चुनावी रणनीतियां बनाएंगे नबीन

Summary :

‘इसीलिए मैं कभी अपने ख्वाबों में नहीं होता कि जब से मेरी नींद चुराई है तूने दरबदर भटक रहा हूं मैं’ भाजपा के दोनों शिखर पुरुष अपनी पार्टी के युवा अध्यक्ष नितिन नबीन पर पूरा भरोसा दिखा रहे हैं। अपने नए अध्यक्ष को सियासी पैंतरों और अबूझ चुनावी रणनीतियों से लैस कर रहे हैं। आने वाले वर्ष यानी 2027 में कम से कम 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावी राज्यों में उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर शामिल हैं। भाजपा शीर्ष की ओर से नबीन को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है कि…

‘इसीलिए मैं कभी अपने ख्वाबों
में नहीं होता कि
जब से मेरी नींद चुराई है तूने
दरबदर भटक रहा हूं मैं’
भाजपा के दोनों शिखर पुरुष अपनी पार्टी के युवा अध्यक्ष नितिन नबीन पर पूरा भरोसा दिखा रहे हैं। अपने नए अध्यक्ष को सियासी पैंतरों और अबूझ चुनावी रणनीतियों से लैस कर रहे हैं। आने वाले वर्ष यानी 2027 में कम से कम 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावी राज्यों में उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर शामिल हैं। भाजपा शीर्ष की ओर से नबीन को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे बूथ लेबल पर व्याप्त किसी भी प्रकार की विसंगतियों को दूर करने के प्रयास में अभी से जुट जाएं, जमीनी स्तर पर पार्टी के संगठन कौशल का आकलन कर अपनी निरपेक्ष रिपोर्ट तैयार करें।
बूथ स्तर पर पार्टी की मजबूती व कमी का सम्यक आकलन करें। कमजोरियों की शिनाख्त करें और इसके निदान के उपाय सुझाएं। नबीन से कहा गया है कि वे खास कर पन्ना प्रमुखों की भूमिका पर ध्यान दें, उनसे संवाद स्थापित करें और पन्ना स्तर पर भाजपा कार्यकर्ताओं की एक जागरूक टीम बनाने की पहल अभी से शुरू कर दें। बूथ प्रबंधन की कमियों की स्टडी के लिए अभी से जमीनी एजेंसियों से काम पर जुट जाने को कहें, जरूरी फीडबैक प्राप्त होने के बाद लोकल इन्फ्लुएंसर, लोकल कार्यकर्ता व प्रबुद्ध नेतागण के साथ मिल-बैठ कर नई रणनीतियों को परवान चढ़ाने के लिए ‘डॉसियर’ तैयार करें, जिससे पार्टी का बूथ प्रबंधन पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हो सके।
इसके अलावा नबीन को एक महत्वपूर्ण कार्य और भी सौंपा गया है कि वे पार्टी के संभावित उम्मीदवारों की सीटवार सूची तैयार करवाएं। इस चयन के लिए कई मानक पहले से तय हैं, नबीन की टीम इन मानकों को और भी धार देने पर काम कर रही है, संभावित उम्मीदवारों के चयन के कुछ प्रमुख पैमाना मसलन उम्मीदवार अपने एरिया में कितना पॉपुलर हैं? उसकी जीत की संभावना कितनी है? वह स्थानीय कारकों में कितना ‘फिट’ बैठता है आदि-आदि। जाहिर है यह कदम भाजपा की उस केंद्रीय नीति का अहम हिस्सा है जिसमें वह 2027 के चुनावों के पहले अपने विभिन्न संगठनों को और मजबूत करना चाहती है।
अपनी नवीन टीम को अंतिम रूम देते नितिन
भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नबीन को पार्टी की अध्यक्षीय जिम्मेदारी संभाले छह महीनों से भी ज्यादा का वक्त हो गया, पर अब तक वे अपनी पुरानी टीम यानी नड्डा की टीम से ही काम चला रहे हैं। पर कहते हैं अब अध्यक्ष ने अपनी नई टीम का एक नया खाका तैयार कर लिया है, आने वाले कुछ दिनों में इसकी घोषणा हो सकती है। यह भी कयास लग रहे हैं कि नबीन की नई टीम में ज्यादातर पुराने चेहरे ही कायम रहेंगे। पहले यह सुना जा रहा था कि बीएल संतोष की जगह बंगाल चुनाव में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके सुनील बंसल को नया संगठन महामंत्री बनाया जाएगा, पर कहते हैं संघ अभी संतोष को और भी मौके देने के पक्ष में हैं, चुनांचे उन्हें नहीं छेड़ा जाएगा।
विनोद तावड़े की भी बतौर महासचिव उनकी गद्दी सलामत रह सकती है। राम माधव के रूप में टीम नबीन को एक नया महामंत्री मिल सकता है। सबसे ज्यादा पेंच एक ब्राह्मण चेहरे को पार्टी संगठन में महती भूमिका देने को लेकर फंसा है। पार्टी का एक गुट इस कोटे से बिहार के पूर्व मंत्री मंगल पांडेय का नाम आगे बढ़ा रहा है, तो सुधांशु त्रिवेदी भाजपा के एक बड़े नेता की निजी पसंद के तौर पर फिलवक्त रेस में आगे दिखते हैं। वैसे भी मंगल पांडेय से एक बार नितिन नबीन की तकरार पहले भी हो चुकी है। जब इस बार बिहार में सम्राट मंत्रिमंडल के मंत्रियों के चयन पर मंथन बैठक चल रही थी तो मंगल पांडेय अपनी ओर से दिनारा, रोहतास के विधायक आलोक कुमार सिंह का नाम आगे बढ़ा रहे थे, जो उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के टिकट पर चुनाव जीते हैं। मंगल पांडेय की बात को मीटिंग में विनोद तावड़े का वीटो हासिल था, तावड़े का कहना था ‘आलोक सिंह शाहबाद क्षेत्र से एक सच्चे राजपूत चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं’, तो वहीं नबीन का कहना था कि -हमारे पास इस क्षेत्र से पहले से ही संजय टाइगर हैं। इस पर तावड़े ने कहा कि ‘टाइगर का परफॉरमेंस बतौर मंत्री कुछ खास नहीं रहा है’, इस पर नबीन का कहना था कि ’आप महज़ तीन महीनों में किसी नेता की परफॉरमेंस कैसे आंक सकते हैं?’ सनद रहे कि संजय टाइगर विद्यार्थी परिषद के जमाने से नितिन नबीन के साथ काम कर चुके हैं।
अटकी क्यों हैं पटना हाई कोर्ट में जजों की नियुक्तियां
26 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट कॉलियिजम से हरी झंडी मिलने के बावजूद पटना हाई कोर्ट में 9 जजों की नियुक्ति का मामला अभी भी अधर में लटका हुआ है। ये सभी अधिवक्ता हैं, जिन्हें जज के रूप में नियुक्त करने की अनुमति मिल गई है। माना जा रहा है कि अभी भी यह फाइल लॉ-मिनिस्ट्री में अटकी हुई हैं। विश्वस्त सूत्र इस लिस्ट की अभी तक तामील न हो पाने की दो वज़हें बता रहे हैं, एक तो इन नौ प्रस्तावित जजों की लिस्ट में एक नाम पटना हाई कोर्ट के अधिवक्ता का है।
सूत्र बताते हैं कि इससे पहले भी दो बार उनका नाम अनुमोदन के लिए दिल्ली भेजा गया था, पर कुछ कारणों से इनके नाम को हरी झंडी नहीं मिल पाई थी जबकि इनकी गिनती पटना के बेहद काबिल वकीलों में होती है। वहीं बिहार वालों को ऐसा भी लग रहा है कि जानबूझ कर बिहार की लिस्ट को लंबित रखा जा रहा ताकि अन्य राज्यों के हाई कोर्ट में तब तक धड़ल्ले से वहां जजों की नियुक्ति हो सके, जाहिर है इससे सुप्रीम कोर्ट तक के सफर में बिहार हाई कोर्ट के जज व​िरष्ठता के आधार पर पिछड़ सकते हैं। वहीं केंद्र सरकार से जुड़े कुछ विश्वस्त सूत्र खुलासा करते हैं कि इन नौ लोगों की लिस्ट में कुछ नामों पर सरकार को आपत्ति है, सो इनमें से कुछ चुनिंदा लोगों के नाम ही नॉटिफिकेशन में जारी हो पाएंगे।
क्या डीएमके भी भाजपा का हाथ थामेगी?
वहीं दूसरी ओर टीवीके से हार का भारी दंश झेलने के बाद डीएमके में भी सब कुछ सामान्य नहीं है। जब से कांग्रेस ने विजय को समर्थन का ऐलान किया है डीएमके ने कांग्रेस से कुट्टी कर ली है अब वह सदन में भी कांग्रेस की बगलगीर नहीं रहना चाहती, इस बारे में पार्टी ने पहले ही लोकसभा स्पीकर से कह दिया है कि ‘उनके सांसदों के लिए कांग्रेस से अलग बैठने की व्यवस्था की जाए।’ सनद रहे कि डीएमके के लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 8 सांसद हैं। इस दफे तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में उनके 59 तथा पुडुचेरी में 5 विधायक विजयी रहे हैं। डीएमके नेताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो चाहता है कि पार्टी भाजपा के समर्थन में खुलेआम उतर जाए, इस बात की पैरवी डीएमके नेता राजा और कनिमोझि कर रहे हैं। शायद इसी बात से नाराज़ होकर स्टालिन पुत्र उदयनिधि ने सनातन के खिलाफ इतना कड़ा बयान दे दिया।
वहीं पार्टी प्रमुख स्टालिन भी भाजपा के साथ जाने के पक्ष में नहीं बताए जाते, उनका स्पष्ट तौर पर मानना है कि ‘डीएमके भले ही एक क्षेत्रीय पार्टी है पर यह द्रविड़ियन पहचान की झंडाबरदार है, जो सामाजिक न्याय व राज्यों की स्वायत्ता की प्रबल पैरोकारों में से हैं, सो ऐसी पार्टियों को कम से कम भाजपा के साथ एक मंच पर नहीं दिखना चाहिए।’
…और अंत में
राहुल नवीन की जगह ईडी को एक मुखिया मिलने की चर्चा जोरों पर है, यह नाम है आईआरएस अफसर मनीष कुमार का, जो फिलवक्त दिल्ली कस्टम के चीफ कमिश्नर हैं। इससे पहले ये डायरेक्टर ऑफ इंटरनेशनल कस्टम में कार्यरत थे। यह एक बेहद लो-प्रोफाइल अफसर हैं, जो देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सगे छोटे भाई भी हैं। इन्वेस्टिगेशन और इंटेलिजेंस जुटाने में इन्हें महारथ हासिल बताया जाता है। इन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई दिल्ली के हिंदू कॉलेज से की है, इसके बाद इन्होंने इंटरनेशनल लॉ और टेक्सेशंस में दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की है। दो दशकों से ज्यादा का वक्त यह अपनी सरकारी सेवा को दे चुके हैं। राहुल नवीन अगस्त 2026 में अपने पद से रिटायर हो रहे हैं।

त्रिदीब रमण