हर वर्ष जून माह में जब भीषण गर्मी अपने चरम पर होती है, तब सड़कों, गुरुद्वारों और सार्वजनिक स्थानों पर मीठे शर्बत की छबीलें दिखाई देती हैं। यह परंपरा केवल प्यास बुझाने का माध्यम नहीं, बल्कि सिख इतिहास की एक महान शहादत की स्मृति से जुड़ी हुई है। श्री गुरु अर्जन देव जी के शहीदी पर्व पर लगाई जाने वाली छबीलें उनके बलिदान, सेवा और मानवता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम हैं। सिख इतिहास के अनुसार पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जन देव जी को वर्ष 1606 में लाहौर में अमानवीय यातनाएं देकर शहीद किया गया था। उन्हें तपते तवे पर बैठाया गया और उनके शरीर पर गर्म रेत डाली गई।
भीषण गर्मी और असहनीय पीड़ा के बावजूद गुरु साहिब ने ईश्वर की रज़ा को स्वीकार करते हुए “तेरा किया मीठा लागे” का संदेश दिया। यही कारण है कि उनकी शहादत की याद में ठंडे और मीठे जल अथवा शर्बत की छबील लगाने की परंपरा शुरू हुई, ताकि लोगों को राहत मिले और गुरु साहिब की सहनशीलता तथा त्याग को स्मरण किया जा सके। छबील का मूल भाव केवल ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि सेवा है। सिख परंपरा में सेवा को सर्वाेच्च स्थान प्राप्त है। गुरु अर्जन देव जी ने मानवता, समानता और परोपकार का जो संदेश दिया, छबील उसी का जीवंत रूप है। इसमें जाति, धर्म, वर्ग या समुदाय का कोई भेद नहीं होता।
जो भी राहगीर आता है, उसे प्रेम और सम्मान के साथ शर्बत पिलाया जाता है। यही सिखी की वास्तविक भावना है। आज छबील केवल सिख समुदाय तक सीमित नहीं रही। देश के अनेक हिस्सों में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग भी इसमें भाग लेते हैं। कई स्थानों पर युवा, सामाजिक संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर छबील लगाते हैं। यह परंपरा समाज को यह संदेश देती है कि प्यासे को पानी पिलाना और जरूरतमंद की सहायता करना सबसे बड़ा धर्म है। गुरु अर्जन देव जी का शहीदी पर्व हमें याद दिलाता है कि सत्य और धर्म की राह पर चलने वालों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, लेकिन उनका बलिदान समाज को नई दिशा देता है। छबील उसी बलिदान की मीठी याद है।
यह केवल शर्बत का एक गिलास नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण, करुणा और मानवता का वह संदेश है जो चार सौ वर्षों से लोगों के दिलों को जोड़ रहा है। गुरु साहिब की शहादत और छबील की परंपरा आज भी हमें यही सिखाती है कि दूसरों को राहत पहुंचाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
बेअदबी कानून आस्था की लड़ाई या सत्ता का खेल? : सिख धर्म में श्री अकाल तख्त साहिब का विशेष स्थान है और सिख भले ही संसार में कहीं भी रहता हो उसके लिए श्री अकाल तख्त साहिब सर्वाेच्च है और हर सिख उसके लिए पूरी तरह से समर्पित है, मगर पिछले कुछ समय से जिस प्रकार राजनीति से प्रेरित होकर श्री अकाल तख्त साहिब की फजील से आदेश पारित किए जा रहे हैं उसने श्री अकाल तख्त साहिब की साख को गहरी चोट पहुंचाई है।
एक ओर पंजाब सरकार बेअदबी के मामलों पर कठोर कानून बनाकर स्वयं को गुरु साहिब की मर्यादा का रक्षक साबित करना चाहती है, तो दूसरी ओर शिरोमणि कमेटी और अकाल तख्त इस कानून की कई धाराओं को सिख परंपरा और धार्मिक अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप मान रहे हैं। यही टकराव अब खुली राजनीतिक जंग का रूप ले चुका है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि कुछ ही समय पहले शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष ने अकाल तख्त के समक्ष अपनी सरकार के दौर में हुई गलतियों और बेअदबी मामलों को लेकर सार्वजनिक रूप से दोष स्वीकार किया था।
उस समय इसे सिख इतिहास में एक असाधारण घटना बताया गया, लेकिन अब जब अकाली दल राजनीतिक रूप से कमजोर स्थिति में है और बादल परिवार लगातार कानूनी तथा राजनीतिक दबाव झेल रहा है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अकाल तख्त की वर्तमान सक्रियता पूरी तरह धार्मिक है या इसके पीछे राजनीतिक पुनर्वास की रणनीति भी काम कर रही है? आप पार्टी खुलकर आरोप लगा रही है कि बादल परिवार और अकाली दल धार्मिक संस्थाओं का उपयोग अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए कर रहे हैं।
पार्टी नेताओं ने यहां तक कहा है कि अकाल तख्त को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है। हाल ही में सोशल मीडीया पर एक वीडियो वायरल होती हुई जिसमें शख्स शराब का सेवन करते हुए गुरु साहिबान के चित्र के सामने सेवन करते हुए अश्लील हरकतें करता दिख रहा है, जिसे अकाली नेताओं ने भगवंत मान बताया और इतना ही नहीं इसी के चलते श्री अकाल तख्त साहिब ने भगवंत मान को पंथ दोषी तक करार दे दिया, वहीं दूसरी ओर आप समर्थकों का ही नहीं बल्कि हर इन्सान यह सोचने को मजबूर है कि होटल के कमरे में गुरु साहिबान की फोटो कैसे लगी होगी।
भगवंत मान ने स्वयं एक वीडीयो जारी कर साफ किया कि पंजाब के पानी, गुरु की बानी, किसानी और जवानी को बचाने के लिए निरन्तर संघर्ष कर रहे हैं जो शायद अकालियों को रास नहीं आ रहा इसलिए उनकी छवि धूमिल करने के लिए अब श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार का सहारा लिया जा रहा है। बेअदबी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी राजनीतिक दल को लाभ या हानि की गणना नहीं करनी चाहिए। यह केवल कानून का विषय नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का प्रश्न है। पंजाब को कब तक बंधक बनाए रखेंगे चरमपंथ : हर वर्ष जून का महीना आते ही पंजाब का माहौल तनावपूर्ण होने लगता है। ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 की घटनाओं की स्मृतियां स्वाभाविक रूप से सिख समाज के मन में दर्द और भावनाएं जगाती हैं, लेकिन दुखद यह है कि पिछले चार दशकों से कुछ कट्टरपंथी और राजनीतिक तत्व इस दर्द को शांति और संवाद का माध्यम बनाने के बजाय अपने-अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते आ रहे हैं।
एक ओर अमृतसर में कुछ खालिस्तान समर्थक और गरमदली समूह श्री हरिमंदिर साहिब परिसर के आसपास या उससे जुड़े आयोजनों में खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, खालिस्तानी झंडे लहराते हैं और ऐसे संदेश देने का प्रयास करते हैं जिससे पंजाब की शांति और सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है। इन गतिविधियों का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इससे सिख समुदाय की छवि पर प्रश्नचिह्न लगते हैं और हिंदू-सिख संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा होता है। दूसरी ओर कुछ हिंदू संगठन भी प्रतिक्रिया की राजनीति में उतरकर ऐसे पोस्टर और अभियान चलाते हैं जिनमें पंजाब पुलिस के पूर्व अधिकारियों, तत्कालीन राजनीतिक नेताओं या ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़े विवादित व्यक्तियों को ‘‘शहीद’’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह भी एक ऐसी कार्रवाई है जिसे बड़ी संख्या में सिख स्वीकार नहीं कर सकते। हजारों सिख परिवार आज भी 1980 और 1990 के दशक के दौर को दर्द के साथ याद करते हैं। ऐसे में उन व्यक्तियों का महिमामंडन, जिनके कार्यों को लेकर सिख समाज में गहरी नाराजगी रही है, घावों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें और हरा करने का काम करता है। ऐसे में पंजाब के भविष्य को उन लोगों के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता जो हर साल पुराने घावों को कुरेदकर नई पीढ़ी के मन में नफरत बोना चाहते हैं। समय आ गया है कि सरकार, धार्मिक नेतृत्व और समाज के जिम्मेदार वर्ग मिलकर स्पष्ट संदेश दें कि पंजाब की धरती न तो खालिस्तान के नारों की प्रयोगशाला बनेगी और न ही ऐसी प्रतिक्रिया की राजनीति का मंच, जो हिंदू-सिख एकता को कमजोर करे।


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