यह हैडिंग मेरा नहीं है। यह मैंने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से चुराया है। वह देशभर में यह जानने के लिए अभियान चलाना चाहते हैं कि लोग क्या सोचते हैं, क्या चाहते हैं? जिस देश में 60% जनसंख्या 35 वर्ष से कम है यह जानना भी ज़रूरी है कि उनके ‘मन की बात’ क्या है? हमारे नेता अपनी बात कहकर निकल जाते हैं, लोगों की बात कम सुनते हैं। जनता क्या कह रही है इसका कुछ अन्दाज़ा जंतर-मंतर से पता चल गया था। झारखंड से भी पता चल रहा है जहां भी सरकार को समर्पण करना पड़ा है। उसका एक और संस्करण सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत पर बच्चों के प्रोटैस्ट से पता चलता है। जब देश 80वां आज़ादी दिवस मना रहा था तो देश के कई हिस्सों में छोटे बच्चे तिरंगा के साथ अपने स्कूलों को बेहतर करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। सीजेपी भी ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चलाने जा रही है। यह अच्छा कदम है। हमें देश में ऐसे दबाव डालने वाले निडर प्रेशर ग्रुप चाहिए जो राजनीति से ऊपर हों। इसलिए आशा है कि सीजेपी राजनीति में कदम रखने की मूर्खता नहीं करेगी।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने भी इंडियन एक्सप्रैस के साथ इंटरव्यू में स्वीकार किया कि “डिग्री से आपको नौकरी नहीं मिलेगी। यह हमें सही करना है”। पर निर्मला जी, आपको बारह साल के बाद यह अहसास क्यों हुआ? यह कब सही होगा? क्या अगर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन न होता तो ऐसा ही चलता जाता? निर्मला जी को यह भी देखना चाहिए कि उनके कार्यकाल में शिक्षा का स्तर गिरा क्यों है? उन्हीं के कार्यकाल में बजट में शिक्षा पर निर्धारित प्रतिशत पहले से आधा क्यों रह गया है? दिलचस्प है कि बाबा रामदेव ने भी सरकार को चौकस किया है कि हालत सही नहीं है। पत्रकारों के सामने उनका कहना था, “सुधर जाओ…बहुत घपला है…”! क्या उन्होंने भी समझ लिया कि ज़मीन पर हालत सही नहीं है? मौसम के मुर्ग़े दिशा बदल रहे हैं ? बदलते माहौल का पहले संकेत तमिलनाडु से मिला था जहां राजनीति के नौसिखिए फ़िल्म एक्टर जोसफ़ विजय ने विधानसभा चुनाव में पुरानी जमी हुई पार्टियों को पराजित कर दिया था। विजय जोसफ ईसाई है, पर लोगों को जरा भी आपत्ति नहीं हुई। यह खुद एक संदेश है। द्रमुक के परिवारवाद शासन से परेशान जनता ने दूसरे बड़े दलों को नकारते हुए विजय को विजयी बना दिया, लेकिन पब्लिक क्या सोच रही है यह बिहार के बांकीपुर उपचुनाव से पता चलता है जहां पहली बार चुनाव लड़ रहे सर्वेक्षण विशेषज्ञ प्रशान्त किशोर ने भाजपा को उस चुनाव क्षेत्र में चित कर दिया जो उसकी परम्परागत सीट थी और जहां से उसके अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार जीतते रहे थे। बांकीपुर से भाजपा लगातार नौ बार जीतती आई है। इन नौ चुनावों में भाजपा को 60% से अधिक वोट मिले थे। पिछले साल नवम्बर में हुए विधानसभा चुनाव में नितिन नबीन को 62% वोट मिले थे, पर इस बार उपचुनाव में यह घटकर 34% रह गए जबकि प्रशांत किशोर को 49% वोट मिले हैं। एक साल के अंदर भाजपा के वोट में 28% की गिरावट आश्चर्यजनक है। जहां भाजपा के खिलाफ वोट पड़ा है यह भी उल्लेखनीय है कि जनता ने प्रमुख विपक्षी दल तेजस्वी यादव की राजद, को भी दुत्कार दिया। राजद 29% से गिरकर 11% रह गई। चाहे तमिलनाडु का चुनाव हो या बांकीपुर का, संदेश है कि विकल्प की तलाश में लोग पुरानी पार्टियों से निराश अपना नया विकल्प खड़ा कर रहे हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद इतनी जल्दी भाजपा जन समर्थन क्यों खो बैठी? क्या इसका कारण युवा आंदोलन था जिस पर वहां लाठी बरसाई गई? एके- 47 से फ़ायरिंग की गई? नितिन नबीन ने युवा प्रदर्शन को ‘टुकड़े-टुकडे़ गैंग’ कहा था। यह लोग कब समझेंगे कि देश इस घिसी-पिटी शब्दावली से बहुत आगे निकल चुका है? युवाओं से बात करनी है तो यह हेकड़ी छोड़नी पड़ेगी। चुनाव के समय भी अहंकार दिखाया गया कि उनकी पार्टी चिन्ह पर कोई ‘कुत्ता-बिल्ली’ भी चुनाव जीत जाएंगे। युवा असंतोष से निपटने में भाजपा इतनी असमर्थ क्यों है? चंदा-चोरी का मामला भी भाजपा को परेशान कर रहा है क्योंकि परम्परागत हिन्दू वोट नाराज़ है। असली बात है कि पुरानी राजनीति के दिन लद गए लगते हैं। राजनीति एक प्रकार से खुल रही है। लोग नए की तालाश में नए-नए परीक्षण कर रहे हैं। बांकीपुर इसकी शुरुआत हो सकती है। जोसफ विजय और प्रशांत किशोर इस बदलाव के संदेशवाहक है। उनकी जीत बता रही है कि पब्लिक क्या बोल रही है। चेतावनी केवल भाजपा के लिए ही नहीं सभी पुरानी पार्टियों के लिए है क्योंकि संदेश है,
तम्मनाओं में कब तक ज़िन्दगी उलझाई जाएगी
खिलौने देकर कब तक मुफ़लिसी बहलाई जाएगी
नया चश्मा है पत्थर की शिगाफों पर उबलने को
ज़माना किस कदर बेताब है करवट बदलने को
बांकीपुर का महत्व केवल बिहारियों के लिए ही नहीं है, बल्कि सारे उन भारतीयों के लिए हैं जो विभाजित और ज़हरीली राजनीति से तौबा करना चाहते हैं, जो व्यवस्था की अक्षमता, भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता से परेशान है। नई पीढ़ी उन नेताओं को ढूंढ रही है जो सही बदलाव ला सकें। भाजपा वह पार्टी नहीं लग रही। उन्हें या तो अपना नवीनीकरण करना होगा नहीं तो वह अपने कोर समर्थन तक सिंकुड़ जाएगी। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया बर्कले अमेरिका के प्रोफ़ेसर प्रदीप छिब्बर ने विशेषज्ञ राहुल वर्मा के साथ मिलकर लेख में लिखा है, “जो पीढ़ी 2014 में नरेन्द्र मोदी को सत्ता में लाई थी अब वह पीढ़ी नहीं रही जो मतदाता बनने जा रही है। भाजपा की बड़ी चुनौती है कि केवल युवा भारतीयों को अपनी तरफ़ आकर्षित ही नहीं करना, बल्कि उनमें यह विश्वास भी पैदा करना है कि पार्टी के पास भविष्य के लिए सबसे विश्वसनीय वादे हैं”।
संघ परिवार में जिस नेता ने सबसे पहले बदली हुई परिस्थिति को भांप लिया वह मोहन भागवत हैं। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि जैन-ज़ी आंदोलन एंटी नेशनल नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र में आम सहमति बनाने का तरीक़ा है। मोहन भागवत के विचारों का स्वागत है चाहे जंतर-मंतर पर जुलाई 20 की घटना के लगभग तीन सप्ताह के बाद उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी है। उनके विचार इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनसे पहले संघ के तीसरे नम्बर के अधिकारी अतुल लिमेया जंतर-मंतर के प्रदर्शन को ‘राष्ट्र विरोधी’ और ‘संविधान विरोधी’ कह चुके हैं। हमारे देश में ऐसी जमात पैदा क्यों हो गई है जो किसी के भी राष्ट्र विरोधी होने का सर्टिफ़िकेट देने को तैयार है? जो विरोध करता है उसे हर प्रकार की गालियां दी जाती हैं। वह विरोध को बर्दाश्त क्यों नहीं कर सकते? वह क्यों समझते हैं कि दूसरों को फटकार लगाने का उनका असीमित अधिकार है?
घबराहट यह है कि अगर अतुल लिमये जैसे एक दिन शिखर पर पहुंच गए तो संघ की दिशा क्या होगी? अतीत में भी कई बार मोहन भागवत ने सही दिशा देने का प्रयास किया है। वह कह चुके हैं कि “हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग नहीं ढूंढना चाहिए”। यह बहुत दिलेराना बयान है। वह यह भी कह चुके हैं कि हिन्दू मुसलमान का डीएनए एक है और देश सबका साझा है। समस्या है कि उनके संदेश का नीचे तक असर नहीं होता। जिन शिक्षा संस्थानों में संघ का दबदबा है उनमें आज़ाद विचारों को पसंद क्यों नहीं किया जा रहा? विरोधी विचार को दबाने की कोशिश क्यों होती है? शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने की जगह सारा ध्यान विचारधारा को ज़बरदस्ती थोपने पर क्यों है? अगर हमारी युनिवर्सिटी और कालेजों में आज़ाद सोच बंद हो गई तो इस एआई के युग में हम दुनिया से पिछड़ जाएंगे। संसद का अधिवेशन लगभग बिना किसी कामकाज निपटाए समाप्त हो गया। तीन सप्ताह न प्रधानमंत्री और न ही गृहमंत्री सदन में आये। वह सिर्फ़ उस वक्त आये जब वंदे मातरम् शुरू हो रहा था। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।
देश को बहुत ग़लत संदेश गया है। जवाहर लाल नेहरू तो हर वक्त मौजूद रहते थे। गृहमंत्री अमित शाह ने संसद के बाहर कहा कि जंतर-मंतर सें सम्बन्धित घटनाओं पर वह अपनी बात सदन में रखना चाहते हैं पर विपक्ष ऐसा नहीं होने दे रहा। यह बात समझ नहीं आतीं, अगर गृहमंत्री अपनी बात कहना चाहते तो कौन उन्हें रोक सकता है? पर राहुल गांधी की यह ज़िद्दी मांग कि अगर गृहमंत्री के कहने पर 20 जुलाई को गोली चली तो भी, और अगर उन्हें नहीं पता था तो भी, उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए, भी अनुचित है। देश की राजनीति स्कूल स्तर की आर -पार डिबेट नहीं है। इस सरकार, विशेषतौर पर गृहमंत्री अमित शाह, की बड़ी उपलब्धि है कि नक्सलवाद का सफाया कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ के कोंडापल्ली गांव, जो नक्सलियों का गढ़ था का चित्र छपा है जहां स्कूल में तिरंगा लहरा रहा है। इस उपलब्धि पर सरकार गर्व कर सकती है फिर प्रधानमंत्री द्वारा लाल क़िले से ‘दिमाग़ी नक्सली’ का मुद्दा अनावश्यक क्यों उठाया गया?
विरोधियों पर वार करने के लिए नई नई शब्दावली क्यों घड़ी जा रही है? मतभेद रखने वाला हर व्यक्ति नक्सल नहीं है, न शारीरिक तौर पर न दिमाग़ी तौर पर। असहमति और विरोध लोकतांत्रिक है। पब्लिक वह भारत चाहती है जिसमें सोचने की ताक़त हो और अभिव्यक्ति पर अंकुश न हो। जंतर-मंतर पर हमने इसका ट्रेलर देख लिया है।
क्या बोलती पब्लिक ?
Summary :
यह हैडिंग मेरा नहीं है। यह मैंने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से चुराया है। वह देशभर में यह जानने के लिए अभियान चलाना चाहते हैं कि लोग क्या सोचते हैं, क्या चाहते हैं? जिस देश में 60% जनसंख्या 35 वर्ष से कम है यह जानना भी ज़रूरी है कि उनके ‘मन की बात’ क्या है? हमारे नेता अपनी बात कहकर निकल जाते हैं, लोगों की बात कम सुनते हैं। जनता क्या कह रही है इसका कुछ अन्दाज़ा जंतर-मंतर से पता चल गया था। झारखंड से भी पता चल रहा है जहां भी सरकार को समर्पण करना पड़ा है। उसका एक…


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