‘देखो मैंने कैसे बड़े प्यार से हाथ अपने तेरी ओर दोस्ती केे बढ़ाए थे
यह तेरा गिला था जो तेरे हाथ मुझे अपने गिरेबां पर नज़र आए थे’
सियासत दिल्ली की सत्ता की चेरी की तरह अब तक जो आचरण कर रही थी, पिछले कुछ समय से उसका मिजाज़ बदल गया लगता है। अपनी लाख कोशिशों के बाद भी केंद्र सरकार सदन में परिसीमन बिल पास कराने के लिए सांसदों के जरूरी आंकड़े दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ अब तक नहीं कर पाई है। सूत्रों की मानें तो पिछले दिनों सरकार के एक संकटमोचक मंत्री ने उन्हें सांसदों की जुगाड़ लिस्ट थमाई थी, दावा हुआ था कि ‘इनके भरोसे परिसीमन की नैया पार हो सकती है।’ इन मंत्री जी ने सरकार से आग्रह किया था कि ‘संसद का एक विशेष सत्र बुला कर अब महिला आरक्षण व परिसीमन बिल को पास कराया जा सकता है।’
सनद रहे कि अभी संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं हुआ है, इसे बस अनिश्चितकाल के लिए स्थगित भर किया गया है, यानी सरकार जब चाहे संसद का सत्र बुला सकती है और इसके लिए उसे राष्ट्रपति से भी मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं है। सो, फूंक-फूंक कर हर कदम चलते सरकार ने अपने एक भरोसेमंद मंत्री के मार्फत डीएमके से संपर्क साधा, तो डीएमके का बदला रवैया देख कर वे हैरान रह गए, डीएमके ने छूटते ही परिसीमन बिल के समर्थन में वोटिंग से इंकार कर दिया, पार्टी का कहना था कि ‘पहले तो वे मतदान के वक्त संसद से गैर हाजिर रहने की सोच रहे थे पर अब तो वह भी मुमकिन नहीं होगा क्योंकि राज्य में सत्तासीन टीवीके और कांग्रेस ने मिल कर तमिलनाडु विधानसभा में परिसीमन विरोधी प्रस्ताव पास करा लिया है।’
सौंपे गए समर्थक दलों की लिस्ट में दूसरा नाम जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस का था, इस पर जब उमर अब्दुल्लाह से बात की गई तो सूत्रों का कहना है कि उन्होंने दो टूक कह दिया कि ‘स्थानीय राजनैतिक दबावों को देखते हुए वे भाजपा को तो चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करेंगे।’ वैसे भी उनके ही विजयी सांसद पूरी तरह उनके कंट्रोल में नहीं हैं, उनके विजयी दो लोकसभा सांसदों में से एक अगा सईद रूहुल्लाह मेहदी ने तो उनके पिता फारूख अब्दुल्लाह से ही पंगा ले रखा है। उसी संकटमोचक मंत्री का दावा था कि ‘कर्नाटक से आने वाले चार कांग्रेसी सांसद वोटिंग के दिन सदन से गैर हाजिर रह सकते हैं,’ पर जब इन चारों से बात की गई तो ये भी अपने वादे से मुकर गए, कहा ‘अभी देश का मूड जब भाजपा के खिलाफ हो रहा है तो फिर हम भला धारा के विरुद्ध क्यों चलें?’ वैसे भी तृणमूल से टूट कर अलग हुए 20 बागी सांसदों का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है और लोकसभा स्पीकर ने भी उन्हें एक अलग दल के तौर पर अभी मान्यता नहीं दी है, सो परिसीमन विधेयक पर अभी दिल्ली के लिए वाकई दिल्ली दूर लग रही है।
क्या इस्तीफा देने से मना कर रहे हैं कुछ केंद्रीय मंत्री?
सियासी अंतःपुर भी इन दिनों रोज नई दिलचस्प करवटें ले रहा है। ऐसा शायद बारह सालों में पहली बार हुआ है जब सरकार के आदेश को शिरोधार्य करने से सत्ता के अपने ही सिपहसालार इंकार कर दें। कहते हैं कि एक मंत्री ने तो साफ-साफ कह दिया है कि ‘भाजपा के अपने ही लोग (उन्होंने एक पूर्व केंद्रीय मंत्री का नाम भी लिया है) उन्हें राजनैतिक तौर पर कमजोर करने और केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटवाने के लिए अभियान चला रहे हैं।’ इसी तरह भाजपा में एक वरिष्ठ मंत्री से इस्तीफा देने को कहा गया तो कहते हैं वे सीधे संघ की शरण में चले गए और संघ उनके बचाव में सामने आ गया।
इस केन्द्रीय मंत्री ने जब अपने ही एक वरिष्ठ साथी मंत्री (जिनकी गिनती एक परफॉरमर मंत्री में होती है) को फोन कर उनसे अपने पद से त्यागपत्र देने का अनुरोध किया तो कहा जाता है कि वे मंत्री जी पूरी तरह बिफर गए, बोले-वैसे भी पिछले काफी समय से आप लोग मेरी मिट्टी पलीद करने में लगे हैं, अब आप लोग चाहते हैं कि मैं अपने आप इस्तीफा भी दे दूं तो ऐसा नहीं होगा। आप लोगों में दम है तो मुझे मंत्रिमंडल से निकाल दीजिए फिर मैं आगे देखूंगा कि मुझे क्या करना है।’ मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें पिछले काफी वक्त से चल रही हैं, अब मध्य सितंबर यानी 12-13 सितंबर के बीच दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ सम्मेलन आहूत है, जिसमें शी जिनपिंग से लेकर पुतिन तक के आने की संभावना है, सो लगता नहीं कि तब तक मंत्रियों के विभागों के साथ कोई छेड़छाड़ होगी, इसके बाद पितृ पक्ष शुरू हो जाएगा जिसमें आमतौर पर कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता, यानी फेरबदल के लिए मुफीद वक्त नवरात्रि का ही बचता है, जिसके लिए अभी से तैयारियां शुरू हो गई है।
क्या यूपी में योगी का ‘एंटी इंकंबेंसी’ नहीं है?
जैसे-जैसे यूपी के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, भाजपा के अपने ही नेताओं के बेबसी व बेचैनियां नित्य दिन नए आकार ले रही हैं। खास कर प्रदेश के कुछ ब्राह्मण नेता अपनी ही सरकार के काम-काज को लेकर मुखर हो रहे हैं। ये नेता पूछ रहे हैं कि ‘देखते-देखते 12 साल निकल गए (केंद्र सरकार के) हम किन मुद्दों को लेकर जनता के पास जाएं, न वादा पूरा हुआ है और न काम की डिलीवरी हुई है, युवाओं में भयंकर आक्रोश है 10.5 करोड़ से ज्यादा युवा बेरोजगार हैं, जो अब हमसे सवाल पूछ रहे हैं।’
यूपी के तमाम जनमत सर्वेक्षणों में एक बात जो प्रमुखता से उभर कर सामने आ रही है कि ‘लगभग दस वर्ष लखनऊ की गद्दी पर विराजमान रहने के बावजूद यूपी में योगी के खिलाफ कोई खास एंटी इंकंबेंसी फैक्टर काम नहीं कर रहा, पर राज्य में एंटी इंकंबेंसी फैक्टर जरूर है जो कमोबेश मोदी नीत भाजपा के खिलाफ है।’ राज्य की महिला वोटर इस बात से कमोबेश खुश हैं कि ‘महाराज जी ने राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर बहुत हद तक लगाम लगाए रखा है।’ खास कर महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों में अपराधियों के साथ तो तेजी से धड़-पकड़ हो रही है। भाजपा का अपना जनमत सर्वेक्षण भी कुछ-कुछ इसी लाइन पर है कि योगी आज भी अपने दम पर चुनाव जीतने की स्थिति में है, बशर्ते उन्हें उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में केंद्र उतनी ही हिस्सेदारी दे, इन सर्वेक्षणों के नतीजे बता रहे हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा के सीटों की गिनती कम हो जाए पर वह जोड़-तोड़ कर सरकार बनाने की स्थिति में रह सकती है।
उत्तराखंड में सरकारी जमीनों का बंदरबांट
सूत्रों की मानें तो उत्तराखंड की लगभग 7 हजार बीघा सरकारी जमीन नीलामी को तैयार है। अरबों रुपयों की इन सरकारी जमीनों को बोली के जरिए निजी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। और यह कोई राज्य के किसी एक जिले का मामला नहीं है, बल्कि राज्य के हर जिले में सरकारी जमीनों की या तो नीलामी हो रही है या फिर बोली की प्रक्रिया को पूरा कर लिया गया है। यह सात हजार बीघा सरकारी जमीन राज्य सरकार निजी हाथों में सौंप रही है उस पर रिजार्ट्स, पांच सितारा होटल, वेलनेस सेंटर, टाउनिशप आदि बनाए जाएंगे। इसके पीछे यूआईआईडीबी यानी ‘उत्तराखंड इन्वेंस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड’ का हाथ बताया जाता है, नियोजन विभाग के अंतर्गत आने वाले इस बोर्ड का गठन वर्ष 2023 में सरकार ने किया था। इस बोर्ड के गठन का उद्देश्य था पीपीपी मॉडल पर निजी निवेशकों को उत्तराखंड लाना।
इसी कड़ी में 24 फरवरी 2025 को नियोजन सचिव मीनाक्षीसुंदरम ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों को पत्र लिख कर हॉस्पिटेलिटी सेक्टर व प्राइवेट आवासीय स्कूलों में निजी कंपनियों के निवेश के लिए जमीन चिन्हित कर उसका ब्यौरा उपलब्ध कराने को कहा था। दरअसल, 12.50 एकड़ से ज्यादा सरकारी भूमि को एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर करने और उसे लीज पर देने का अधिकार कैबिनेट यानी राज्य मंत्रिमंडल को है यानी जो निर्णय मंत्रिमंडल को करना था उसका पूरा अधिकार सुरक्षित है और मीनाक्षीसुंदरम इसके एमडी हो गए। अब इन बेशकीमती सरकारी जमीनों के इष्टतम उपयोग के नाम पर इसे निजी निवेशकों के लिए मिट्टी के मोल पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
…और अंत में
न्यूयार्क व टोरंटो की अपनी सफल यात्रा के बाद अब संघ प्रमुख मोहन भागवत संघ की शताब्दी वर्ष में 2 से 7 सितंबर के बीच लंदन के दौरे पर हैं। संघ का दावा है कि ‘ब्रिटेन की 115 से अधिक सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाएं भागवत की इस लंदन यात्रा को सफल बनाने में जुटी हैं।’
सूत्रों के दावों पर अगर यकीन किया जाए तो देश के एक व्यवसायी ने भी भागवत की इस विदेश यात्रा को सफल बनाने में अपने तमाम संसाधन झोंक रखे हैं। इन दिनों यह व्यवसायी परिवार व संघ में गहरी छन रही है, दिल्ली के लिए इस व्यवसायी की निजी पसंद के तौर पर देवेंद्र फड़णवीस को देखा जा रहा है, वे फड़णवीस के लिए संघ में भी जोरदार लॉबिंग कर रहे हैं। शायद यही बात दिल्ली को रास नहीं आ रही, वहीं दिल्ली भी संघ प्रमुख के ताजा रवैये को लेकर भी उतनी खुश नहीं बतायी जा रही।


Download Android App
Download iOS App



