अजित पवार के बाद एनसीपी!

Summary :

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया अजित पवार और चालक दल के सदस्यों समेत पांच लोगों की विमान दुर्घटना में मृृत्यु दुखद है। अजित पवार को अंतिम विदाई देने के लिए बारामती में जन सैलाब उमड़ पड़ा। लोगों की आंखों में आंसू दिखाई दिए। महाराष्ट्र में 6 बार उपमुख्यमंत्री रहे अजित पवार के राज्य में राजनीतिक योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अजित पवार जनता के नेता थे और जमीनी स्तर पर लोगों से उनका गहरा जुड़ाव था। उन्हें पिछड़े, आर्थिक रूप से कमजोर और समाज के वंचित वर्ग को सशक्त बनाने और समाज में हाशिये पर…

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया अजित पवार और चालक दल के सदस्यों समेत पांच लोगों की विमान दुर्घटना में मृृत्यु दुखद है। अजित पवार को अंतिम विदाई देने के लिए बारामती में जन सैलाब उमड़ पड़ा। लोगों की आंखों में आंसू दिखाई दिए। महाराष्ट्र में 6 बार उपमुख्यमंत्री रहे अजित पवार के राज्य में राजनीतिक योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अजित पवार जनता के नेता थे और जमीनी स्तर पर लोगों से उनका गहरा जुड़ाव था। उन्हें पिछड़े, आर्थिक रूप से कमजोर और समाज के वंचित वर्ग को सशक्त बनाने और समाज में हाशिये पर खड़े लोगों को मुख्य धारा में शामिल करने के प्रयासों के लिए याद किया जाता रहेगा। राजनीति तो दांव-पेंचों का ही खेल है और महाराष्ट्र की मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों में दांव-पेच कोई नई बात नहीं है। अजित पवार को महाराष्ट्र की सियासत में अपनी कलाबाजियों के लिए भी माहिर माना जाता था। उन्होंने अपने चाचा और दिग्गज मराठा नेता शरद पवार से ही सियासत के गुर सीखे। शरद पवार को वह अपना राजनीतिक गुरु कहते रहे लेकिन 2023 आने तक उन्होंने ऐसा दांव खेला कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दो फाड़ हो गई और अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट ने भाजपा को समर्थन दिया आैर स्वयं उपमुख्यमंत्री बन गए। वह पार्टी का चुनाव चिन्ह भी ले जाने में सफल रहे। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे चाचा शरद पवार की छत्रछाया में 7 बार विधायक चुने गए। अलग राह चुनने के बावजूद चाचा शरद पवार के परिवार से उनके संबंध करीबी बने रहे।
पारिवारिक समारोह में चाचा-भतीजा परिवारों को साथ-साथ देखकर इसका अनुमान लगाया जाना कठिन था कि सियासत में दोनों का रास्ता अलग-अलग है। यह वास्तविकता है कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त नहीं। यह वास्तविकता है कि राजनीति में कोई स्थायी नहीं होता आैर न ही स्थायी दुश्मन। अजित प​वार अपनों के साथ भी रहे और धुर विरोधियों के साथ भी रहे। किसी दुर्घटना में हुई दुखद मृत्यु से राजनीति का चक्र बाधित नहीं हाेता लेकिन अजित पवार ऐसे महत्वपूर्ण स्थान पर थे कि उनकी मृत्यु ने उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं आैर समर्थकों को इस दुख की घड़ी में यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का भविष्य क्या होगा? पिछले 10 वर्षों से महाराष्ट्र की राजनीति काफी संवेदनशील रही। एकमात्र प्रमुख ध्रुव के रूप में उभरने की को​िशशों में भाजपा ने कांग्रेस पार्टी को तो पराजित किया ही लेकिन शिवसेना और राकांपा में विद्रोह के बाद उभरे गुटों से भी समझौता किया। अजित पवार में एक कसक शुरू से ही रही कि 20 साल से अधिक समय से चाचा शरद पवार उनके मुख्यमंत्री बनने के रास्ते में बाधा बने हुए हैं। 2004 में एक बार अजित पवार के मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
“पारिवारिक समीकरणों ने भी शरद पवार और अजित के रिश्ते को और तनावपूर्ण बना दिया। अपने भतीजे को राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने के बाद शरद पवार ने 2005 में अपनी बेटी को राजनीति में उतारा। राज्यसभा सदस्य के रूप में सुप्रिया सुले ने शुरू में राज्य की राजनीति से दूरी बनाए रखी लेकिन बाद में अजित के लिए एनसीपी के महाराष्ट्र मामलों में उनके हस्तक्षेप की अनदेखी करना मुश्किल हो गया।”
अतीत के घटनाक्रम कुछ भी रहे हों लेकिन अब सवाल यह है कि अब आगे क्या होगा? पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा। इस पर अभी संशय के बादल हैं। महाराष्ट्र की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले विश्लेषक अपना-अपना आंकलन कर रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अजित पवार के निधन के बाद मराठा समुदाय यह सोचेगा कि अब उनके पास कौन है? शरद पवार जीवन के संध्याकाल में हैं और मराठा जाति को यह तय करना है कि उन्हें किस तरफ रुख करना है। राकांपा समय की नजाकत को भांपते हुए एकजुट हो सकती है। मराठा जाति अपनी कमजोर हुई हैसियत को फिर से मजबूत बनाने के प्रयास कर सकती है। दूसरी सम्भावना यह है कि अजित पवार की पार्टी की कमान भले ही उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार या बेटे पार्थ पवार के हाथ में रहे लेकिन पार्टी के कुछ नेता पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण फैसले ले सकते हैं। हो सकता है ​िक पार्टी का देर-सवेर शरद पवार की पार्टी में विलय हो जाए। अजित पवार की पार्टी में प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, धनंजय मुंडे, सुनील तटकरे जैसे अनुभवी नेता तो जरूर हैं लेकिन अजित पवार की राजनीतिक विरासत को सम्भालना किसी के ​िलए भी सरल नहीं होगा। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में अजित पवार और शरद काफी नजदीक नजर आए आैर जिला परिषद पंचायत समिति के चुनाव भी साथ-साथ लड़ने जा रहे थे। ऐसे में दोनों गुट यह चाहेंगे ​िक पार्टी एकजुट हो जाएं। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले की छवि भी मराठा समुदाय में अच्छी खासी है। जनता के साथ उनका जुड़ाव भी काफी है। इस बात की सम्भावनाएं बन रही हैं कि दोनों गुटों में विलय ही अंितम विकल्प हो सकता है। अजित पवार गुट के पास महाराष्ट्र ​विधानसभा में 41 विधायक हैं। इसके अलावा पार्टी का लोकसभा में एक सांसद भी है। एक सम्भावना तो यह भी है ​िक अजित पवार की पत्नी या उनके बेटों पार्थ और जय पवार को उनकी विरासत सम्भालने के लिए आगे लाया जाए। हालांकि पार्थ पवार पहले चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। इसके बाद से ही वे महाराष्ट्र की राजनी​ित में सक्रिय नहीं रहे। ऐसे में उनमें अपने पिता जैसी राजनीतिक कुशलता और जमीनी पकड़ जैसे कौशल को लेकर अभी बहुत सारे सवाल सामने हैं। दूसरी तरफ शरद पवार के बाद सुप्रिया सुले उनकी विरासत की उत्तराधिकारी हैं, जबकि रोहित पवार उभरते सितारे के तौर पर देखे जाते हैं। शरद गुट के लिए भी राकांपा पर ​िनयंत्रण और अजित पवार के बराबर का नेता ढूंढना मुश्किल होगा।
अजित पवार के बिना उनके गुट के विधायकों की स्थिति कमजोर हो सकती है। बिना किसी मजबूत नेतृत्व के इन विधायकों पर शरद पवार के गुट में वापस लौटने का राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। अगर अजित गुट सरकार से अलग भी होता है तो भी महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। भले ही उनकी सरकार स्थिर रहे लेकिन मराठा सियासत का उभार हो सकता है। जनता की सहानुभूति भी पवार परिवार के साथ होगी। इससे भाजपा को आघात लग सकता है। जोड़तोड़ की राजनीति में कोई अंतिम वाकया नहीं लिखा जा सकता लेकिन इतना स्पष्ट है कि अजित पवार के निधन से जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ है उसकी भरपाई करना अभी मुश्किल होगा।

Aditya Chopra

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