मध्य प्रदेश के शहर धार में बसन्त पंचमी का त्यौहार शान्तिपूर्वक निपट गया हालांकि इसके लिए राज्य प्रशासन को पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में बदलना पड़ा और चप्पे-चप्पे पर पुलिस पहरा लगाना पड़ा। शहर में स्थित महान राजा भोज द्वारा 11वीं शताब्दी के शुरू में बनाई गई ‘भोजशाला’ पर चल रहे विवाद को लेकर यह सब करना पड़ा जिस पर 14वीं सदी में मुस्लिम आक्रान्ता अलाऊद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया था और इसे मस्जिद में बदलने का दुस्साहस किया था। भोजशाला में विद्या की देवी सरस्वती का मन्दिर बताया जाता है जिस पर हिन्दुओं की अटूट आस्था है और हर बसन्त पंचमी को वे भोजशाला में वाग्देवी की पूजा-अर्चना करते हैं परन्तु मुस्लिम समाज ने इसे कमाल मौला मस्जिद का नाम दे डाला और यहां हर शुक्रवार को नमाज अदा करनी शुरू की। यह परिपाठी कब शुरू हुई इस बारे में ठोस एेतिहासिक तथ्यों का अभाव है मगर माना जाता है कि मुस्लिम साम्राज्य में ही यह काम शुरू हुआ होगा। भोजशाला परिसर का प्रबन्धन राष्ट्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अन्तर्गत है अतः यह इमारत भारत के सांस्कृतिक व एेतिहासिक महत्व को दर्शाती है। इस परिसर में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों के अवशेष विद्यमान हैं और उनके प्रतीक चिन्ह भी इमारत पर अंकित हैं जो गवाही देते हैं कि यह मूल रूप से हिन्दू देवस्थान ही था। भोजशाला का मामला सबसे पहले मध्य प्रदेश की मुख्यमन्त्री रहीं भाजपा नेता साध्वी उमा भारती ने उठाया था और इसे हिन्दुओं को सौंपने का आह्वान किया था। मगर मामला न्यायालय में गया और वहां से समय–समय पर इस स्थान पर पूजा-अर्चना व नमाज अदा करने को लेकर निर्देश आते रहे जिनका अक्षरशः पालन भी होता रहा।
मूल सवाल यह है कि भारत में मुस्लिम शासन के दौरान हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों पर जिस तरह कब्जा किया गया और उन्हें मुस्लिम धर्म स्थानों में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया, उसका समाधान हम स्वतन्त्र भारत में मुस्लिमों के लिए प्रथक राष्ट्र पाकिस्तान बन जाने के बाद किस प्रकार निकालें? बेशक हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग नहीं खोजा जा सकता है मगर जो धर्म स्थान स्पष्ट रूप से अपने हिन्दू देवस्थान होने की गवाही दे रहे हैं उनके बारे में तो गंभीरता पूर्वक विचार करना ही होगा जिससे इस देश में साम्प्रदायिक सौहार्द व हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा हर कीमत पर बना रहे। इस सन्दर्भ में काशी के भगवान भोले नाथ के पूज्य परिसर में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद का संज्ञान लिया जाना बहुत जरूरी है जिसके हर भाग में हिन्दू देवस्थान की अमिट छाप है और हिन्दू इसे भगवान शंकर व पार्वती का ही देवस्थान मानते हैं। इसी सिलसिले में मथुरा के श्री कृष्ण जन्म स्थान का नाम भी लिया जा सकता है जिसकी इमारत का हर कोना चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि यह हिन्दुओं के इष्ट देव भगवान श्री कृष्ण का ही देवस्थान है। यह कहना पूरी तरह सच है कि भारत के मुसलमानों की वर्तमान पीढि़यों का मुस्लिम आक्रान्ताओं से कोई लेना-देना नहीं है और उनकी भूमिका स्वतन्त्र भारत के विकास में हिन्दुओं के समकक्ष ही रही है मगर समय की मांग यह भी है कि मुस्लिम समाज स्वयं ही आगे आकर एेसे धर्म स्थानों पर अपना दावा छोड़ दे जिन्हें भारत के हिन्दू साक्ष्यों के साथ अपने देवस्थान मानते हैं और उन पर अटूट आस्था रखते हैं। यदि भोजशाला के मुद्दे को ही लिया जाये तो इससे मुस्लिमों को क्या लगाव हो सकता है सिवाय इसके कि इन्होंने इसका नाम एक मुस्लिम फकीर के नाम पर कमाल मौला मस्जिद रख दिया और यहां हर जुम्मे को नमाज अदा करनी शुरू कर दी। मुस्लिम सुल्तानों व बादशाहों ने भारत की बहुसंख्यक हिन्दू रियाया को यह जताने के लिए उनके धर्म स्थानों पर कब्जा किया था जिससे वे यह जान सकें कि उनके मालिक अब हिन्दू राजा नहीं बल्कि वे हैं। क्योंकि राजशाही के दौरान धर्म स्थानों का विशेष महत्व होता था जिनकी मार्फत राजा अपने सर्वमान्य होने का सबूत पेश करता था। वह दौर न जाने कब का समाप्त हो चुका है और हम आज भी पिछली सदियों की मान्यताओं से चिपके बैठे हैं। हकीकत तो यह है कि भारत का मध्य युगीन इतिहास सही संदर्र्भों में हमारी पीढि़यों को पढ़ाया ही नहीं गया है। आठवीं सदी में सिन्ध पर अरबी मुस्लिम आक्रमण के बाद भारत में दसवीं शताब्दी तक क्या हुआ इस बारे में इतिहास चुप रहता है और आठवीं शताब्दी में चित्तौड़ के बप्पा रावल की शूरवीरता की कहानी हमें नहीं बताता।
बप्पा रावल ने पंजाब सिन्ध व अफगानिस्तान की तरफ से होने वाले मुस्लिम आक्रमणों का जमकर विरोध ही नहीं किया था, बल्कि मुस्लिम आक्रान्ताओं को रण क्षेत्र में बार-बार पराजित किया था और भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखा था। उन्होंने समूचे उत्तर भारत से मुस्लिम आक्रमण के खतरे को समाप्त करने के लिए ही आठवीं सदी में रावल पिंडी को ( जो अब पाकिस्तान में है) अपनी सैनिक छावनी बनाया था और अफगानितान तक हर बीस मील बाद एक सैनिक चौकी स्थापित की थी। मगर हम मध्य युगीन इतिहास ही मोहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण से पढ़ना शुरू करते हैं। वर्तमान भारत में हमें यह सोचना होगा कि मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा जबरन कब्जाये गये हमारे देवस्थल किसी भी रूप में परतन्त्रता के चिन्ह न बनें। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि मुस्लिम समाज के अगुवा कहे जाने वाले लोग या नेता उन स्थानों पर किसी प्रकार का विवाद न खड़ा करें जिनके बारे में हिन्दू देवस्थान होने के पक्के और ठोस प्रमाण हैं। धर्म निरपेक्ष स्वतन्त्र भारत में एेसा करना इसलिए जरूरी है जिससे मुस्लिम समाज भी इस देश के सांस्कृतिक गौरव के साथ जुड़ सके और मध्य युगीन मानसिकता से निजात पा सके। संविधान प्रत्येक हिन्दू- मुसलमान को बराबरी का दर्जा देता है इसलिए भारत की संस्कृति पर भी दोनों समुदायों का बराबर का अधिकार है जिसमें किसी भी समुदाय में गुलामी का भाव नहीं रहना चाहिए। इस पक्ष पर भारत के मुस्लिम समुदाय को गंभीरता से विचार करना चाहिए और देश में हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे को जीवन्त करना चाहिए क्योंकि ये दोनों समुदाय ही भारत के अभिन्न अंग हैं।





















