दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के गिरने से कम से कम सात लोगों की मौत हो गई जिससे शहर में अवैध निर्माण का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। दिल्ली में युवा छात्रों के आवास वाली एक जर्जर इमारत का ढहना राष्ट्रीय राजधानी में हुई त्रासदियों की शृंखला में नवीनतम घटना है जो शहरी नियोजन और सुरक्षा प्रणालियों के प्रवर्तन में खामियों को उजागर करती है। यह विडंबना ही है कि राजधानी दिल्ली में ‘हत्यारे डिब्बेनुमा’ कमरों में रहना छात्रों की मजबूरी है। समाज में लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसा कमाने की हवस इस हद तक बढ़ गई है कि वे किसी के जीवन व मृत्यु की भी परवाह नहीं करते। दूरदराज के राज्यों से अपने सुनहरे सपने लेकर दिल्ली आने वाले छात्र मजबूरी में मुंहमांगे दाम देकर अमानवीय स्थिति मेंे डिब्बेनुमा कमरो वाले पीजी में रहने को मजबूर हो जाते हैं। जब जर्जर इमारतों की स्थिति को नजरअंदाज करके ज्यादा किराया वसूलने के लिए चलताऊ निर्माण कार्य कराये जाते हैं तो हादसे का होना तय हो जाता है।
सत्य निकेतन, जहां यह हादसा हुआ कोई गुमनाम आवासीय इलाका नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर के निकट होने के कारण यह छात्र आवास का एक सघन बाज़ार बन गया है जिससे निजी पेइंगगेस्ट आवासों की संख्या में वृद्धि हुई है। दुर्भाग्य से भारत में सुरक्षा मानदंडों पर सवाल तभी उठाए जाते हैं जब दुर्घटनाएं हो जाती हैं और जानें चली जाती हैं। छात्र शहरी संपत्ति बाजार में असुरक्षित उपभोक्ता हैं। अपने परिवारों से दूर रहने के कारण उनके पास यह आंकलन करने की विशेषज्ञता या सौदेबाजी की शक्ति नहीं होती कि किसी इमारत में अवैध रूप से बदलाव किया गया है, उसका रखरखाव अपर्याप्त है, या उसमें खतरनाक रूप से अधिक लोग रह रहे हैं। कोई भी शहर अपने युवा निवासियों की सुरक्षा को मकान मालिकों और बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ सकता। निजी आवास एक व्यवसाय हो सकता है, लेकिन छात्रों को आवास प्रदान करने की ज़िम्मेदारी केवल किराया वसूलने तक सीमित नहीं है। सत्य निकेतन का ढहना दिल्ली की फलती-फूलती छात्र आवास अर्थव्यवस्था में कमजोर निगरानी के व्यापक पैटर्न को उजागर करता है।
शहर का वास्तविक अनुभव सरकारी योजनाओं में निहित वादों से बिल्कुल अलग लगता है। योजनाओं की भरमार के बावजूद रोजमर्रा की शहरी सेवाओं में निश्चितता, विश्वसनीयता या सुरक्षा का कोई सुधार नहीं हुआ है। यह लगातार बना रहने वाला अंतर एक मूलभूत विरोधाभास को उजागर करता है। भारतीय शहर नियोजन की कमी से पीड़ित नहीं हैं। वे प्रभावी शहरी प्रबंधन की कमी से पीड़ित हैं जो योजनाओं को परिणामों में परिवर्तित कर सके। देश में महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक में किराए पर मकान देने का एक बहुत बड़ा उद्योग खड़ा हो गया है। जहां जगह मिले वहां बहुमंजिला इमारतें बना दी जाती हैं। सरकारी दस्तावेजों में भले ही ऐसी इमारतें आवासीय श्रेणी में पंजीकृत होती हैं लेकिन इनमें से कई में पेइंग गेस्ट (पीजी), होटल और रेस्तरां संचालित किए जाते हैं। जब ये इमारतें जर्जर हो जाती हैं तो कई दफा भरभराकर गिर जाती हैं या इनमें आग लगने के हादसे होते हैं। सत्य निकेतन में जिस इमारत के गिरने से हादसा हुआ वह काफी पुरानी थी और जर्जर हालत में थी। इसके बावजूद उसे पीजी के तौर पर किराए पर दिया गया था। जब हादसा हुआ उस वक्त वहां भूतल पर मरम्मत कार्य चल रहा था। सवाल सिर्फ किसी एक घटना का नहीं है, बल्कि देश भर में उन हजारों जर्जर इमारतों का है जिनका नियमों को धत्ता बताकर व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है। बड़े शहरों में किसी इमारत का नक्शा पास होने से लेकर उसके बनने तक एक लंबी विभागीय प्रक्रिया होती है। कई स्तर पर जांच होती है, तब जाकर उसके इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। इसके बाद भी समय-समय पर उसकी जांच करने का प्रावधान है और अगर वह जर्जर हालत में पाई जाती है तो उसे असुरक्षित घोषित किया जाता है।
इस साल मई में साकेत त्रासदी की जांच जिसमें एक बहुमंजिला व्यावसायिक इमारत ढह गई थी, ने भी अनधिकृत निर्माण और वित्तीय लाभ के लिए अतिरिक्त मंजिलें जोड़ने की योजनाओं की ओर इशारा किया था। मालवीय नगर में जून में एक प्रतिष्ठान में आग लगने से 23 लोगों की मौत हो गई थी, जिसे कथित तौर पर केवल छह बेड-एंड-ब्रेकफास्ट कमरे रखने की अनुमति थी लेकिन उसे 26 कमरों वाली सुविधा के रूप में संचालित किया जा रहा था। पालम और विवेक विहार में हुई आग की घटनाओं ने भी घोर उल्लंघनों को उजागर किया है। दिल्ली को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए वार्डवार पुराने और संरचनात्मक रूप से परिवर्तित भवनों का ऑडिट, खतरनाक संपत्तियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई, भवन निर्माण की मंजूरी का पारदर्शी रिकॉर्ड और उल्लंघन की अनदेखी करने वाले अधिकारियों और मालिकों के लिए कठोर दंड जैसे उपाय शामिल होने चाहिए।
मौत की इमारतों में रहने को मजबूर छात्र
Summary :
दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के गिरने से कम से कम सात लोगों की मौत हो गई जिससे शहर में अवैध निर्माण का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। दिल्ली में युवा छात्रों के आवास वाली एक जर्जर इमारत का ढहना राष्ट्रीय राजधानी में हुई त्रासदियों की शृंखला में नवीनतम घटना है जो शहरी नियोजन और सुरक्षा प्रणालियों के प्रवर्तन में खामियों को उजागर करती है। यह विडंबना ही है कि राजधानी दिल्ली में ‘हत्यारे डिब्बेनुमा’ कमरों में रहना छात्रों की मजबूरी है। समाज में लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसा कमाने…


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