कम महत्वपूर्ण नहीं था 17 अगस्त

Summary :

14-15 अगस्त के बाद 17 अगस्त भी कम महत्वपूर्ण नहीं था, त्रासद घटनाओं से अटे विभाजन-विभीषिका के 48 घंटे और स्वाधीनता दिवस का जश्न, दोनों बीत चुके। मगर 17 अगस्त भी कम महत्वपूर्ण नहीं। वर्ष 1947 की 17 अगस्त वो तारीख थी, जिस दिन बंटवारे का दस्तावेज तैयार करने वाले रैडक्लिफ ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन वायसराय को सौंपी थी। यानी 15 अगस्त की प्रात: लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन के समय प्रथम प्रधानमंत्री श्री नेहरू को पता नहीं था कि वह जिस राष्ट्र को सम्बोधित कर रहे थे, उसकी सीमाएं कहां तक थीं? विभाजन विभीषिका…

14-15 अगस्त के बाद 17 अगस्त भी कम महत्वपूर्ण नहीं था, त्रासद घटनाओं से अटे विभाजन-विभीषिका के 48 घंटे और स्वाधीनता दिवस का जश्न, दोनों बीत चुके। मगर 17 अगस्त भी कम महत्वपूर्ण नहीं। वर्ष 1947 की 17 अगस्त वो तारीख थी, जिस दिन बंटवारे का दस्तावेज तैयार करने वाले रैडक्लिफ ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन वायसराय को सौंपी थी। यानी 15 अगस्त की प्रात: लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन के समय प्रथम प्रधानमंत्री श्री नेहरू को पता नहीं था कि वह जिस राष्ट्र को सम्बोधित कर रहे थे, उसकी सीमाएं कहां तक थीं?

विभाजन विभीषिका भारतीय इतिहास का एक ऐसा पन्ना है जिसे हर बार पलटने पर केवल खून के आंसुओं के निशान ही दिखाई देते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक महत्वकांक्षाओं और धार्मिक उन्माद ने किस तरह एक हंसते-खेलते उपमहाद्वीप को आग के हवाले कर दिया था। वर्ष 1947 में 14 और 15 अगस्त की मध्यरात्रि को सत्ता का हस्तांतरण हुआ और करोड़ों लोग अपने ही घर में बेगाने हो गए। इसका प्रभाव इतना भयावह हुआ कि हम आज तक भी विभाजन-विभीषिका से उत्पन्न दुख और त्रासदी से पूरी तरह उबर नहीं पाए।

इस त्रासदी में लगभग डेढ़ करोड़ लोग अपने घरों से उजड़ गए, जबकि इस दौरान प्राण खोने वालों की संख्या को लेकर कोई एक राय नहीं है। हालांकि इतिहासकार मानते हैं कि वह आंकड़ा दस से पंद्रह लाख के बीच था। इस त्रासदी की सबसे बड़ी विडंबना यह सीमा रेखा थी, जिसे सर रैडक्लिफ ने खींचा था। प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर ने जब वर्ष 1971 में लंदन में रैडक्लिफ से मुलाकात की थी तो उन्होंने कई चौंकाने वाले खुलासे किए थे। रैडक्लिफ ने इस बातचीत में स्वीकार किया था कि उन्होंने शुरुआत में लगभग पूरा लाहौर शहर भारत के हिस्से में दे दिया था, क्योंकि लाहौर में हिंदू और सिख बहुसंख्यक थे लेकिन बाद में उन्हें यह एहसास हुआ कि यदि लाहौर भी भारत को दे दिया गया तो पाकिस्तान के पास कोई भी बड़ा शहर नहीं बचेगा।

इसी सोच के कारण उन्होंने अंतिम समय में अपना फैसला बदल दिया और लाहौर को पाकिस्तान के नक्शे में शािमल कर दिया। रैडक्लिफ के पास एक जटिल काम को पूरा करने के लिए केवल पांच से छह सप्ताह का ही समय था, जो इस भयंकर भूल का एक बड़ा कारण बना। विभाजन केवल धरती या नक्शे का नहीं था बल्कि यह हर उस चीज का था जिसे बांटा जा सकता था। यह प्रक्रिया कई बार बहुत हास्यास्पद भी हो गई थी। दोनों देशों के बीच अचल संपत्तियों के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों के फर्नीचर, लाइट-बल्ब और स्टेशनरी तक का बंटवारा हुआ था। दफ्तरों में कर्मचारी अपने सबसे अच्छे टाइपराइटर छिपाने लगे थे।

पुस्तकालयों में रखे गए विश्वकोशों और शब्दकोशों को भी बीच से फाड़ दिया गया, जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के ‘ए’ से लेकर ‘के’ तक के अक्षर वाले पन्ने भारत को मिले और बाकी के पन्ने पाकिस्तान के हिस्से में चले गए। संपत्ति और खजाने के बंटवारे ने भी दोनों देशों के बीच भारी विवाद खड़े किए थे। समझौते के तहत भारत को नकद शेष राशि के रूप में पाकिस्तान को पचहत्तर करोड़ रुपए देने थे, जिसमें से बीस करोड़ रुपए तुरंत दे दिए गए थे और शेष राशि पर लंबा विवाद चला था। सेना के बंटवारे में दो लाख साठ हजार सैनिकों ने भारतीय सेना को चुना और एक लाख चालीस हजार सैनिक पाकिस्तान चले गए।

भारत के वायसराय को सोने और चांदी से जड़ी बारह बग्घियों का बंटवारा सिक्का उछाल कर किया गया था।
वहीं वन विभाग के स्वामित्व वाली जॉयमनी नाम की एक कीमती हथिनी को लेकर भारी विवाद हुआ और अंतत: पूर्वी बंगाल के हिस्से में गई। विभाजन के दौरान हुए विस्थापन ने मानवता को पूरी तरह से शर्मसार कर दिया था।

– अब तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार हरियाणा-पंजाब में 65 शरणार्थी शिविर लगे थे, मगर तत्कालीन पुनर्वास मंत्रालय इस संख्या को अधूरी मानता था।
– इनमें से सबसे बड़ा शिविर कहां लगा था इस बारे में भी अभी तक प्रामाणिक तथ्य सामने नहीं आ पाया। यदि शिविरों पहली पंक्ति पर दृष्टि डाली जाए तो प्रमुख शिविरों में कुरुक्षेत्र (नीलोखेड़ी, कैथल, करनाल, अम्बाला शहर (बलदेव नगर कैम्प), पानीपत (समालखा सहित), सोनीपत, राजपुरा और फाजिल्का (पंजाब), किंग्जवे कैम्प, पुराना किला (दिल्ली) आदि थे। इन शिविरों में वितरित राशन, टैंट-वस्त्रों आदि का पूरा विवरण मिल पाना संभव भी नहीं है।
– इसी क्रम में यह प्रश्न भी अभी तक अनुत्तरित है कि सीमा पर लापता महिलाओं के लिए जो शिविर लगाए गए थे, वहां दर्ज लापता महिलाओं की संख्या कितनी थी? आंकड़े 85 हजार तक जाते हैं, मगर मृदुला साराभाई व उनके कुछ सहयोगी यह भी मानते थे कि यह आंकड़ा लाखों में था। लाखों लापता महिलाओं के विवरण मिल ही नहीं पाए।
अब कुछेक ज्वलंत प्रश्नों तक सीमित रखना आवश्यक हो चला है।
1. पहला प्रश्न: भारतीय इतिहास की इस भयावह त्रासदी के लिए जिम्मेदार कौन-कौन थे?
2. दूसरा प्रश्न: यह है कि हमें शुरुआती दौर में विकृत इतिहास क्यों पढ़ाया जाता रहा? जो घटनाओं के लिए खलनायक थे, उन्हें महानायक बनाकर क्यों पेश किया गया।
3. तीसरा प्रश्न: हमारी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत से जुड़ा है। क्या हमें सिंध के हिंगलाज माता मंदिर, मुल्तान के आदित्य मंदिर, और अब प्रहलाद मंदिर, पाक-पंजाब के कटासराज, लाहौर के जैन मंदिर व श्री ननकाना साहब, पंजा साहब आदि के दर्शनों से अब तक वंचित रखा जा रहा है।इन प्रश्नों का अंतिम छोर कहीं नहीं मिलेगा।
1. निष्कर्ष रूप में हमें मुख्य शिविर स्थलों पर विभीषिका से जुड़े तथ्यों के संग्रहालय स्थापित करने होंगे।
2. हर वर्ष सामूहिक रूप से दिवंगत शरणार्थियों के श्राद्ध आदि सम्पन्न हों। यह उन्हें व उनके बलिदानों को याद करने का एक सत्कर्म होगा।
3. नई पीढ़ी के लिए हमें उस काल की जुझारू पीढ़ी का पूरा विवरण एकत्र करना होगा जो लुटे-पिटे खाली हाथ आए थे और जिन्होंने पानीपत, सोनीपत, अम्बाला, करनाल व दिल्ली आदि स्थानों पर सफलता के लिए सोपान रचे, शरणार्थी का चोगा उतार कर पुरुषार्थी बने और नया भारत रचा। ऐसी प्रामाणिक जानकारी ‘जेन जी’ व अन्य नई पीढि़यों के लिए भी प्रेरणा की ​िमशाल बनेगी।

Dr. Chander Trikha