दिल्ली की सिख सियासत का बदलता स्वरूप

Summary :

दिल्ली की सिख सियासत ने पिछले तीन दशकों में सत्ता के कई रंग देखे हैं। कभी पंजाब से संचालित अकाली राजनीति का दबदबा रहा, कभी दिल्ली के सिखों के लिए दिल्ली से ही नेतृत्व की आवाज बुलंद हुई, तो कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं,आपसी मतभेदों और आरोप-प्रत्यारोप ने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया, लेकिन अब दिल्ली की सिख राजनीति उस दौर में पहुंच चुकी है जहां केवल नारों, पुराने रिश्तों और पंजाब के राजनीतिक समीकरणों के सहारे चुनावी जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। वर्ष 1995 में परमजीत सिंह सरना ने शिरोमणि अकाली दल बादल से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत कर…

दिल्ली की सिख सियासत ने पिछले तीन दशकों में सत्ता के कई रंग देखे हैं। कभी पंजाब से संचालित अकाली राजनीति का दबदबा रहा, कभी दिल्ली के सिखों के लिए दिल्ली से ही नेतृत्व की आवाज बुलंद हुई, तो कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं,आपसी मतभेदों और आरोप-प्रत्यारोप ने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया, लेकिन अब दिल्ली की सिख राजनीति उस दौर में पहुंच चुकी है जहां केवल नारों, पुराने रिश्तों और पंजाब के राजनीतिक समीकरणों के सहारे चुनावी जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। वर्ष 1995 में परमजीत सिंह सरना ने शिरोमणि अकाली दल बादल से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत कर सत्ता हासिल की, लेकिन कुछ सालों बाद ही उन्होंने यह कहकर कि दिल्ली के सिखों के फैसले दिल्ली से होंगे, पंजाब की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं, जिसके चलते संगत ने उन्हें 2002 के चुनाव में पूर्ण बहुमत दिया और लंबे समय तक दिल्ली की सिख राजनीति में सरना भाईयों ने अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। इसके बाद 2013 का चुनाव दिल्ली की सिख राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर सामने आया। शिरोमणि अकाली दल बादल ने सरना खेमे पर श्री अकाल तख्त साहिब से टकराव, बाला साहिब अस्पताल, बंगला साहिब पार्किंग सहित कई मुद्दों पर गंभीर आरोप लगाकर शिकस्त दी। वर्ष 2021 के चुनाव में हालांकि सरना दल का अच्छा प्रदर्शन रहा मगर सेवा में आने की मंशा से उन्होंने फिर से सुखबीर सिंह बादल का दामन थाम लिया और उधर हरमीत सिंह कालका ने सभी सदस्यों को साथ लेकर शिरोमणि अकाली दल दिल्ली स्टेट के नाम से नई पार्टी बना ली, क्योंकि सुखबीर बादल ने उन्हंे सरना और जीके से मिलकर कमेटी चलाने की हिदायत दी जो टीम कालका को अस्वीकार्य थी। सरना दल के भी ज्यादातर सदस्य कालका के साथ हो लिए, ऐसे में सरना साहिब को मायूस होना स्वभाविक था, मगर अब उनके पास कोई विकल्प नहीं था। तब से लेकर आज तक टीम कालका की पकड़ मजबूत हो चुकी है, केंद्र की भाजपा सरकार, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ उनके राजनीतिक संबंध, केंद्रीय नेतृत्व के साथ उनकी निकटता उन्हें एक अलग राजनीतिक स्थिति में खड़ा करती है। गुरु हरिकृष्ण पब्लिक स्कूलों के शिक्षकों से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के प्रयास हों, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में काम हो यह सभी मौजूदा नेतृत्व की राजनीतिक पूंजी बन चुके हैं।
उधर हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के बाद दिल्ली के अकाली नेताओं में उत्साह दिखाई देना स्वाभाविक है। राजनीति में ऐसे संपर्क नए समीकरण पैदा करते हैं लेकिन पंजाब में बनने वाला कोई भी राजनीतिक समीकरण अपने आप दिल्ली की सिख राजनीति पर लागू हो जाए, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। दिल्ली की सियासत की अपनी जमीन है, अपने मुद्दे हैं और अपने राजनीतिक चेहरे हैं। आज स्थानीय संगठन, व्यक्तिगत विश्वसनीयता, सरकार से संवाद की क्षमता और कमेटी के काम का प्रदर्शन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भविष्य में यदि कोई नया राजनीतिक समीकरण बनता भी है तो हरमीत सिंह कालका को दिल्ली की राजनीति से किनारे कर देना आसान नहीं होगा। उनके लंबे राजनीतिक अनुभव, अकाली नेतृत्व के साथ पुराने संबंध और भाजपा के भीतर बढ़ती स्वीकार्यता ने उन्हें दिल्ली की सिख राजनीति में एक अलग स्थान दिया है, इसलिए दिल्ली के आगामी गुरुद्वारा चुनावों को केवल पुराने राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर परमजीत सिंह सरना और मनजीत सिंह जी में आपसी तालमेल कब तक चलता है, देखना होगा। दिल्ली की सिख राजनीति में अब सवाल केवल यह नहीं है कि कौन किसके साथ खड़ा है। असली सवाल यह है कि किसने संगत के लिए क्या किया, कितना किया और आगे क्या करने की क्षमता रखता है।
आखिर धामी क्यों पहुंचे पाकिस्तान हाई कमीशन जाने?
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें शिरोमणि कमेटी के प्रधान एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल का पाकिस्तान हाई कमीशन पहुंचना सामान्य धार्मिक शिष्टाचार मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि श्रद्धालुओं के वीजा, जत्थों की यात्रा और गुरुद्वारा साहिबान के दर्शन से संबंधित कोई समस्या थी, तो उसका समाधान भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों और निर्धारित राजनयिक माध्यमों से तलाशा जा सकता था, मगर उनका सीधे पाकिस्तान हाई कमीशन पहुंचना स्वाभाविक रूप से संदेह और सवाल पैदा करता है। कहीं इस मुलाकात के पीछे उन लोगों का स्वार्थ तो नहीं छिपा जिनकी जत्थों की आड़ में चलने वाली दुकानदारी फिलहाल बंद पड़ी है क्योंकि पूर्व में कुछ लोग प्राईवेट जत्थों के सहारे श्रृद्धालुओं को पाकिस्तान के गुरधामों का वीजा दिलाने के एवज में मोटी रकम वसूला करते थे। सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक इन्हीं लोगों के द्वारा 7 हजार से अधिक लोगों को गुरु नानक देव जी प्रकाश पर्व पर पाकिस्तान ले जाने का ख्वाब दिखाया जा रहा है जबकि सरकार के द्वारा भारत-पाकिस्तान के बीच धार्मिक स्थलों की यात्राओं के संबंध में हुए औपचारिक समझौते के तहत शिरोमणि कमेटी, दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी को मिलाकर 3 हजार के करीब वीजा गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व, और बैसाखी पर दिए जाते हैं इसी प्रकार महाराजा रणजीत सिंह की बरसी एवं गुरु अर्जन देव के शहीदी पर्व पर 500 वीजा दिए जाते है जिसमें से शिरोमणि कमेटी के 1800, दिल्ली कमेटी के 450 और बाकी पूरे देश से श्रद्धालुओं के लिए होते हैं जिन्हंे पूरी सुरक्षा जांच के बाद ही वीजा दिए जाते हैं।
इस मुलाकात को दिल्ली की सिख राजनीति के उन महारथियों की पाकिस्तान नीति के संदर्भ से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। जिन पर अतीत में पाकिस्तान स्थित सिख संस्थाओं के साथ सीधे संपर्क तथा निजी स्तर पर धार्मिक जत्थे भेजने को लेकर सवाल उठते रहे हैं मगर वह व्यवस्था अब पहले जैसी प्रभावी नहीं है। यही कारण है कि यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या पाकिस्तान जाने वाले निजी जत्थों और सीधे संपर्क की पुरानी व्यवस्था को किसी नए रास्ते से पुनर्जीवित करने की कोशिश हो रही है? यह पूछना बिल्कुल जायज है कि आखिर इस हाई प्रोफाइल मुलाकात का वास्तविक एजेंडा क्या था।
सिख संस्थानों में सिखी पर हमले आश्चर्यजनक : गुरदासपुर के गुरु नानक इंटरनेशनल स्कूल में एक सिख छात्रा के केश काटे जाने का सामने आया मामला केवल एक बच्ची के साथ हुई कथित ज्यादती नहीं, बल्कि सिख संस्थानों की कार्यप्रणाली और पंथक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना है। यह एक सिख बच्ची के धार्मिक स्वरूप और उसकी गरिमा से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला है। सिख धर्म में केश महज बाल नहीं बल्कि सिख की धार्मिक पहचान और गुरु साहिब द्वारा प्रदान किए गए स्वरूप का अभिन्न अंग हैं। ऐसे में किसी सिख बच्चे के केश उसकी इच्छा के विरुद्ध काट देना बेहद गंभीर विषय है। स्कूल में अनुशासन के अपने नियम हो सकते हैं और विद्यार्थी द्वारा उनका पालन न करने पर शिक्षक या प्रबंधन चेतावनी, अभिभावकों से संपर्क अथवा स्कूल के निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई कर सकता है, लेकिन क्या किसी शिक्षक को यह अधिकार है कि वह अनुशासन के नाम पर बच्चे के केश ही काट दे? मगर अभी तक सिखी की दुहाई देकर उत्पाद मचाने वाले अभी तक चुप्प बैठे हैं।

Team Desk