बरसात शुरू होते ही शहरों की गलियों-मोहल्लों में पानी जमा होना शुरू हो जाता है। मौसम विभाग अगर सही अनुमान लगाता है तो मूसलाधार बारिश के अनुमान के बावजूद देश के हर शहर में बरसात के गंदे पानी के तालाबों के बीच नारकीय जिंदगी जीने को मजबूर क्यों हो जाते हैं? हर साल यही कहानी दोहराई जाती है लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी क्या केवल सरकार की है? क्या नागरिकों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं? क्या कारण हैं कि हर साल मानसून में देश के कई शहर नदी-नालों में तब्दील हो जाते हैं? सरकार की बात करें तो इसके तीन बड़े कारण हैं।
पहला, बिना योजना के बसी कॉलोनियां और प्रशासन की आंख मूंदकर दी गई अनुमति। सड़क, नाली, सीवर… कुछ भी सही न हो तो भी कॉलोनी पास। दूसरा, नालियों और सीवर में ठोस कचरा जमा होना, क्योंकि स्थानीय निकाय अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाते। तीसरा और सबसे खतरनाक, हर दो-तीन साल में सड़कों की ऊंचाई बढ़ा देना जिससे आसपास के मकानों का तल हमेशा नीचे होता जाता है और पानी भराव की मुख्य वजह बन जाता है।
पहले दो कारणों पर तो हर साल मीडिया में शोर मचता रहता है लेकिन सड़क का बार-बार ऊंचा होना कोई नहीं पूछता। क्यों? क्योंकि जितनी मोटी सड़क बिछाई जाएगी, ठेकेदार और इंजीनियरों का मुनाफा उतना ही बढ़ेगा। पहली बार अच्छी गुणवत्ता की सड़क बना दी जाए तो बार-बार बनाने की जरूरत ही न पड़े। थोड़े-बहुत पैचवर्क से काम चल सकता है, वहां भी पूरी नई सड़क डाल दी जाती है। बिना इस बात का लिहाज किए कि सड़क के दोनों तरफ रहने वाले आम लोगों की इतनी हैसियत नहीं होती कि वे हर दो साल में अपने घर का फर्श ऊंचा करा लें।
यदि विदेशों से तुलना की जाए तो एक बार भी ऐसा नहीं देखा कि विदेशों की किसी कॉलोनी की सड़क अचानक ऊंची हो गई हो या किसी मकान का फर्श सड़क से नीचे हो गया हो। सौ साल पुराने मकानों में भी यह समस्या नहीं है। न सड़क का स्तर बढ़ा, न घर का फर्श नीचा हुआ तो हमारे इंजीनियरों की अक्ल पर क्या पत्थर पड़ गए हैं? या समझते तो हैं लेकिन रिश्वत की हवस में करोड़ों लोगों की जिंदगी में हर दो-चार साल मुसीबत खड़ी कर देते हैं लेकिन सिर्फ सरकार को कोसना काफी नहीं। हमें खुद को भी आईना दिखाना होगा। अवैध निर्माण, मानकों से ज्यादा मंजिलें, नालियों में कचरा फेंकना, ये सब हम खुद करते हैं।
ग्रामीण जीवन में जो सामूहिक जिम्मेदारी की भावना थी, शहर आकर हम भूल गए। कहने को शहरी हैं लेकिन व्यवहार जंगली जैसा। आजकल सोशल मीडिया पर कुछ रील्स वायरल हो रही हैं। उनमें आम नागरिक दिखते हैं जो हाथ में फावड़ा-झाड़ू लेकर सड़क पर खड़े हैं। ये लोग जल भराव वाली सड़कों पर नालियों से प्लास्टिक, पॉलीथीन, गंदगी निकालते हुए देखें जाते हैं। कोई सरकारी विभाग का इंतजार नहीं कर रहा। खुद अपना इलाका साफ कर रहे हैं ताकि बारिश का पानी रुक न जाए। ये छोटी-छोटी कोशिशें ही असल बदलाव ला सकती हैं।
ज़रूरत है तो संगठित होने की। हम संबंधित अधिकारियों से सवाल पूछें। उनसे पूछें कि सड़क का स्तर हर दो साल में क्यों बढ़ाया जाता है। और अगर वे जवाब न दे पाएं तो दबाव बनाएं कि सड़क को उसके मूल स्तर पर लाया जाए।
आज जरूरत है कि हम उन वायरल रील्स वाले नागरिकों से सीखें। ज़रूरत पड़ने पर खुद निकलकर नालियां साफ करें, कचरा न फेंकें, और साथ मिलकर प्रशासन पर दबाव बनाएं। समस्या तभी घटेगी जब हम अपनी उदासीनता छोड़कर खुद आगे बढ़ेंगे।
याद रखें, सरकार और प्रशासन तभी जागते हैं जब नागरिक जाग जाते हैं। अगर हम सिर्फ कोसते रहे और खुद कुछ न किया तो अगले साल फिर वही पानी, वही गंदगी और वही शिकायतें होंगी लेकिन अगर हमने उन वायरल रील्स वाले नागरिकों की तरह जिम्मेदारी संभाली तो बदलाव जरूर आएगा। नाली साफ करना शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात है। क्योंकि यही असली देशभक्ति हैं, अपने आसपास को साफ और सुरक्षित रखना। समय आ गया है कि हम सिर्फ शिकायत न करें, बल्कि समाधान का हिस्सा बनें।


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