कनाडा के कैलगरी शहर में आयोजित तथाकथित “नगर कीर्तन” के दौरान जिस प्रकार खुलेआम खालिस्तानी झंडे लहराए गए और अलगाववादी नारों का प्रदर्शन किया गया, उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कनाडा की धरती को कुछ कट्टरपंथी तत्व भारत विरोधी गतिविधियों का मंच बनाने में लगे हुए हैं। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक आयोजनों की आड़ में खालिस्तान समर्थक समूह जिस तरह अपनी विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं, वह केवल भारत की संप्रभुता के लिए ही नहीं, बल्कि कनाडा की सामाजिक एकता और अंतर्राष्ट्रीय छवि के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। यह एक ऐसा भव्य प्रदर्शन बन गया जिसने कनाडा में अब भी जीवित कट्टर खालिस्तानी उग्रवाद की सच्चाई को उजागर कर दिया। हजारों लोग डैशमेश कल्चर सेंटर से प्रेयरी विंड्स पार्क तक मार्च करते दिखाई दिए लेकिन सबसे अधिक ध्यान खालिस्तान के झंडों ने खींचा जो खुलेआम लहराए जा रहे थे। जिस कार्यक्रम को एक शांतिपूर्ण सांस्कृतिक आयोजन बताया गया था, वह शीघ्र ही हिंसक, काल्पनिक और स्वार्थपूर्ण आंदोलन के खुले प्रदर्शन में बदल गया।
कैलगरी की सड़कों पर जिस प्रकार खालिस्तान समर्थक प्रतीकों और नारों का प्रदर्शन हुआ, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि कुछ लोग धर्म की पवित्रता का उपयोग अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कर रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि कनाडा की सरकारें लंबे समय से ऐसे तत्वों के प्रति नरम रवैया अपनाती रही हैं। वोट बैंक की राजनीति और तथाकथित बहुसांस्कृतिकता के नाम पर कट्टरपंथी संगठनों को खुली छूट दी गई। परिणामस्वरूप आज कनाडा में खालिस्तान समर्थक समूह खुलेआम धन संग्रह करते हैं, युवाओं को भड़काते हैं और भारत विरोधी वातावरण तैयार करते हैं। इससे न केवल भारत-कनाडा संबंधों में तनाव बढ़ा है, बल्कि कनाडा के आम नागरिकों को भी भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। कनाडा को यह समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उग्रवाद के समर्थन में बहुत बड़ा अंतर है। किसी लोकतांत्रिक देश के विघटन की मांग करना, हिंसक विचारधारा को बढ़ावा देना और विदेशी धरती पर नफरत फैलाना किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। यदि समय रहते इस कट्टरवाद पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इसका दुष्परिणाम कनाडा की सामाजिक शांति और वैश्विक प्रतिष्ठा दोनों पर पड़ेगा। भारत ने सदैव आतंकवाद और अलगाववाद के विरुद्ध कठोर रुख अपनाया है। अब समय आ गया है कि कनाडा सरकार स्पष्ट और कठोर कदम उठाए। धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक उग्रवाद का मंच बनने से रोका जाए, कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाए और कानून व्यवस्था को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जाए। बहुसांस्कृतिकता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि देश विरोधी या विभाजनकारी विचारधाराओं को संरक्षण दिया जाए।
खालिस्तान का विचार इतिहास में असफल हो चुका है।
पाकिस्तान में सिख गुरुओं का अपमान : हाल ही में पाकिस्तान से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक व्यक्ति गुरु नानक देव जी की तस्वीर दिखाकर तंत्र-मंत्र, काला जादू, संतान प्राप्ति, प्रेम पाने, वैवाहिक तनाव दूर करने, प्रेमीयों को मिलाने या उनसे छुटकारा पाने, शक्ति प्राप्ति जैसी समस्याओं का “गुरु नानक देव जी की कृपा” से हल करने का दावा कर रहा है। यह न केवल अत्यंत आपत्तिजनक है, बल्कि सिख धर्म की मूल शिक्षाओं के भी पूरी तरह विरुद्ध है। सिख धर्म हमेशा से अंधविश्वास, पाखंड और कर्मकांडों के खिलाफ मजबूती से खड़ा रहा है। सिख गुरुओं ने मानवता को सत्य, सेवा, नाम सिमरन और ईमानदार जीवन का मार्ग दिखाया। सिख इतिहास इस बात का गवाह है कि गुरुओं ने कभी चमत्कारों या अलौकिक शक्तियों को धर्म का आधार नहीं बनने दिया। बल्कि जब चमत्कार दिखाने का प्रश्न उठा, तब गुरुओं ने अपने पुत्रों तक को स्पष्ट संदेश दिया कि सिख पंथ में पाखंड और चमत्कारवाद के लिए कोई स्थान नहीं है। ऐसे में गुरु नानक देव जी के नाम का उपयोग तंत्र-मंत्र और काले जादू जैसी गतिविधियों के प्रचार के लिए करना सिख सिद्धांतों और आस्था का सीधा अपमान है। इसे केवल किसी एक व्यक्ति की हरकत कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सवाल भी गंभीरता से उठता है कि क्या पाकिस्तान में इस प्रकार की गतिविधियाँ किसी सुनियोजित मानसिकता या कुछ एजेंसियों के संरक्षण में चलाई जा रही हैं। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान की धरती से समय-समय पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने और पंजाब का माहौल खराब करने की कोशिशें होती रही हैं। हाल के समय में पंजाब में अशांति फैलाने के उद्देश्य से हुए विस्फोटों और अन्य घटनाओं में भी पाकिस्तान समर्थित तत्वों की भूमिका पर संदेह जताया गया है।
सिख धर्म में महिलाओं की भूमिका : भारतीय समाज में लंबे समय तक महिलाओं को पुरुषों से कम माना जाता रहा, लेकिन सिख धर्म ने शुरुआत से ही स्त्री और पुरुष को समान दर्जा दिया। सिख गुरुओं ने महिलाओं को केवल परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें समाज, धर्म और नेतृत्व में भी महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया। सिख इतिहास ऐसी महान महिलाओं से भरा पड़ा है जिन्होंने साहस, त्याग और सेवा की अद्भुत मिसाल पेश की। गुरु नानक देव जी ने महिलाओं के सम्मान का संदेश देते हुए कहा: “सो क्यों मंदा आखीऐ जितु जम्मे राजान।” इस विचार ने उस समय की संकीर्ण सोच को चुनौती दी। सिख धर्म में महिलाओं को शिक्षा, धार्मिक कार्यों, कीर्तन, सेवा और नेतृत्व में समान अधिकार दिए गए। सिख इतिहास में बीबी भानी जी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है जो गुरु अमर दास जी की पुत्री और गुरु राम दास जी की पत्नी थीं। इसी प्रकार माता गुजरी जी ने कठिन परिस्थितियों में भी अद्भुत धैर्य और साहस दिखाया। उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपने पोतों साहिबजादों के बलिदान के समय भी अटूट विश्वास बनाए रखा। उनका त्याग और धैर्य सिख इतिहास की अमूल्य विरासत है। माता साहिब कौर जी को “खालसा की माता” कहा जाता है। खालसा पंथ की स्थापना के समय उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। वह प्रेम, दया और आध्यात्मिक शक्ति की प्रतीक मानी जाती हैं। उन्होंने खालसा को केवल वीरता ही नहीं, बल्कि करुणा और मानवता का मार्ग भी दिखाया। इसी प्रकार सिख इतिहास की वीरांगनाओं में माई भागो जी का नाम भी अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने युद्धभूमि में सैनिकों का नेतृत्व किया और साहस का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किय। इसके अतिरिक्त माता खीवी जी ने लंगर परंपरा को मजबूत बनाकर सेवा और समानता का संदेश दिया। सिख धर्म ने पर्दा प्रथा, सती प्रथा और दहेज जैसी कुरीतियों का विरोध किया तथा महिलाओं को आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान प्रदान की। करोल बाग से पूर्व पार्षदा बीबी मनदीप कौर बख्शी का मानना है कि विदेशी सांस्कृति को देखते हुए साल में एक दिन महिलाओं को सम्बोधित कर मदर्स डे, वूमेन डे, डाटर्स-डे मनाने से कुछ नहीं होगा हर धर्म के लोगों को साल के 365 दिन महिलाओं का सम्मान करना चाहिए और खासकर महिलाओं को अपने बच्चों को बचपन से ही इसकी शिक्षा देनी चाहिए तभी समाज में बदलाव लाया जा सकता है।
कनाडा की सड़कों पर खालिस्तानी उन्माद
Summary :
कनाडा के कैलगरी शहर में आयोजित तथाकथित “नगर कीर्तन” के दौरान जिस प्रकार खुलेआम खालिस्तानी झंडे लहराए गए और अलगाववादी नारों का प्रदर्शन किया गया, उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कनाडा की धरती को कुछ कट्टरपंथी तत्व भारत विरोधी गतिविधियों का मंच बनाने में लगे हुए हैं। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक आयोजनों की आड़ में खालिस्तान समर्थक समूह जिस तरह अपनी विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं, वह केवल भारत की संप्रभुता के लिए ही नहीं, बल्कि कनाडा की सामाजिक एकता और अंतर्राष्ट्रीय छवि के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। यह एक…


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