी होता है जिसके आधार पर इस देश की शासन व्यवस्था चलती है। इसकी प्रक्रियागत रूप रेखा के गुण दोषों को जानने का अवसर विद्यार्थियों को ऊंची कक्षाओं में जाकर प्राप्त होता है । ऊंची कक्षाओं में जाकर विद्यार्थियों को पता चलता है कि वे जिस व्यवस्था में जी रहे हैं उसमें किस प्रकार विभिन्न खामियों का प्रवेश हो चुका है मगर शुरू में ही विद्यार्थियों को यदि बता दिया जाये कि हमारे संविधान निर्माताओं ने जिस स्वतन्त्र न्याय प्रणाली की स्थापना की है। वह अपना कार्य पवित्रता से करने में अक्षम है तो इससे बालमन में उस संस्था के प्रति हेय दृष्टि विकसित होती है जिससे समूचे समाज व राष्ट्र में उसकी प्रतिष्ठा को धक्का लगता है। अतः प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस बारे में प्राथमिक जानकारी लेने की खबर को भी हम अनदेखा नहीं कर सकते हैं। उन्होंने मंत्रिमंडल की बैठक में शिक्षा मन्त्री से पूछा कि पाठ्यक्रम बनाने का काम कौन देख रहा है ? जहां तक भ्रष्टाचार का सम्बन्ध है तो यह सर्वव्यापि व्याधि है जिससे अब शासन का कोई भी अंग मुक्त नहीं समझा जा सकता लेकिन यह भी सच है कि सर्वाधिक चर्चा विधायिका में ही व्याप्त भ्रष्टाचार की होती है। इसका सीधा सम्बन्ध देश की राजनीति से होता है।
पूरे भारत के लोग जानते हैं कि किस प्रकार 2014 तक चली मनमोहन सरकार को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते ही देश की जनता ने उसे सत्ता से बाहर किया। मगर इसका मतलब यह कहां निकलता है कि हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया गया है? क्या हम अपने विद्यार्थियों को यह पढ़ा सकते हैं कि भारतीय लोकतन्त्र का सबसे अहम व सर्वोच्च स्तम्भ ‘विधायिका’ भ्रष्टाचार की वजह से खोखला हो चुका है। इसी प्रकार कार्यपालिका के भ्रष्टाचार के बारे में भी नागरिक जैसे -जैसे बड़े होते जाते हैं वैसे–वैसे ही विभिन्न सूचना माध्यमों से जाने जाते हैं। मगर जब हम किसी विद्यार्थी को प्रारम्भिक कक्षाओं में देश की शासकीय प्रणाली में बताते हैं तो उसे आधारभूत अवयवों की शिक्षा ही देते हैं। जाहिर है कि जब विद्यार्थी ऊंची कक्षाओं में जायेंगे तो इनके प्रक्रियागत दोषों के प्रति स्वयं ही शिक्षा ग्रहण करते हुए जानेंगे। अतः एनसीईआरटी ने न्यायपालिका को लेकर जिस प्रकार का नजरिया अपनाया वह भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को पूरी तरह शर्मसार करने वाला था। मगर एेसा करके इस संस्था ने खुद की ही विश्वसनीयता को सन्देह के घेरे में खड़ा कर दिया है क्योंकि इससे यही सिद्ध होता है कि इसका संचालन करने वाले एेसे लोग हैं जिन्हें यह तक नहीं पता कि उनकी इस देश के विकास में क्या भूमिका है। किसी भी देश का विकास उसके नागरिकों द्वारा ही किया जाता है। यदि इन नागरिकों के मन में बालपन से ही यह बीज बो दिया जायेगा कि वे जिस व्यवस्था में जी रहे हैं वह मानवीय कमजोरियों की वजह से बंजर बन चुकी है तो फिर उसमें अच्छा नागरिक बन कर व्यवस्था को सुधारने का जज्बा खत्म होने लगेगा। इससे उसके जीवन के आदर्श बदलने लगेंगे । हमे नहीं भूलना चाहिए कि भारत वह देश है जिसमें सम्राट विक्रमादित्य के ‘आसन’ को न्याय का सिंहासन मानने की कथाएं आज भी प्रचिलित हैं। स्वतन्त्र भारत में न्यायपालिका का इतिहास भी कमोबेश इसी मान्यता के इर्द- गिर्द घूमता भी रहा है।
न्यायपालिका और विद्यार्थी !
Summary :
भारत की स्वतन्त्रता के बाद हमने जिस संवैधानिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाया उसमें विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व चुनाव आयोग का एेसा चौखम्भा तन्त्र था जिसकी बुनियाद पर पूरी व्यवस्था खड़ी होती थी। इसमें भी हमारे संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका व चुनाव आयोग को सरकार का अंग नहीं बनाया और सुनिश्चित किया कि भारत का संविधान इस देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को जो एक वोट का अधिकार देता है, उसके आधार पर बहुमत से बनी सरकार सर्वदा संविधान के प्रति ही उत्तरदायी रहे , जिसकी जिम्मेदारी न्यायप्रणाली को दी गई। अतः भारत में स्वतन्त्र , निष्पक्ष व ‘अराजैतिक’ न्यायप्रणाली के…


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