नक्सल मुक्त भारत की ओर तेजी से बढ़ते कदम

Summary :

केंद्र की मोदी सरकार ने देश को नक्सल-मुक्त बनाने की समय सीमा 31 मार्च 2026 तय की थी। चूंकि तय समय सीमा में लगभग एक हफ्ते का समय शेष है। मीडिया के माध्यम से जो खबरें प्रकाश में आ रही हैं उससे इस बात का आभास हो रहा है कि देश को आने वाले कुछ दिनों में नक्सलवाद से मुक्ति मिल जाएगी। पिछले एक दशक में सुरक्षाबलों ने ‘ट्रेस, टारगेट, न्यूट्रलाइज’ रणनीति के तहत नक्सलियों के गढ़ों में घुसकर कार्रवाई की है। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑक्टोपस, और डबल बुल जैसे अभियानों ने नक्सली ढांचे को तोड़ दिया है। सुरक्षाबलों ने…

केंद्र की मोदी सरकार ने देश को नक्सल-मुक्त बनाने की समय सीमा 31 मार्च 2026 तय की थी। चूंकि तय समय सीमा में लगभग एक हफ्ते का समय शेष है। मीडिया के माध्यम से जो खबरें प्रकाश में आ रही हैं उससे इस बात का आभास हो रहा है कि देश को आने वाले कुछ दिनों में नक्सलवाद से मुक्ति मिल जाएगी। पिछले एक दशक में सुरक्षाबलों ने ‘ट्रेस, टारगेट, न्यूट्रलाइज’ रणनीति के तहत नक्सलियों के गढ़ों में घुसकर कार्रवाई की है। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑक्टोपस, और डबल बुल जैसे अभियानों ने नक्सली ढांचे को तोड़ दिया है। सुरक्षाबलों ने अबूझमाड़ जैसे नक्सलियों के अंतिम गढ़ों में सफलतापूर्वक प्रवेश कर लिया है।

साल 2025 में अब तक 317 नक्सलियों को मार गिराया गया है और 862 को गिरफ्तार किया गया है। वहीं 2024 में 290 नक्सली मारे गए थे। वामपंथी उग्रवाद यानी एलडब्ल्यूई से सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या घटकर अब मात्र 3 रह गई है, जो पहले बहुत अधिक थी। देश में वर्ष 2014 में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 थी, वह 2025 के अंत तक घटकर मात्र 3 ही रह गईं और उनमें भी कोई बड़ा नक्सली नेता जीवित या सक्रिय नहीं बचा था। यानी देश नक्सलवाद से मुक्ति के मार्ग पर तेजी से चल रहा है।

इतिहास के पन्ने पलटे तो 60 के दशक में नक्सल आंदोलन का जन्म बंगाल में आदिवासियों के खिलाफ पुलिस और जमींदारों के बीच संघर्ष के कारण हुआ लेकिन जब पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के नेता माओ ज़ेडोंग इस आंदोलन के वैचारिक केंद्र बन गए तो इसका स्वरूप भारतीय सरकारों के खिलाफ विद्रोह के रूप में बदल गया। नक्सलियों के लिए हथियार पश्चिम बंगाल में ही बनाए जाने लगे। कोलकाता का प्रेसीडेंसी कॉलेज नक्सलवाद का गढ़ बन गया। फिर सान्याल और मजूमदार के गुट वाली वामपंथी पार्टी ने हिंसक क्रांति का मार्ग चुना और भारतीय राज्य की नींव को ही उखाड़ फेंकने का विचार फैलाया।

बाद में कुछ राजनीतिक पार्टियां भी सत्ता के लिए नक्सलियों का इस्तेमाल करने लगीं। वर्ष 2004 में जब पीपल्स वार ग्रुप और माओइस्ट कॉम्युनिस्ट सेंटर का विलय हुआ तो हिंसा उन इलाकों में भी फैल गई जहां पहले शांति थी। भारतीय सत्ता के खिलाफ लगातार हिंसक संघर्ष देखा गया। छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा नक्सल गतिविधियाें का एक बहुत बड़ा केंद्र बन गया। वर्ष 2010 में 76 सीआरपीएफ जवानों के कत्ल हुए तो 2012 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कलेक्टर का अपहरण हो गया और फिर 2013 में, सलवा जुडूम शुरू करने वाले महेंद्र कर्मा समेत कई बड़े नेताओं और सुरक्षा कर्मियों की हत्या नक्सलियों ने कर दी लेकिन 2014 में अपनी सरकार बनाने से पहले ही नरेंद्र मोदी ने छतीसगढ़ की धरती से ही यह ऐलान कर दिया कि धरती को लाल करने का नारा देने वाले या तो धरती को हरा-भरा करने के उद्देश्य के साथ मुख्य धारा में लौट आए या फिर आर पार की लड़ाई के लिए तैयार हो जाए। पूर्व में नक्सली विरोधी अभियानों में समन्वय संबंधी समस्याओं के कारण सीमित सफलता मिली थी।

इस बार अंतर केंद्रीय गृह मंत्रालय के नेतृत्व में एकीकृत कमान और बहु-एजेंसी दृष्टिकोण में निहित है, जो सामंजस्य, खुफिया जानकारी का एकीकरण और निरंतर परिचालन गति सुनिश्चित करता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने भाषण में पुष्टि की कि मोदी सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ बिखरे हुए दृष्टिकोण के बजाय एक एकीकृत और कठोर दृष्टिकोण अपनाया है। राज्यों और केंद्रीय अर्धसैनिक इकाइयों जैसे सीआरपीएफ और उसकी विशिष्ट कोबरा बटालियनों के विशेष बल अब नियमित रूप से एक साथ प्रशिक्षण लेते हैं और संयुक्त नक्सल-विरोधी अभियान चलाते हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए में एक समर्पित विभाग बनाकर नक्सलियों की टेरर फंडिंग को रोका गया है।

अब तक लगभग 92 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त या कुर्क की जा चुकी है। इस कार्रवाई से शहरी क्षेत्रों में फैले उनके सूचना नेटवर्क और रसद आपूर्ति पर कड़ा प्रहार हुआ है। एक समय था जब छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र और बिहार समेत आधा दर्जन राज्यों में रेड कोरिडोर स्थापित था, जहां से नक्सली बड़े-बड़े हिंसक अभियान चलाते थे लेकिन 2014 के बाद शुरू हुईं नक्सल उन्मूलन कार्रवाईयों ने तस्वीर बदल कर रख दी है। एक दशक से भी कम समय में नक्सल प्रभावित इलाकों में 600 से ज़्यादा नए और आधुनिक पुलिस थाने बनाए गए हैं और हर जगह आसानी से सुरक्षा बलों को पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे तैयार किये गए हैं लेकिन जो नक्सली हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने के लिए तैयार हुए उन्हें आत्मसमर्पण के लिए सम्मानजनक जीवन के विकल्प भी दिए गए हैं।

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को सरकार द्वारा समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आकर्षक नीतियां और आर्थिक सहायता दी जा रही है। लगभग 12,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण जंगल क्षेत्रों में कर डाला, 6,500 से अधिक मोबाइल टावरों की स्थापना की और प्रभावित क्षेत्रों में 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम और लगभग 38,000 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट स्थापित किए गए हैं। 31 मार्च, 2026 तक “नक्सल-मुक्त भारत” का सरकार का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, बशर्ते कि शेष नेतृत्व के आत्मसमर्पण तक कड़े सुरक्षा उपाय जारी रहें और शासन तथा विकास में साथ-साथ सुधार हो। स्थायी शांति अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या सरकार सुरक्षा संबंधी सफलताओं को प्रभावित आबादी के जीवन में स्थायी सुधार में बदल सकती है।

नक्सली हिंसा का उन्मूलन केवल अंतिम बंदूक को शांत करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए दीर्घकालिक विश्वास निर्माण, केंद्र-राज्य समन्वय को मजबूत करना और जनजातीय कल्याण पर स्पष्ट ध्यान केंद्रित करना जरूरी है। इसमें भूमि अधिकार, रोजगार के अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच, संपर्क और वन अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल है। उम्मीद है, मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को कल्याणकारी नीतियों का लाभ मिलेगा और वो आमजन की भांति जीवन यापन कर सकेंगे।

Team Desk