धार की भोजशाला की ‘धार’

Summary :

मेरा शुरू से ही यह मत रहा है कि काशी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्म स्थान से मुस्लिम समुदाय को अपना दावा वापस ले लेना चाहिए और इन धार्मिक स्थलों को सहर्ष हिन्दू समुदाय को समर्पित कर देना चाहिए, क्योंकि भारत की मिली–जुली तहजीब की कैफियत यही है जिसमें दोनों सम्प्रदाय एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करते हैं। काशी और मथुरा के धार्मिक स्थल चीख-चीख कर कह रहे हैं कि इनका मुस्लिम अकीदे से कोई लेना-देना नहीं है और ये सिर्फ भारत में मुस्लिम आक्रमण के समय छोड़े गये निशान हैं। इसकी गहराई में आज जाने का…

मेरा शुरू से ही यह मत रहा है कि काशी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्म स्थान से मुस्लिम समुदाय को अपना दावा वापस ले लेना चाहिए और इन धार्मिक स्थलों को सहर्ष हिन्दू समुदाय को समर्पित कर देना चाहिए, क्योंकि भारत की मिली–जुली तहजीब की कैफियत यही है जिसमें दोनों सम्प्रदाय एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करते हैं। काशी और मथुरा के धार्मिक स्थल चीख-चीख कर कह रहे हैं कि इनका मुस्लिम अकीदे से कोई लेना-देना नहीं है और ये सिर्फ भारत में मुस्लिम आक्रमण के समय छोड़े गये निशान हैं। इसकी गहराई में आज जाने का कोई लाभ नहीं है, क्योंकि इसी स्तम्भ में इस बारे में मैं पहले कई बार विस्तार से लिख चुका हूं। हम अब 21वीं सदी में जी रहे हैं और इस दौर के भारत को अपने पुराने जख्मों को समेटे रखने की कोई जरूरत नहीं है। हमें वक्त के साथ आगे बढ़ना चाहिए और हिन्दू–मुसलमानों के बीच इतिहास द्वारा छोड़ेे गये कलुषता के चिन्हों को समाप्त करना चाहिए जिससे हमारी नई पीढि़यां सुख-चैन से जी सकें और एक-दूसरे का आदर कर सकें। इस क्रम में मध्य प्रदेश के धार शहर में स्थित राजा भोज द्वारा निर्मित ‘भोजशाला’ का राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा मन्दिर घोषित किया जाना बहुत महत्वपूर्ण है जिससे हमें पता चलता है कि भारत के कई इलाकों में एेसे स्थल मौजूद हैं जो हिन्दू–मुसमानों के बीच पुराने जख्मों को कुरेदते हुए वैमनस्य पैदा करते हैं। बेशक आज के मुसलमानों का न तो 13वीं सदी के मुस्लिम सुल्तानों से कुछ लेना है और न ही 16वीं सदी के मुगल बादशाहों से। मुस्लिम राजाओं का लक्ष्य जाहिराना तौर पर भारत को समृद्ध बनाने का नहीं था बल्कि इस देश के वैभव से स्वयं को माला-माल करने का था।
इस सिलसिले में मुगल बादशाह ज्यादा अक्लमन्द थे जिन्होंने कालान्तर में भारत को ही अपना घर बनाया और इसकी सुख-समृद्धि में हाथ बंटाया। मगर वे अपने साथ कुछ नहीं लाये थे उन्होंने जो कुछ भी यहां बनाया वह भारत की सम्पदा से ही बनाया, मगर इनमें से भी कई बादशाहों ने खास तौर पर औरंगजेब ने हिन्दू रियासत पर अपनी हुकूमत का रुआब गालिब करने की गर्ज से उनके धार्मिक स्थलों से छेड़छाड़ की और कुछ को इस्लामी तर्ज में ढालने के प्रयास भी किये। अतः बहुत स्पष्ट है कि स्वतन्त्र और धर्मनिरपेक्ष भारत के लोग इतिहास के बदनुमा दागों से छुटकारा पाने को लालायित हों। भोजशाला इसी का प्रमाण है। भारत के इतिहास के साथ एक त्रासदी यह भी है कि हमारी पीढि़यों को गुप्त काल के बाद सीधे सुल्तानी आक्रमणी दौर में पहुंचा दिया जाता है और यह बताया ही नहीं जाता कि आठवीं सदी से लेकर 12वीं सदी के बीच का भारत कैसा था। राजा भोज 11वीं सदी के शुरू के दौर में 1010 से 1055 तक मध्य भारत में मालवा क्षेत्र में राज करने वाले एेसे ही परमारवंशी महाप्रतापी राजा हुए जिनका शासन विदिशा से लेकर उत्तर में चित्तौड़ तक और दक्षिण पश्चिम में कौंकण क्षेत्र तक फैला हुआ था। उनकी राजधानी धार थी और यहीं उन्होंने विशाल शास्त्रीय नक्काशी वाला देवी सरस्वती या वाग्देवी का मन्दिर बनाया था जिसमें संस्कृत शोधशाला भी स्थापित की थी, मगर कालान्तर में इसी भोजशाला में एक मुस्लिम पीर मौला कमाल ने अपना डेरा जमा लिया जिससे इसका स्वरूप अर्ध इस्लामी हो गया और यहां मौला कमाल की मृत्यु के बाद नमाज अदा करने की भी रस्म शुरू कर दी गई।
1997 में भाजपा नेता साध्वी उमा भारती ने इसे हिन्दू मन्दिर व धार्मिक स्थल घोषित करने की मांग की व आन्दोलन भी चलाया। मामला अदालतों मंे पहुंच गया। जरा सोचिये राजा भोज का पीर मौला कमाल से क्या लेना–देना, मगर मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग इसे मौला कमाल मस्जिद कहने लगे। यह इतिहास से छल नहीं तो और क्या है ! अतः मुस्लिम समुदाय को स्वयं सोचना चाहिए कि वे नाजायज मांग पर अड़े हुए थे। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इंदौर पीठ ने इस सिलसिले में हिन्दू पक्ष का यह दावा बिल्कुल सही माना कि भोजशाला मूलतः वाग्देवी मन्दिर ही है। विद्वान न्यायाधीशों सर्वश्री विजय कुमार शुक्ल व आलोक अवस्थी की पीठ ने निर्णय देते हुए कहा कि हमारे समक्ष जो एेतिहासिक साहित्यिक साक्ष्य रखे गये हैं वे बताते हैं कि विवादित स्थल का मूल चरित्र भोजशाला का है जिसकी स्थापना राजा भोज ने एक संस्कृत ज्ञान पाठशाला के रूप में भी की थी। इन साक्ष्यों से पता चलता है कि यह भोजशाला वाग्देवी को समर्पित मन्दिर था। हमारे समक्ष रखे गये साक्ष्यों के अनुसार भोजशाला में शुरू से ही पूजा-अर्चना लगातार होती आ रही है जिसमें हिन्दू श्रद्धालु भाग लेते आ रहे हैं। हालांकि समय–समय के अनुसार इस परिपाठी का नियमन भी किया जाता रहा है मगर यह परंपरा समाप्त कभी नहीं हुई।
अतः यह संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि भोजशाला में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान रखा जाये और उनके ठहरने व आश्रय स्थलों के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता दी जाये। इसके साथ ही मन्दिर की शुद्धता और देवता की पवित्रता से समझौता न किया जाये। न्यायालय ने इस परिसर में कानून-व्यवस्था की स्थिति को भी चुस्त–दुरुस्त रखने के आदेश दिये हैं। विद्वान न्यायाधीशों ने अपने 240 के लगभग पृष्ठों के आदेश में लिखा है कि वे पुरातात्विक व एेतिहासिक साक्ष्यों तथा स्थल की सर्वेक्षण रिपोर्ट और पुरातत्व विभाग द्वार जारी की गई अधिसूचनाओं के अध्य़यन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि भोजशाला का कार्यभार पुरातत्व विभाग के पास ही है और वही इसकी देख-रेख भी करता है, मगर अप्रैल 2003 से भोजशाला में हर शुक्रवार को नमाज भी अदा की जा रही थी। वर्तमान आदेशों के बाद अब नमाज अदा नहीं होगी और मस्जिद के लिए सरकार धार में ही अन्यत्र जमीन सुलभ करायेगी।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.