खड़गे का गहलोत प्रेम…

Summary :

पिछले दिनों कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट राजस्थान के अपने कुछ समर्थक नेताओं के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलने पहुंचे। मीटिंग की शुरूआत में ही खड़गे ने पायलट से स्पष्ट कर दिया कि ’आप राजस्थान में कांग्रेस को और सक्रिय करने की बात करें, पर अशोक गहलोत के खिलाफ कृपया शिकायतों का पिटारा न खोलें, पिछले कुछ समय में मैं आपसे कम से कम चार बार मिला हूं और आपने हर बार ऐसा ही किया है, आपकी बात अशोक गहलोत से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म हो जाती है। इस बारे में हमें भाजपा से सीखना चाहिए…

पिछले दिनों कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट राजस्थान के अपने कुछ समर्थक नेताओं के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलने पहुंचे। मीटिंग की शुरूआत में ही खड़गे ने पायलट से स्पष्ट कर दिया कि ’आप राजस्थान में कांग्रेस को और सक्रिय करने की बात करें, पर अशोक गहलोत के खिलाफ कृपया शिकायतों का पिटारा न खोलें, पिछले कुछ समय में मैं आपसे कम से कम चार बार मिला हूं और आपने हर बार ऐसा ही किया है, आपकी बात अशोक गहलोत से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म हो जाती है। इस बारे में हमें भाजपा से सीखना चाहिए कि वहां पार्टी शीर्ष व्यक्तिगत आलोचनाओं को बर्दास्त नहीं करता।’ खैर, जैसे-तैसे यह मीटिंग खत्म हुई और ये नेतागण बाहर निकले तो सचिन पायलट के साथ इस बैठक में शिरकत कर रहे राजस्थान के एक विधायक के फोन पर अशोक गहलोत का फोन आ धमका-दूसरी ओर से गहलोत ने एक चेतावनीपूर्ण लहजे में अपनी पार्टी के विधायक से कहा- ‘जब अगली बार आपका टिकट अटक जाए तो कृपया मदद के लिए मुझे मत फोन करिएगा।’ विधायक बस इतना ही कह पाए-‘सर, मुझे तो अध्यक्ष जी से मिलना था इसीलिए गया था मैं वहां ?’ अब तक सचिन यह सारा माजरा समझ चुके थे कि कैसे उनकी पार्टी में अब भी बुजुर्गों का ही बोलबाला है।
अब क्या करेंगे राहुल
संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से ठीक पहले राहुल गांधी कांगेस के 4-5 फायर ब्रांड नेताओं से मिले जिसमें सचिन पायलट, गौरव गोगोई, दिनेश गुंडुराव और दिल्ली के कुछ युवा नेता शामिल थे। कहते हैं बातों-बातों में राहुल ने बताया कि उन्हें यह गलतफहमी थी कि मोदी 26-27 में राजनीति से संन्यास लेकर पीएम पद छोड़ देंगे, अब तो लगता है कि हमें 2029 और 2034 लोकसभा चुनावों में सीधे मोदी से ही भिड़ना होगा। इन युवा नेताओं ने राहुल से जानना चाहा कि ऐसी अधूरी सियासी जानकारियां उन्हें कौन उपलब्ध कराता है, तो फिर बातों ही बातों में योगंेद्र यादव और अनिल जयहिंद के नाम उभर कर सामने आए। जयहिंद आल इंडिया ओबीसी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और शरद यादव को अपना राजनीतिक गुरु मानते रहे हैं। इन युवा नेताओं को तब समझ में आया कि पूरे बिहार चुनाव में राहुल केवल ‘पिछड़ा’ खटराग ही क्यों अलाप रहे थे। फिर तय हुआ कि कांग्रेस को वामपंथी रुझानों से अलहदा मध्यमार्गी राह अपनानी है। बैठक में मौजूद दिल्ली के एक प्रभावशाली नेता ने बेखटके राहुल से कहा कि ‘गांधी सरनेम’ अब से पहले हमारा 10 फीसदी वोट बढ़ा देता था, पर पिछले कुछ चुनावों से यह प्रवृति भी ओझल हो गई है। गांधी नाम से पार्टी एकजुट बनी रहती थी, पर अब तो इस अवधारणा को भी झटका लगा है, धीरे-धीरे लोग पार्टी छोड़ रहे हैं। हमें नए सिरे से इन बातों पर विचार करना होगा। आप पार्टी नेताओं से वादे करके मुकर जाते हैं। छत्तीसगढ़ में सिंहदेव साहब को सीएम नहीं बनाने से पार्टी को इसका नुक्सान उठाना पड़ा, अभी कर्नाटक में अब वादा करके डीके को नहीं बनाएंगे तो हाईकमान के वचन से नेताओं का भरोसा उठेगा।’ राहुल ने चुप रह कर पार्टी के इस पुराने नेता की बातों को ध्यानपूर्वक सुना, पर कहा कुछ भी नहीं।
संघ के बदलते रंग
त्याग, तपस्या, समर्पण की बात हुई पुरानी, अब संघ के नेताओं ने ‘चार्वाक दर्शन’ अपनाने की है ठानी। संघ के एक शीर्ष नेता की बंगलुरू के पॉश कोर मंगला इलाके में एक शानदार बिल्डिंग का निर्माण हुआ जिसका एक फ्लोर नेताजी के नाम पर है, दूसरा उनके भाई और तीसरा फ्लोर इनकी बहन के हिस्से आया है। इस भवन के निर्माण में एक स्थानीय भाजपा विधायक का सक्रिय समर्थन मिला है, जिनकी अपनी एक भवन निर्माण कंपनी है।
इस पूरी संपत्ति को एक फैमिली संचालित ट्रस्ट की परिधि में दिखलाया गया है।
स्वराज कौशल जी का यूं चले जाना…
पिछले कुछ समय से उनकी तबियत थोड़ी नासाज चल रही थी, वे एम्स के डॉक्टरों की गहन निगरानी में थे, घर पर ही आराम फरमा रहे थे, दवाईयों और दुआओं का असर साथ हुआ, उनके स्वास्थ्य में एक निरंतर सुधार आता दिखा, बातों ही बातों में इस नश्वर शरीर को छोड़ने से एक रोज पहले ही उन्होंने फोन पर बताया था कि ‘अब वे ठीक हो रहे हैं और इस दस दिसंबर से डॉक्टरों ने उनकी अधिकांश दवाईयां बंद कर देने को कहा है।’ पर किसको इस बात का इल्म था कि सब छोड़-छाड़ कर वे 4 दिसंबर को इस इह लोक से कूच कर जाएंगे। ठीक होने के क्रम में वे अपने कई मित्रों से आजकल में मिलने का वादा भी कर चुके थे, आमतौर पर वादाखिलाफी उनकी बनावट में शुमार नहीं थी, पर इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना नहीं की गई थी। नई दिल्ली के लोदी रोड स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर उनकी सबसे पसंदीदा जगहों में शुमार था, पर उनकी दिवंगत पत्नी सुषमा स्वराज संघ के पोषित विचारों में पली-बढ़ी थीं, उनकी पुत्री बांसुरी स्वराज आज नई दिल्ली से भाजपा की सांसद हैं। बावजूद इसके उन्होंने अपने मन के एक कोने में अपनी समाजवादी सोच को उतना ही अक्षुण्ण रखा था।
उन्हें शाहजहां रोड स्थित संघ लोक सेवा आयोग की पिछली लेन में अवस्थित चाट वाले से आलू टिक्की और भल्ले-पापड़ी अपनी गाड़ी में बैठे-बैठे ही खाना भी बहुत पसंद था। कोई तीन दशक तक नई दिल्ली का 8, सफदरंजग लेन ही उनका आ​शियाना रहा था, जो लुटियंस जोन का एक आलीशान बंगला है, जहां एक खूब बड़ा लॉन भी है। 2019 में जब अपने स्वास्थ्यगत कारणों से सुषमा स्वराज जी ने लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया तो केंद्र में दाेबारा बीजेपी शासन के आसीन होने के महज़ 15 दिनों के अंदर स्वराज दंपति ने अपना सरकारी घर खाली कर जंतर मंतर स्थित धवनदीप बिल्डिंग के एक छोटे से फ्लैट में शिफ्ट हो गए। स्वराज कौशल ने उन नई परिस्थितियों में भी खुद को बहुत तेजी से ढाल लिया। उन्हें साहित्य और इतिहास इन दो विषयों में गहरी अभिरुचि थी, पंजाबी साहित्य का भी उन्हें गहरा अध्ययन था। उनकी एक अधूरी हसरत रह गई कि वे चाहते थे कि उनकी पत्नी के जीवन पर आधारित एक फीचर फिल्म का निर्माण हो, इधर वे एक पुस्तक लिखने पर भी विचार कर रहे थे, सो इन दिनों वे अपने आईपैड पर ज्यादा से ज्यादा साहित्य, संस्कृति और इतिहास के बारे में पढ़ रहे थे, पर स्वराज कौशल के जाने से कई अनकहे किस्सों का खजाना भी उनके साथ ही चला गया है।
…और अंत में
राजस्थान के एक उत्साही भाजपा सांसद जो केंद्र में मंत्री बनने को आतुर हैं, पिछले दिनों उनकी मुलाकात भाजपा चाणक्य से हुई। सांसद महोदय ने अपने मन के उद्गार व्यक्त किए तो भाजपा के इस प्रमुख नेता ने जवाब में कहा कि फिलहाल उनके मंत्री बनने का कोई चांस नहीं है, क्योंकि अभी कैबिनेट फेरबदल होना नहीं है। जब इस मई में सरकार के दो वर्ष पूरे हो जाएंगे तब एक बड़ा फेरबदल संभव है, तब हम आप के बारे में सोच सकते हैं। यानी मोदी मंत्रिमंडल का अगला फेरबदल मई में, इंतजार कीजिए तब तक।

त्रिदीब रमण