आजकल दिल्ली के ही नहीं, बल्कि अन्य प्रांतों के लोगों ने भी यहां एक भीड़तंत्र के जरिए अपनी मांगों को मनवाने का सिलसिला शुरू कर रखा है। हर देश में शांतिमय विरोध प्रदर्शन की इजाज़त होती है, चाहे जैन ज़ी करें अथवा विपक्ष। शांतिमय विरोध प्रदर्शन किसी भी सरकार को भी रोकना, लाठियां भांजना या गोली व पैलेट बुलेट्स चलाने का कोई अधिकार नहीं। जिस प्रकार से ज्ञानेश कुमार को हटाने के विरुद्ध मासूम कॉलेज की लड़कियों और लड़कों को पीटा या जेल भेजा गया, वह घोर अन्याय था।
दूसरी ओर छात्रों को भी सोचना चाहिए कि किसी के भड़काने में नहीं आना चाहिए, क्योंकि उनका परम धर्म बढ़िया से पढ़ाई करना है, न कि राजनीतिक धरनों में बैठना।ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली को, भारतीय संविधान में विश्वास रखने वाले लोगों ने नहीं, बल्कि अराजकता-वादी लोगों ने नई भीड़ तंत्र बना लिया है। बेशक सर (एस.आई.आर.) कथित तौर पर 13 करोड़ वोटरों के नाम हटाना, एक गंभीर मुद्दा है, जिसे सही मंच पर उठाया जाना चाहिए। कुछ नेता मुख्य न्यायाधीश से मिलने गए, मगर उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया।
इंडियन नेशनल कांग्रेस, यू.पी.ए. व कम्युनिस्ट, जो कभी जैसे, अब ‘लोकतांत्रिक आज़ादी के नाम पर कृंतक’ जैन-ज़ी। पैसा बर्बाद किया जा रहा है। सैकड़ों रेलें रोक दी गईं। लुटियंस ज़ोन ठप्प कर दिया गया। प्रदर्शन कुछ लोगों का यह पसंदीदा शौक बन गया है! इससे एक आम इन्सान को बड़ी समस्या उत्पन्न होती है। इस तथाकथित आंदोलन, क्रांति और बगावत ने दिल्ली के आम आदमी की रोज़मर्रा ज़िंदगी को बर्बाद कर दिया है। विपक्ष की भूमिका बहुत दयनीय है। सार्वजनिक बातचीत का स्तर गिर गया है, जिसे कई टी.वी. चैनलों पर सुना जा सकता है।
नई दिल्ली में वोटर लिस्ट के सर (स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न) व भारतीय निर्वाचन आयोग पर गड़बड़ी के आरोपों को लेकर बड़े राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। गृह मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन जारी कर, जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल’ के तौर पर रद्द कर दिया है। इसकी जगह, किसी भी तरह के विरोध-प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी और शाहदरा को तय किया गया है। ईं.डि.या. ब्लॉक के विपक्षी नेताओं ने कनॉट प्लेस व कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया से भारत के सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया, जिन्हें पुलिस ने रोक दिया।
प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े व चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेताओं आशुतोष रांका, सौरव दास व अभिजीत दिपके के साथ इंडियन यूथ कांग्रेस, ऐआईसा, एन.एस.यू.आई. ने मंडी हाउस व इंडिया गेट के पास लगातार विरोध-प्रदर्शन किए। दिल्ली पुलिस ने कई दिनों से चल रहे, इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान 20 से ज़्यादा एफ.आई.आर. दर्ज कीं और 1,500 से ज़्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर, बाद में छोड़ दिया।
अधिकारियों ने आवाजाही पर कड़ी पाबंदियां लगाई हैं और जंतर-मंतर जैसी पारंपरिक विरोध-प्रदर्शन वाली जगहों को डी-नोटिफ़ाई कर दिया है। मध्य दिल्ली में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था, मेट्रो स्टेशन के गेट बंद करने और ट्रैफ़िक डायवर्जन के बीच विरोध-प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक जगहें तय की गई हैं। दिल्ली हाई कोर्ट और भारतीय सुप्रीम कोर्ट में ‘शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने’ के अधिकार, पुलिस द्वारा हिरासत में लेने और नए विरोध प्रदर्शन की इजाज़त मांगने से जुड़ी कई याचिकाएँ दाखिल हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने इन प्रदर्शनों की अगुवाई की है।
प्रदर्शन रोक कर सरकार ने यह साबित कर दिया कि इन प्रदर्शनकारियों में दम है। यदि सरकार इन्हें इस प्रकार से नहींं रोकती तो ये स्वयं ही चिल्ला-चिल्ला कर शांत हो जाते। ज्ञानेश कुमार के बर्ताव व विवादित प्रक्रिया को लेकर नाराज़गी कम नहीं हो रही है, व दुनिया भर की मीडिया ने, बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शन को दर्शाया है, जिस से डर कर विरोध प्रदर्शनों पर सुरक्षा के कड़े कदमों के बाद, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को गैर-कानूनी हिरासत रोकने, सामान्य सार्वजनिक परिवहन व इंटरनेट सेवाएं बहाल करने का आदेश दिया।
दिल्ली पुलिस ने लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी, क्योंकि आयोजकों ने ज़रूरी 10 दिन के बजाय सिर्फ़ 3 दिन पहले ही इजाज़त के लिए आवेदन किया था, व शहर के कुछ हिस्सों में बी.एन.एन.एस. की धारा 163 के तहत ‘निषेधाज्ञा’ लागू कर दी गई थी। अधिकारियों ने हज़ारों पुलिस व पैरामिलिट्री जवानों को तैनात किया, मेट्रो के कई स्टेशन बंद कर दिए, सेंट्रल दिल्ली के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवा बंद कर दी व सड़कों पर आवाजाही पर पाबंदियां लगा दीं। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शांतिपूर्ण व बिना हथियार वाले प्रदर्शनकारियों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में न लिया जाए।
कोर्ट ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन व रेल अधिकारियों को सामान्य कामकाज फिर से शुरू करने का आदेश दिया। मीडियाकर्मियों व महिला पुलिस अधिकारियों के बीच झड़प, प्रदर्शनकारियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही बेहद तुच्छ भाषा ने, मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाकर इसे कथित ‘क्रांति व सरकार के पतन’ व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग की ओर मोड़ दिया है। भारत की राजधानी होने के नाते, दिल्ली को कई वैश्विक खतरों का सामना करना पड़ता है, जिसे प्रदर्शनकारी नजर अन्दाज कर रहे हैं।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने के मुद्दे को अराजकता और सड़क-प्रदर्शन करके हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए बौद्धिक बहस, मीडिया में प्रचार-प्रसार और मौजूदा सरकार के साथ सक्रिय वार्तालाप की ज़रूरत है। जिस प्रकार से दिल्ली को अराजकता द्वारा बंदी बनाया जाता रहा है, इसे तुरंत रोक जाना चाहिए।


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