परिसीमन और दक्षिणी राज्य

Summary :

प्रस्तावित परिसीमन विधेयक एक बार फिर राजनीतिक बहस का केन्द्र बिन्दुु बन गया है। परिसीमन के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं फिर से निर्धारित की जानी हैं। इसका उद्देश्य जनसंख्या में बदलाव के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखना है। केन्द्र सरकार ने इससे जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था लेकिन लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर पाने पर विधेयक खारिज हो गया। इसके बाद सरकार ने परिसीमन बिल भी वापिस ले लिया। इस पूरे विवाद के केन्द्र में सबसे बड़ा सवाल उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक…

प्रस्तावित परिसीमन विधेयक एक बार फिर राजनीतिक बहस का केन्द्र बिन्दुु बन गया है। परिसीमन के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं फिर से निर्धारित की जानी हैं। इसका उद्देश्य जनसंख्या में बदलाव के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखना है। केन्द्र सरकार ने इससे जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था लेकिन लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर पाने पर विधेयक खारिज हो गया। इसके बाद सरकार ने परिसीमन बिल भी वापिस ले लिया। इस पूरे विवाद के केन्द्र में सबसे बड़ा सवाल उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का है। समूचा विपक्ष भी सरकार द्वारा परिसीमन प्रक्रिया के तहत देश के राजनीतिक मानचित्र को बदलने के तौर-तरीकों को लेकर संशय में है। परिसीमन के दौरान यह भी तय किया जाता है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए कितनी सीटें आरक्षित रखी जानी हैं। प्रस्तावित विधेयक में लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रावधान है। इससे दक्षिणी राज्यों की सीटें मौजूदा 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं और कुल सदन में उनकी भागीदारी 24 प्रतिशत के लगभग बनी रहेगी।
गृहमंत्री अमित शाह ने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में दक्षिण क्षेत्रीय परिषद की बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक का उद्देश्य दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे, परिसीमन और आपसी सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करना था। बैठक में तमिलनाडु, कर्नाटक और एनडीए शासित आंध्र और अन्य दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्री व प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने परिसीमन का जमकर विरोध किया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने गृहमंत्री के समक्ष मांग रखी कि लोकसभा की 543 सीटें ही अगले 25 वर्षों तक बरकरार रखी जाएं। यदि परिसीमन हो तो उसका आधार 1971 की जनगणना ही रखा जाए। शिवकुमार के साथ ही तमिलनाडु के सीएम जोसेफ विजय ने कहा कि दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीति को सफलतापूर्वक लागू किया है तो ऐसे में नई जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करने से इन राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जो उनके साथ अन्याय होगा। दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की 31वीं बैठक में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने कहा कि दक्षिण भारत के राज्यों में यह वास्तविक और साझा चिंता है कि यदि परिसीमन हाल की जनगणना के आधार पर हुआ तो संसद में उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर हो जाएगी।
मुख्यमंत्रियों ने कहा कि राष्ट्रीय नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करने वाले राज्याें को उनकी सफलता के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए। अतः केन्द्र सरकार कानून के जरिये यह भरोसा दे कि किसी भी राज्य की संसद में हिस्सेदारी उनकी जनसंख्या नियंत्रण की सफलता के कारण कम नहीं होगी। दक्षिणी राज्यों की मुख्य चिंता जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संबंध को लेकर है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में पिछले दशकों में प्रजनन दर और जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में कमी आई है। इसके पीछे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार नियोजन जैसे कारकों की भूमिका रही है। दूसरी ओर, उत्तर भारत के कई राज्यों में इसी अवधि में आबादी अपेक्षाकृत तेज गति से बढ़ी। यही वजह है कि दक्षिणी राज्यों के नेताओं को डर है कि अगर लोकसभा की सीटों का पुनर्विन्यास मौजूदा जनसंख्या के अनुपात में किया गया, तो उन्हें जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने का राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह चिंता सिर्फ सीटें कम होने की नहीं है, बल्कि लोकसभा में कुल सीटों के अनुपात और राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी है।
भारत में अलग-अलग राज्यों की आबादी पिछले दशकों में एक समान गति से नहीं बढ़ी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दक्षिणी राज्यों की तुलना में अधिक रही है। वहीं, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार काफी कम हुई है। यही अंतर परिसीमन की बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का आवंटन आबादी के अनुपात में ज्यादा किया जाता है, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों की सीटों में वृद्धि हो सकती है। दूसरी ओर, कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटें बढ़ने की रफ्तार अपेक्षाकृत कम रह सकती है। इससे लोकसभा में उनकी कुल सीट हिस्सेदारी घटने की आशंका पैदा होती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य में परिसीमन के लिए कौन-सा फार्मूला अपनाया जाता है और लोकसभा की कुल सीटों की संख्या कितनी तय होती है। इसलिए अभी यह कहना कि कौन-सा राज्य निश्चित रूप से कितनी सीटें खोएगा या पाएगा, अंतिम परिसीमन से पहले उचित नहीं होगा।
दक्षिण भारत देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पांच दक्षिणी राज्य मिलकर भारत की लगभग एक-तिहाई जीडीपी में योगदान देते हैं। जबकि इन राज्यों की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 1-5वां हिस्सा है। दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने मांग रखी कि आर्थिक योगदान के अनुरूप उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मिलना चाहिए। परिसीमन विधेयक को पारित करने के​ लिए संसदीय बहुमत एक आवश्यक औपचारिकता है लेकिन लोकतंत्र केवल इसी तक सीमित नहीं है। केन्द्र सरकार भले ही इस विधेयक पर आवश्यक वोट जुटाने की कोशिश कर रही है। बेहतर यही होगा कि सरकार परिसीमन विधेयक पर सभी पक्षों से संवाद कर आम सहमति कायम करे, सरकार ने महिला आरक्षण को आगे रखकर इसे निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से जोड़ने की कोशिश तो की लेकिन विपक्ष का कहना है कि वह महिला आरक्षण के​​ विरोधी नहीं हैं लेकिन परिसीमन संघीय संतुलन कायम करने वाला होना चाहिए। देखना होगा कि सरकार परिसीमन के किस फार्मूले पर आगे बढ़ती है।

Aditya Chopra

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