पिछले दो-तीन वर्षों से भारत में एक देश -एक चुनाव पर गंभीर चर्चा चल रही है क्योंकि 2024 में केन्द्र सरकार इस बाबत विधेयक लोकसभा में लाई जिसे 129वां संविधान संशोधन विधेयक कहा जा रहा है। यह विधेयक पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की सदारत में गठित उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के बाद सरकार ने तैयार किया और लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की वकालत की।
परन्तु इस विधेयक को लोकसभा में पेश करने के बाद इसे संसद की संयुक्त समिति के पास गहन विचार-विमर्श के लिए भेज दिया गया। इस समिति में सत्तारूढ़ दल भाजपा के सांसदों के अलावा दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा के सभी प्रमुख विपक्षी दलों के सांसद भी शामिल हैं। तब से लेकर अब तक यह समिति विधी या कानून क्षेत्र की कई हस्तियों से विचार-विमर्श कर चुकी है जिनमें देश की सबसे ऊंची अदालत सर्वोच्च न्यायालय के चार भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश सर्वश्री यू.यू. ललित, रंजन गोगोई, जे.एस. केहर व डी.वाई. चन्द्रचूड़ भी शामिल हैं। ये चारों पूर्व न्यायमूर्ति विधेयकों के बारे में अपनी राय समिति को दे चुके हैं।
संसद की इस संयुक्त प्रवर समिति का नेतृत्व पूर्व कानून राज्यमन्त्री भाजपा के लोकसभा सांसद श्री पी.पी. चौधरी कर रहे हैं। मगर गत सप्ताह श्री चौधरी ने समिति के सदस्यों के पास एक सूचना भेजी कि आगामी 6 अक्तूबर को समिति सर्वोच्च न्यायालय जाकर मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों के साथ विधेयक के बारे में अनौपचारिक चर्चा करेगी। इससे यह समिति ही विवादों में घिर गई क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का काम संसद द्वारा बनाये गये कानूनों की समीक्षा करना होता है न कि संसद में पेश किये गये विधेयकों पर अपनी राय देना।
सर्वोच्च न्यायालय यह देखता है कि संसद ने जो कानून बनाया है वह संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है कि नहीं। श्री चौधरी की सूचना पर जब समिति के कुछ विपक्षी सदस्यों खास कर कांग्रेसी सांसदों ने एेतराज किया और इसका संवैधानिक पक्ष बताया तो श्री चौधरी ने सर्वोच्च न्यायालय भ्रमण करने की योजना रद्द कर दी। मगर इससे एक देश- एक चुनाव की अवधारणा फिर विवादों में आ गई जबकि भारत का संविधान स्पष्ट रूप से न्यायपालिका व संसद अर्थात विधायिका के अधिकारों के बीच स्पष्ट रूप से महीन सीमा रेखा खींचता है।
बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा लिखित संविधान में स्पष्ट है कि भारत का लोकतन्त्र चार विशिष्ट खम्भों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व चुनाव आयोग पर टिका होगा और इनके बीच अधिकारों की सीमा रेखा होगी। डा. भीमराव अम्बेडकर के संविधान में न्यायपालिका व चुनाव आयोग सरकार का अंग न होकर स्वयं में पूरी तरह स्वतन्त्र होते हैं। इसलिए चुनाव आयोग और इसके मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर आजकल राजनैतिक क्षेत्रों में जो बाबेला मचा हुआ है, तकनीकी तौर पर उससे मोदी सरकार का कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि संविधान के अनुसार चुनाव आयोग सीधे संविधान से ही शक्ति लेकर अपना कामकाज करता है और सीधे संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह होता है।
दूसरे उसकी जवाबदेही सीधे मतदाताओं के प्रति होती है क्योंकि वही भारत के लोगों द्वारा 18 वर्ष की आयु पा जाने के बाद उन्हें मतदाता बनाता है जो कि केन्द्र व राज्यों की सरकारों का गठन अपने एक वोट की ताकत पर करता है। इसी प्रकार न्यायपालिका भी सीधे संविधान से ताकत लेकर अपना कामकाज करती है। सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य कार्य पूरे देश में संविधान का राज देखना होता है। इसी वजह से संसद द्वारा बनाये गये कानूनों की समीक्षा करने का अधिकार उसके पास होता है। जहां तक मीडिया या पत्रकारिता का सवाल है तो उसे लोकतन्त्र का चौथा खम्भा प्रख्यात समाजवादी नेता व चिन्तक डा. राम मनोहर लोहिया ने बताया था।
इसकी मूल वजह यह थी कि उनके 1967 तक जीवित रहते चुनाव आयोग कभी विवादों में आया ही नहीं था और यह अपना काम संविधान के अनुसार पूरी सत्य निष्ठा के साथ करता था। इसकी पहली कठिन परीक्षा 1969 में तब हुई थी जब प्रधानमन्त्री पद पर रहते हुए श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को दो भागों में विभक्त किया था। संयोग से 1967 तक देश में लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते रहे थे क्योंकि तब तक कांग्रेस पार्टी का ही केवल केरल को छोड़ कर पूरे देश में एक छत्र राज्य था। दिक्कत 1969 में तब आयी जब 1967 में कांग्रेस से विद्रोह कर विभिन्न राज्यों में विपक्षी संयुक्त सरकारों का गठन विद्रोही कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में ही हुआ।
एक दो राज्य हालांकि इसके अपवाद भी रहे जैसे ओडिशा व पंजाब। ये विपक्षी गठबन्धन की अधिकतम सरकारें पांच साल की जगह दो साल तक भी बामुश्किल से ही चल पाईं जिसके फलस्वरूप उन राज्यों में मध्यावधि चुनाव हुए। तभी से पूरे देश में लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग होने लगे। इसके साथ ही केन्द्र में 1989 के बाद गठबन्धन सरकारों का दौर शुरू हुआ (1991 से 1996 तक को छोड़कर) वर्तमान में सत्तारूढ़ भाजपा का मानना है कि लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव अलग- अलग होने से देश 12 महीने चुनावी मुद्रा में रहता है जिससे भारी खर्चा होता है और आदर्श चुनाव संहिता लागू होने की वजह से विकास कार्यों पर विपरीत असर पड़ता है।
दूसरी और अधिसंख्य विपक्षी दलों का मत है कि एक साथ चुनाव कराने से भारत के संघीय ढांचे पर कुप्रभाव पड़ेगा और राज्यों के अधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा क्योंकि हर राज्य की राजनैतिक परिस्थितियां और लोगों की अपेक्षाएं अलग-अलग होती हैं। संसद में पेश 129वें संविधान संशोधन में प्रावधान किया गया है कि यदि लोकसभा समेत विधानसभाओं में चुनी हुई सरकारें पांच साल से पहले ही दम तोड़ देती हैं और चुने हुए सदन भंग हो जाते हैं तो मध्यावधि चुनाव होने के बाद विधानसभा सदन का जीवन पांच साल न होकर पिछले पांच साल की बची शेष अवधि लिए ही होना चाहिए जिससे सभी राज्यों के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ नत्थी हो सकें।
मगर भारत के संविधान में स्पष्ट व्याख्या है कि हर चुनाव के बाद चुने हुए सदन की जीवन अवधि पांच साल ही होगी। जिसकी वजह से 129वें संशोधन विधेयक में भारतीय संविधान में संशोधन करने के प्रावधान रखे गये हैं। मगर सवाल खड़ा हो रहा है कि इससे राज्यों के उन अधिकारों का क्या होगा जो संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित हैं।
बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान में केन्द्र व राज्यों के अधिकारों का बटंवारा किया हुआ है जिनमें हर विधानसभा के पांच साल के कार्यकाल की गारंटी है। इसी वजह से भारत को राज्यों का संघ (यूनियन आफ इंडिया) कहा जाता है। संविधान में अधिकारों की केन्द्र सूची व राज्यों की सूची के अलावा समवर्ती सूची भी है।
इसके साथ ही केन्द्र के पास किसी भी राज्य में वहां संविधान के चरमराने पर राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार भी रहता है। हालांकि इसमें एक संशोधन यह हुआ है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने पर लोकसभा व राज्यसभा दोनों की मंजूरी भी केन्द्र सरकार को लेनी पड़ती है। जहां तक एक देश-एक चुनाव का सवाल है तो इन सब पेचीदगियों को देखते हुए ही कोविंद समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी थी। एक देश एक चुनाव सम्बन्धी संविधान संशोधन विधेयक को संसद की स्वीकृति मिलने के बाद देश के आधे राज्यों की मंजूरी भी लेनी होगी। फिर यह भी देखना होगा कि हर राज्य की राजनैतिक परिस्थितियां अलग- अलग होने की वजह से उनमें रहने वाले मतदाता इसे किस रूप में लेंगे।


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