संसद का बजट सत्र चल रहा है और इसमें ऐसा गतिरोध पैदा हो गया है जिसे सुलझाने में सत्ता और विपक्ष नाकामयाब होते दिखाई पड़ रहे हैं। भारत के संसदीय लोकतन्त्र के लिए यह स्थिति किसी भी प्रकार से उचित नहीं कही जा सकती क्योंकि हमारी पूरी शासन प्रणाली का मार्ग संसद से होकर ही गुजरता है। स्वतंत्रता के बाद हमने अपनी संसदीय प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए जो उपाय किये उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण लोकसभा के अध्यक्ष की स्वतन्त्र व निरपेक्ष सत्ता थी। लोकसभा चूंकि भारत के लोगों द्वारा सीधे चुने गये अपने प्रतिनिधियों की सबसे ऊंची संस्था होती है। अतः इसके संचालन के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसी प्रणाली विकसित की जिससे इसमें बैठने वाले हर सदस्य की भावनाओं व अभिव्यक्ति को आवाज मिल सके। इसके लिए सदन में अध्यक्ष या स्पीकर की व्यवस्था की गई और उसे अधिकृत किया गया कि वह सत्तारूढ़ बहुमत दल की सरकार से पूरी तरह निरपेक्ष रहते हुए सदन में पहुंचे हर किसी दल के सदस्य के साथ निरपेक्ष रहते हुए व्यवहार कर सके। इसके लिए अध्यक्ष की सत्ता सदन में स्वतन्त्र रूप से स्थापित की गई और उसका अपना सचिवालय बनाया गया और उसे संसद परिसर का संरक्षक भी बनाया गया। यह बेवजह नहीं है कि लोकसभा में अध्यक्ष का चुनाव सर्वसम्मति से कराने की परंपरा डाली गई। क्योंकि सदन में पहुंचे हर किसी दल के सदस्य के अधिकार एक बराबर होते हैं और इसमें सत्ता व विपक्ष का कोई भेदभाव नहीं रहता।
अतः अध्यक्ष को उन अधिकारों से लैस किया गया जिससे वह बिना किसी भेदभाव के संसद की नियमावली के अनुसार प्रत्येक सदस्य को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का पूरा अधिकार दे सकें जिससे वह सदस्य खुद को मिले विशेषाधिकारों के तहत सदन के भीतर अपनी बात बिना किसी खौफ-ओ-खतर के कह सके। परन्तु वर्तमान में हम देख रहे हैं कि लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी को ही अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने विभिन्न नियमों का हवाला देकर बोलने की अनुमति नहीं दी जिसकी वजह से पूरा विपक्ष बिफर उठा और उसने अब फैसला कर लिया है कि वह अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लायेगा। यह स्थिति वास्तव में दुखद है क्योंकि इससे लगता है कि हमारी लोकसभा अब ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है जिसमें विपक्ष व सत्तारूढ़ दल के बीच किसी प्रकार का संवाद नहीं हो सकता है। मूल प्रश्न यह है कि एेसी स्थिति क्यों आयी? इस सन्दर्भ में हमें संसद की पुरानी परंपराओं को भी देखना होगा क्योंकि लोकतन्त्र में पुरानी परंपराएं भी नियम के समरूप होती हैं। 1952 में देश में पहले आम चुनाव होने के बाद से ही हमने जो परिपाटी अपनाई उसमें लोकसभा में अल्पमत में बैठे विपक्ष के सदस्यों को अपनी बात कहने के लिए एेसा बड़ा क्षेत्र दिया गया जिससे वे सरकार को हर कदम पर सचेत करते हुए जनहित पर केन्द्रित कर सकें और लोगों के कल्याण के लिए अपने विचारों से सत्ता पक्ष को अवगत करा सकें। 1952 में चुनी गई पहली लोकसभा में विपक्ष के सांसदों की संख्या बहुत कम थी मगर इसके बावजूद इसके अध्यक्ष श्री मावलंकर के विरुद्ध 1953 में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। श्री मावलंकर आजादी से पहले सेंट्रल एसेम्बली के भी अध्यक्ष रह चुके थे अतः स्वतन्त्रता के बाद पहला लोकसभा अध्यक्ष उन्हें ही बनाना उचित समझा गया। अध्यक्ष के खिलाफ जब अविश्वास प्रस्ताव उन्हीं के सामने लाया जाता है तो इसके नियमानुसार दाखिल होने के बाद वह अपना आसन छोड़ देते हैं और सदन में अन्य सांसदों के साथ आकर बैठ जाते हैं। जब तक उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला न हो जाये तब तक अध्यक्ष के आसन पर उपाध्यक्ष आकर बैठते हैं और उनकी सदारत में सदन की कार्यवाही चलती है। परन्तु लोकसभा में इसके पिछले कार्यकाल से ही किसी उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं किया गया है। अतः इस परिस्थिति में सदन के सभापति का दायित्व उस पैनल के सबसे वरिष्ठ व्यक्ति को दिया जा सकता है जिसका चुनाव स्वयं अध्यक्ष ही करते हैं। जब तक सदन में अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा चलती है तब तक उन्हें सदन में बोलने का अधिकार नहीं रहता। वह इस मुद्दे पर हुए मतदान में भी हिस्सा नहीं ले सकते। मगर ऐसा सब कुछ 1953 में हो चुका है हालांकि उस समय अविश्वास प्रस्ताव भारी बहुमत से गिर गया था क्योंकि सदन में कांग्रेस पार्टी का भारी बहुमत था। वर्तमान लोकसभा में सत्तारूढ़ एनडीए का पूरा बहुमत है मगर सदन की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा का अपने बूते पर बहुमत नहीं है। केवल इसी तथ्य से विपक्ष गदगद नहीं हो सकता है। भाजपा के साथ जो अन्य सहयोगी दल एनडीए में हैं वे इस मुद्दे पर उसका साथ छोड़कर इसलिए नहीं जा सकते क्योंकि वे सत्ता में भागीदार हैं। अतः यदि लोकसभा में अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आता भी हो तो वह निश्चित रूप से गिर जायेगा। मगर इससे अध्यक्ष के आसन की गरिमा पर जरूर आघात लगेगा। अतः इस स्थिति को यदि टाला जा सकता है तो अन्तिम क्षण तक कोशिश की जानी चाहिए। इसके साथ ही विपक्षी महिला सांसदों ने भी अध्यक्ष श्री बिरला को एक सांझा खत लिखकर उन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने कुछ महिला सांसदों के बारे में ऐसी बातें कहीं जिससे उनकी छवि एक अपराधी जैसी हो गई। श्री बिरला ने कहा था कि कुछ महिला सांसद प्रधानमन्त्री के खिलाफ लोकसभा के भीतर ऐसा कुछ कर सकती थीं जिससे कुछ भी अप्रत्याशित घट सकता था।
महिला सांसदों ने उनसे इसका प्रमाण देने के लिए भी कहा है। लोकसभा के पूरे माहौल को देखकर लगता है कि सत्ता और विपक्ष जैसे दो दुश्मन हों जबकि लोकतन्त्र में ये दोनों गाड़ी के दो पहिये होते हैं जिनके बिना संसद सुचारू रूप से नहीं चल सकती। हमने देखा है कि किस प्रकार पहले राज्यसभा के भीतर भी इसके पूर्व सभापति श्री जगदीप धनखड़ के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने की बात हुई थी और उससे पहले किसान विधेयकों के मुद्दे पर इसी सदन के उपसभापति हरिवंश के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव लाने के प्रयास किये गये थे। लोकतन्त्र में एेसी घटनाओं से लोगों का विश्वास ही इस व्यवस्था में डगमगाता है। अतः हर कीमत पर लोकसभा में स्वस्थ परंपराओं का ही अनुसरण किया जाना चाहिए और संसद में विपक्ष की हिस्सेदारी के साथ भी समझौता नहीं किया जाना चाहिए ।
अध्यक्ष के प्रति ‘अविश्वास’
Summary :
संसद का बजट सत्र चल रहा है और इसमें ऐसा गतिरोध पैदा हो गया है जिसे सुलझाने में सत्ता और विपक्ष नाकामयाब होते दिखाई पड़ रहे हैं। भारत के संसदीय लोकतन्त्र के लिए यह स्थिति किसी भी प्रकार से उचित नहीं कही जा सकती क्योंकि हमारी पूरी शासन प्रणाली का मार्ग संसद से होकर ही गुजरता है। स्वतंत्रता के बाद हमने अपनी संसदीय प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए जो उपाय किये उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण लोकसभा के अध्यक्ष की स्वतन्त्र व निरपेक्ष सत्ता थी। लोकसभा चूंकि भारत के लोगों द्वारा सीधे चुने गये अपने प्रतिनिधियों की सबसे ऊंची संस्था…


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