पेपर लीक पर मोदी के सख्त कदम

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पेपर लीक मामले पर जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को गम्भीरता से लेते हुए सख्त कदम उठा लिए हैं। इसके लिए कै​बिनेट ने पेपर लीक ​विधेयक संशोधन को मंजूरी दे दी है। पेपर लीक मामले में 10 साल की सजा और 10 करोड़ रुपए के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। प्रधानमंत्री ने मध्य रात्रि को सोशल मीडिया पर ​वीडियो पोस्ट जारी करते हुए कहा है कि उनकी सरकार पेपर लीक मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान वाला कानून बनाएगी और इस विधेयक को संसद में पेश किया जाएगा तथा इसे पारित किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने पेपर लीक के…

पेपर लीक मामले पर जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को गम्भीरता से लेते हुए सख्त कदम उठा लिए हैं। इसके लिए कै​बिनेट ने पेपर लीक ​विधेयक संशोधन को मंजूरी दे दी है। पेपर लीक मामले में 10 साल की सजा और 10 करोड़ रुपए के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। प्रधानमंत्री ने मध्य रात्रि को सोशल मीडिया पर ​वीडियो पोस्ट जारी करते हुए कहा है कि उनकी सरकार पेपर लीक मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान वाला कानून बनाएगी और इस विधेयक को संसद में पेश किया जाएगा तथा इसे पारित किया जाएगा।

प्रधानमंत्री ने पेपर लीक के दोषियों को जल्द से जल्द दंडित करने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश दिया था। कई विभागों ने फास्ट ट्रैक कोर्ट और कठोर सजा के प्रावधान के मसौदे भी तैयार किए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार दोहरा रहे हैं कि युवाओं के भविष्य से कोई खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने एनडीए के सांसदों को यह बात भी समझाई कि पेपर लीक का मामला राजनीति का नहीं बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। इससे स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री पेपर लीक जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के ​लिए मजबूत एवं त्रुटिरहित व्यवस्था विकसित करने के पक्षधर हैं।

नेशनल टैस्टिंग एजैंसी (एनटीए) का गठन जिन उद्देश्यों को लेकर किया गया था वह उसे प्राप्त करने में सफल नहीं रही, इस​लिए सिस्टम में सुधार करना सरकार का ही दायित्व है। सरकार द्वारा संवाद की नीति अपनाए जाने के बाद पिछले 26 दिन से छात्रों के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी। केन्द्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेन्द्र सिंह ने मेदांता अस्पताल जाकर उनका अनशन तुड़वाया। राहत भरी बात यह है कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों और सरकार में बातचीत का सिलसिला भी शुरू हो चुका है।

पेपर लीक मामले में सख्त कानून बनाना सरकार की एक अच्छी पहल मानी जा सकती है लेकिन असल मुद्दा ​शिक्षा व्यवस्था में सुधार का है। देश की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत है। देश बड़े-बड़े राजनीतिक आंदोलनों का गवाह रहा है। आंदोलनों के दौरान हुई राजनीति के दांव-पेचों से भी देशवासी पूरी तरह से अवगत हैं। सत्ता परिवर्तन के ​लिए राजनीतिक दल आंदोलनों को अपना राजनीतिक हथियार बनाते रहे हैं। आंदोलनों का हिंसक स्वरूप भी हम सबने देखा है, जिससे हमेशा राष्ट्रीय सम्पत्ति और आम नागरिकों का नुकसान होता रहा है। कई बार ​निर्दोष नागरिकों की जानें भी जाती रही हैं।

अतीत के आंदोलनों की बात करें तो ​जिन उद्देश्यों को लेकर आंदोलन चलाए गए और देशभर में तूफान खड़े होते रहे उनके मूल मुद्दे हाशिये पर ही दिखाई दिये। जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन की गूंज का अर्थ है शिक्षा व्यवस्था में सुधार, लेकिन छात्र आंदोलन को राजनीतिक रंग दिए जाने से यह आशंका उत्पन्न हो गई है कि कहीं शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर बुलंद हुई आवाज शोर-शराबे में कहीं खो न जाए। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार सभी को है। अहिंसक आंदोलन करने की सीख भी हमें राष्ट्रपिता बापू ही देकर गए हैं। इसलिए छात्र आंदोलन के दौरान हिंसा, अराजकता, पुलिसकर्मियों पर हमलों को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह भी सच है कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर युवा वर्ग में काफी आक्रोश है। युवाओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देता है। बेरोजगारी से निपटने के उपाय दिखावटी बन गए हैं तो सामाजिक शांति की उम्मीद कैसे की जा सकती है। एक के बाद एक पेपर लीक होने से असंतोष केवल छात्रों में ही नहीं बल्कि उनके अभिभावकों में भी है। बच्चों को शिक्षित करने के ​लिए अभिभावक कर्ज लेकर भी लाखों रुपए खर्च करते हैं। शिक्षा का ढांचा एक ऐसी अंधी दौड़ में बदल चुका है जहां छात्र और अभिभावक मानसिक, आर्थिक और सामाजिक दबाव तले पिस रहे हैं।

महंगी कोचिंग व्यवस्था और आरक्षण आधारित व्यवस्था से उपजी हताशा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तत्काल चर्चा की जरूरत है। लाखों खर्च करने के बावजूद बच्चों को नौकरी न मिलने से आत्महत्याएं बढ़ रही हैं या छात्र भयंकर अवसाद या हताशा का शिकार हो रहे हैं और परिवार आर्थिक रूप से टूट रहे हैं। यही स्थिति किसी भी युवा के मनोबल को तोड़ने के लिए काफी है। छात्रों को बेहतर इंसान, डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक बनने की बजाय शिक्षा व्यवस्था ऊंची कुुर्सी पाने का प्रलोभन देती है। इस दौड़ में सफलता पाने के लिए साधनों की शुद्धता कहीं पीछे छूट चुकी है। यही कारण है कि समाज में हर आदमी एक-दूसरे के खिलाफ संघर्षरत दिखाई देता है।

सामाजिक वातावरण में तनाव महसूस ​किया जा सकता है। ​शिक्षा व्यवस्था में सुधार लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। देश की ​शिक्षा व्यवस्था में विवेकशील समाज का निर्माण सम्भव नहीं है। वह न तो आम परिवारों के आर्थिक दायरे में आ रही है और न ही रोजगार या निष्पक्ष अवसर की गारंटी देती है। शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो आम आदमी की आर्थिक स्थिति के अनुकूल हो। वर्ष 2030 तक भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी होगी, जिसे सही कौशल की जरूरत है इसलिए पाठ्यक्रमों को आधुनिक तकनीक और रोजगार की मांग के अनुरूप स्वरूप देना होगा।

Aditya Chopra

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