अमेरिकी टैरिफ वाॅर और युद्ध के वातावरण से उत्पन्न वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जार्डन, ओमान और इथियोपिया की यात्रा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। वैश्विक स्तर पर बदल रहे समीकरणों के बीच भारत ने स्पष्ट स्टैंड लिया है कि भारत किसी एक ध्रुव पर निर्भर न रहकर अपना मार्ग स्वयं चुनेगा। भारत किसी शक्ति के दबाव में नहीं आने वाला। बहुध्रुवीय विश्व में भारत नए बाजार खुद तलाश कर सकता है और अपने लिए विकल्प स्वयं चुन सकता है। तीन देशों की विदेश यात्रा ने भारत के कूटनीतिक तेवर पूरी तरह से स्पष्ट कर दिए हैं। जार्डन में क्राऊन प्रिंस अल हुसैन ने जिस ढंग से स्वयं गाड़ी चलाकर प्रधानमंत्री मोदी को जार्डन संग्रहालय तक पहुंचाया, यह सम्मान अपने आप में बहुत कुछ कहता है। इथियोपिया में प्रधानमंत्री डॉ. अबी अहमद अली द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को इथियोपिया का सर्वोच्च सम्मान द ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया प्रदान किया। यह ग्लोबल साऊथ के प्रति मोदी की अटूट प्रतिबद्धता और भारत-इथियोपिया दोस्ती को मजबूत करने में उनके योगदान की पहचान है। इथियोपिया का यह सर्वोच्च सम्मान मोदी को दिया गया 28वां विदेशी राजकीय पुरस्कार है। पश्चिम एशिया में जार्डन भारत का कूटनीतिक मित्र ही नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा का मजबूत स्तम्भ भी है।
भारत और जॉर्डन के बीच 1950 से राजनयिक संबंध हैं। फरवरी 2018 में फिलिस्तीन जाते समय कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री मोदी जॉर्डन में रुके थे। इसके बाद 27 फरवरी, 2018 को जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला ने भारत की यात्रा की थी। कुछ सालों में जॉर्डन, भारत का सबसे अहम कारोबारी साझीदारों में से एक बनकर उभरा है। 2024-25 में दोनों के बीच 22,537 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था। इसमें 6,392 करोड़ का एक्सपोर्ट और 16,144 करोड़ का इम्पोर्ट हुआ था। भारत की ओर से मिनरल, मिनरल ऑइल, अनाज, मांस, केमिकल, फार्मा कॉफी-चाय, मसाले और मशीनरी जैसी चीजों का एक्सपोर्ट होता है। वहीं जॉर्डन से भारत केमिकल, फर्टिलाइजर, फॉस्फेट, प्लास्टरिंग मैटेरियल और सीमेंट खरीदता है।
जार्डन में केवल 167 भारतीय ही रहते हैं, जिनके पास स्थायी निवास है। वैसे वहां 17500 अप्रवासी भारतीय भी हैं। इस बार दोनों देशों ने 5 अहम समझौते किए हैं और दोनों देशों ने 2030 तक 5 अरब डॉलर तक द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने पर सहमति जताई है। आतंकवाद के खिलाफ भी भारत को जार्डन का साथ मिला है। वहीं मोदी की इथियोपिया यात्रा को देखें तो यह रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत निर्णायक है। अफ्रीकी संघ का मुख्यालय, ब्रिक्स का सदस्य और ग्लोबल साउथ की धड़कन, इथियोपिया में 2011 के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा है। देखा जाये तो यह देरी नहीं, बल्कि सही समय पर किया गया दांव है। दोनों देशों के बीच 550 मिलियन डॉलर का व्यापार, भारतीय फार्मा की मजबूत मौजूदगी और क्षमता निर्माण में भारत की भूमिका दिखाती है कि नई दिल्ली अफ्रीका को बड़ा साझेदार मानती है। यह चीन के ऋण-जाल मॉडल के ठीक उलट सम्मान, प्रशिक्षण और साझा विकास का रास्ता है।
भारत इथियोपिया को फार्मा, मशीनरी, लोहा, स्टील, केमिकल, प्लास्टिक का सामान, एल्युमीनियम आदि का निर्यात करता है, जबकि ओमान से हमें दालें, मसाले और चमड़ा मिलता है। अब बात करते हैं प्रधानमंत्री की ओमान यात्रा की। इस यात्रा का केन्द्र बिन्दु है भारतीय प्रवासी। ओमान में 6.75 लाख भारतीय प्रवासी हैं। इनमें से कई भारतीय तो 100-150 सालों से ओमान में बसे हैं। दोनों देशों के िरश्ते पांच हजार साल पुराने हैं। हालांकि राजनयिक रिश्ते 1955 में बने थे। ओमान भारत की समुद्री रणनीति का स्तम्भ भी है। डुक्म बंदरगाह में भारत की बढ़ती मौजूदगी, होरमुज़ जलडमरू मध्य से बाहर एक वैकल्पिक लॉजिस्टिक हब, यह सब भारत की इंडो-लिटरल स्ट्रैटेजी का हिस्सा है। भारत-ओमान सीईपीए का प्रस्तावित हस्ताक्षर इस यात्रा का सबसे ठोस आर्थिक परिणाम होगा। देखा जाये तो 95 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क-मुक्त पहुंच और 98 प्रतिशत तक भारतीय वस्तुओं को राहत, एक रणनीतिक व्यापार की तरह है। ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, उर्वरक, तकनीक और खाद्य सुरक्षा, हर मोर्चे पर भारत अपनी शर्तों पर आगे बढ़ रहा है। भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों में आर्थिक संबंध मजबूत होंगे। भारत की यह विशेषता रही है कि वह हर संकट के बीच भी रास्ते निकाल लेता है और अपने दम पर खड़ा हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी हर आपदा में भी अवसर तलाश लेते हैं और श्रेष्ठ प्रबंधन कर लेते हैं। भारत अब एजैंडा तय करने वाला देश बन चुका है। कूटनीति में भी वह किसी के इशारे पर नहीं चलता। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए अभी बहुत सी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना होगा। भारत बिना किसी दबाव के तैयारी कर रहा है।
मोदी की विदेश यात्रा
Summary :
अमेरिकी टैरिफ वाॅर और युद्ध के वातावरण से उत्पन्न वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जार्डन, ओमान और इथियोपिया की यात्रा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। वैश्विक स्तर पर बदल रहे समीकरणों के बीच भारत ने स्पष्ट स्टैंड लिया है कि भारत किसी एक ध्रुव पर निर्भर न रहकर अपना मार्ग स्वयं चुनेगा। भारत किसी शक्ति के दबाव में नहीं आने वाला। बहुध्रुवीय विश्व में भारत नए बाजार खुद तलाश कर सकता है और अपने लिए विकल्प स्वयं चुन सकता है। तीन देशों की विदेश यात्रा ने भारत के कूटनीतिक तेवर पूरी तरह से स्पष्ट कर दिए…



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