अदालती व्यवस्था की सबसे बड़ी खामियों में से एक मुकदमे की सुनवाई में देरी साबित हो चुकी है। अगर हम भारतीय न्यायपालिका की इस पिछड़न का गहराई से अध्ययन करें, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि समस्या जमीनी स्तर पर है। भारतीय न्यायपालिका न्याय दिलाने में संघर्ष कर रही है। लोगों को अपने मामलों की सुनवाई कराने में होने वाली कठिनाइयां व्यवस्था की समग्र अव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। न्याय में देरी का अर्थ है किसी मामले के निपटारे में लगने वाला समय और अदालत द्वारा मामले का फैसला करने में लगने वाला समय, दोनों में विलंब होना।
उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में किसी मामले के निपटारे में लगने वाला समय कल्पना से परे है, एफआईआर दर्ज कराने से लेकर फैसला सुनाए जाने तक। कानूनी मामलों से निपटने में लोगों को अत्यधिक लालफीताशाही का सामना करना पड़ता है। न्याय में देरी से मुवक्किलों में निराशा पैदा होती है और न्यायिक प्रणाली की क्षमता भी कमज़ोर होती है। भारत में न्याय में देरी न्याय से इन्कार के समान है। न्याय में देरी का एक मुख्य कारण यह है कि अदालती मामलों की संख्या उनकी क्षमता से कहीं अधिक है। इसलिए देश की न्यायिक व्यवस्था में सुधार की बहुत जरूरत है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करने का निर्देश भारतीय न्याय प्रणाली में सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला है। यह निर्णय न केवल जिला स्तर के न्यायाधीशों को सेवा स्थायित्व प्रदान करता है, बल्कि भारतीय अदालतों के सामने मौजूद मुकदमों के अंबार और संसाधनों की कमी जैसी प्राथमिक चुनौतियों को भी प्रभावी ढंग से हल करता है। जिला अदालत के न्यायाधीश अपनी सेवा के 60वें वर्ष के आसपास अपने कानूनी ज्ञान, केस प्रबंधन क्षमता और व्यावहारिक अनुभव के उच्चतम स्तर पर होते हैं। पुरानी व्यवस्था में 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने के कारण न्यायपालिका उस बहुमूल्य बौद्धिक पूंजी और प्रशासनिक पकड़ से अचानक वंचित हो जाती थी। वर्षों के न्यायिक अनुभव के कारण वरिष्ठ जज जटिल मुकदमों की सुनवाई अधिक तेजी और सटीकता के साथ करते हैं, जिससे अपीलों और पुनर्विचार याचिकाओं की गुंजाइश कम होती है। वरिष्ठ जजों की उपस्थिति से सेवा में नए आए युवा न्यायिक अधिकारियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण, कोर्ट प्रबंधन और अदालती शिष्टाचार सीखने का सीधा अवसर मिलता है।
भारतीय न्यायपालिका में 4.5 करोड़ से अधिक लंबित मामले हैं, जिनमें से 85 प्रतिशत से अधिक मामले केवल जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित हैं। सेवानिवृत्ति आयु में 2 वर्ष की वृद्धि से इस लंबित बोझ को नियंत्रित करने में प्रत्यक्ष सहायता मिलेगी। विभिन्न राज्य सरकारों ने सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध इस आधार पर किया था कि इससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अनुभवी जजों को बनाए रखना वित्तीय रूप से अधिक लाभकारी है।
यदि न्यायिक अधिकारियों को 62 वर्ष तक सेवा में रखा जाता है, तो उनके पेंशन और ग्रेच्युटी जैसे अंतिम भुगतानों का तात्कालिक बोझ 2 वर्षों के लिए टल जाता है। साथ ही, नए अधिकारियों की तत्काल भर्ती, चयन प्रक्रिया और अनिवार्य प्रशिक्षण पर होने वाला भारी खर्च भी तुरंत नहीं करना पड़ता। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक अधिकारी सामान्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में वकालत के अनुभव के बाद अधिक आयु में सेवा में प्रवेश करते हैं, इसलिए उन्हें गैर-न्यायिक कर्मचारियों के समकक्ष मानकर 60 वर्ष में सेवानिवृत्त करना उचित नहीं है। इसके अलावा, जिला न्यायपालिका के कई मेधावी जजों को पदोन्नत होकर उच्च न्यायालय पहुंचने का पर्याप्त अवसर और समय मिल सकेगा, जो पहले कम उम्र में रिटायर होने के कारण छूट जाते थे। यह 2 वर्ष की वृद्धि स्वतः या बिना किसी शर्त के मिलने वाला लाभ नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय प्रणाली की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एक सख्त नियम जोड़ा है हाईकोर्ट द्वारा उपयुक्तता जांच 60 वर्ष की आयु पूरी करने पर संबंधित उच्च न्यायालय न्यायिक अधिकारी के पिछले रिकॉर्ड, कार्यक्षमता, स्वास्थ्य और ईमानदारी की समीक्षा करेगा। जिला न्यायालयों में न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करना केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि यह आम जनता के “शीघ्र और सुलभ न्याय” पाने के संवैधानिक अधिकार को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया एक दूरदर्शी कदम है। अनुभवी प्रतिभाओं का पूर्ण उपयोग, अदालती पेंडेंसी में कमी और राज्य के वित्तीय संसाधनों का कुशल प्रबंधन मिलकर भारत की कानूनी व्यवस्था को अधिक मजबूत, उत्तरदायी और सक्षम बनाएंगे।
बड़ा न्यायिक सुधार
Summary :
अदालती व्यवस्था की सबसे बड़ी खामियों में से एक मुकदमे की सुनवाई में देरी साबित हो चुकी है। अगर हम भारतीय न्यायपालिका की इस पिछड़न का गहराई से अध्ययन करें, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि समस्या जमीनी स्तर पर है। भारतीय न्यायपालिका न्याय दिलाने में संघर्ष कर रही है। लोगों को अपने मामलों की सुनवाई कराने में होने वाली कठिनाइयां व्यवस्था की समग्र अव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। न्याय में देरी का अर्थ है किसी मामले के निपटारे में लगने वाला समय और अदालत द्वारा मामले का फैसला करने में लगने वाला समय, दोनों में विलंब…


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