राजनाथ का दो-टूक जवाब

Summary :

रक्षा मन्त्री श्री राजनाथ सिंह ने यह कह कर कि पाकिस्तान से अगर कोई भी बात होगी तो वह केवल उसके कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने के मुद्दे पर होगी, साफ कर दिया है कि भारत के 140 करोड़ लोग पाक के बारे में क्या सोचते हैं क्योंकि इस पड़ोसी देश ने पिछले कई दशकों से आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का अंग बना रखा है। श्री सिंह ने 1999 में हुए कारगिल युद्ध के प्रमुख भारतीय केन्द्र ‘द्रास’ में जाकर इस युद्ध में भारत को मिली जीत के दिन की वार्षिकी पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए…

रक्षा मन्त्री श्री राजनाथ सिंह ने यह कह कर कि पाकिस्तान से अगर कोई भी बात होगी तो वह केवल उसके कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने के मुद्दे पर होगी, साफ कर दिया है कि भारत के 140 करोड़ लोग पाक के बारे में क्या सोचते हैं क्योंकि इस पड़ोसी देश ने पिछले कई दशकों से आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का अंग बना रखा है। श्री सिंह ने 1999 में हुए कारगिल युद्ध के प्रमुख भारतीय केन्द्र ‘द्रास’ में जाकर इस युद्ध में भारत को मिली जीत के दिन की वार्षिकी पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के सन्दर्भ में भारत की नीति ‘जैसे को तैसा’ है।

पूरी दुनिया जानती है कि 15 अगस्त 1947 को भारत को जो आजादी मिली थी वह इससे मजहब के आधार पर पाकिस्तान के निर्माण की शर्त के साथ मिली थी। उस समय जम्मू-कश्मीर एक स्वतन्त्र रियासत थी जिसके प्रमुख महाराजा हरिसिंह थे परन्तु इसके तुरन्त बाद ही पाकिस्तान की फौजों ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया था। यह आक्रमण शुरू में पाकिस्तान से कबायलियों के भेष में फौजियों को भेज कर किया गया, उसके बाद इसमें उसकी फौज भी बाकायदा तरीके से शामिल हो गई और 26 अक्तूबर आते- आते वह इस रियासत की राजधानी श्रीनगर के मुहाने तक पहुंच गई। तब महाराजा हरिसिंह ने अपनी पूरी रियासत का भारतीय संघ में विलय कर दिया।

मगर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हरिसिंह तब तक श्रीनगर छोड़कर जम्मू शहर आ चुके थे। उन्होंने यह कार्य पाकिस्तान के डर की वजह से ही किया था। 26 अक्तूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह ने भारत में जैसे ही विलय किया वैसे ही भारतीय फौजें कश्मीर पहुंच गईं और उन्होंने पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को पीछे धकेलना शुरू किया। कश्मीर घाटी की कठिन भौगोलिक परिस्थियों का सामना करते हुए भारतीय फौज ने पाकिस्तानी फौज को किशन गंगा नदी के पार के इलाके तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर ली थी कि तभी भारत राष्ट्रसंघ में पहुंच गया और उसने युद्ध विराम की घोषणा कर दी जिसकी वजह से कश्मीर घाटी का एक तिहाई इलाका पाकिस्तान के कब्जे में ही रह गया।

राष्ट्रसंघ ने प्रस्ताव किया कि पूरे जम्मू-कश्मीर प्रान्त में इसके लोगों के बीच जनमत संग्रह कराकर यह मालूम किया जाये कि इसके लोग पाकिस्तान में रहना चाहते हैं या भारत में। इस प्रस्ताव को भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री प. जवाहर लाल नेहरू ने मानने से इन्कार कर दिया और कहा कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय उसी प्रकार हुआ है जिस प्रकार कि भारत की अन्य देशी खुद मुख्तार रियासतों का। स्व. नेहरू ने एक बुद्धिमानी यह भी की थी कि उन्होंने रियासत के विलयपत्र पर उस समय के जम्मू-कश्मीर के सबसे लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला के हस्ताक्षर भी कराये थे। मगर त्रासदी यह रही कि प. जवाहर लाल नेहरू ही कश्मीर को लेकर राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में गये थे।

इस वजह से पाकिस्तान ने कश्मीर के विषय को अन्तर्राष्ट्रीय विवाद का विषय बना दिया। हालांकि बाद में जब 1971 में भारत का पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ और भारतीय फौज ने केवल 16 दिन के भीतर ही पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाकर इतिहास रच दिया और इसके 93 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण करा लिया तो इसके बाद मार्च 1972 में पाकिस्तान के साथ भारत का शिमला समझौता हुआ तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. इन्दिरा गांधी ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री मरहूम जुल्फिकार अली भुट्टो से यह लिखित में ले लिया कि दोनों देशों के बीच कश्मीर सहित जितने भी मसले हैं उन सबका हल आपसी बातचीत से ही होगा। मगर पाकिस्तान की फितरत समझौतों को तोड़ने की भी रही है।

1998 से इसने कश्मीर का मुद्दा फिर से अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से उठाना शुरू किया जिसका भारत की ओर से माकूल कूटनीतिक जवाब भी दिया गया। मगर इससे पहले 1989 से ही पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध आतंकवाद फैलाने की नीति पर चलना शुरू किया और कश्मीर में घुसपैठिये भेजने शुरू किये। पाकिस्तान ने भारत के विभिन्न शहरों में आतंकवादी घटनाएं कीं जिनमें सैकड़ों निरपराध नागरिकों की हत्या हुई। दरअसल जब 2008 नवम्बर में पाकिस्तानी दहशतगर्दों ने मुम्बई पर हमला किया तो तभी तत्कालीन विदेश मन्त्री भारत रत्न स्व. प्रणव मुखर्जी ने घोषणा कर दी थी कि आतंकवाद पाकिस्तान की विदेश नीति का अंग बन चुका है, अतः उसके साथ बातचीत तभी हो सकती है जब वह आतंकवाद को छोड़ दे।

इस सन्दर्भ में तत्कालीन विदेश सचिव श्री शिवशंकर मेनन के वक्तव्य देखे जा सकते हैं परन्तु न जाने क्या हुआ कि जुलाई 2009 के आते–आते भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह ने चीजों को पूरी तरह उलट दिया और मिस्र के शर्म-अल-शेख शहर में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री यूसुफ रजा गिलानी को यह आश्वासन दे बैठे कि आतंकवाद से खुद पाकिस्तान भी ग्रस्त है अतः दोनों देश आपस में बातचीत करके इस बीमारी का हल ढूंढेंगे और कूटनीतिक वार्ताएं जारी रखेंगे। मगर मनमोहन सिंह शर्म अल शेख में एक एेसी भयानक गलती कर गये जिसका खामियाजा भारत को आज तक भुगतना पड़ रहा है।

स्व. डा. सिंह कह बैठे कि पाकिस्तान के एक प्रान्त बलूचिस्तान में जो विद्रोही घटनाएं होती हैं उनमें पाक के अनुसार दूसरे देश की कथित भूमिका होने की जांच का रास्ता भी खुला होगा। इससे पाकिस्तान को भारत में आतंकवाद जारी रखने का नया बहाना मिल गया। अतः 2009 के बाद भी भारत के भीतर उसकी नापाक गतिविधियां जारी रहीं जिन्हें कूटनीतिक व फौजी दोनों ही तरीकों से रोकने की वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पूरी कोशिश की। अतः श्री राजनाथ सिंह के बयान को इस विशद पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए, क्योंकि विगत वर्ष 2025 में ही पाक घुसपैठियों ने कश्मीर के पुलवामा में भारत के 20 नागरिकों की उनका धर्म पूछ-पूछ कर हत्या की थी।

मगर इसका जवाब भारत ने जब फौजी आपरेशन सिन्दूर करके दिया तो वह सिवाये शोर मचाने के कुछ और नहीं कर सका। इस आपरेशन में सेना ने पाकिस्तान के कई आतंकवादी ठिकानों को नेस्तानाबूद कर डाला। इसी वजह से राजनाथ सिंह को यह कहना पड़ा है कि पाक की फौज और आतंकवादी तंजीमों में कोई अन्तर नहीं है क्योंकि इस देश की फौज ही दहशतगर्दों को पालती-पोसती है। अब पाक के कब्जे वाले कश्मीर के नागरिक जब अपने मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतान्त्रिक तरीकों से लड़ रहे हैं तो पाक की फौज उन्हें गोलियों से भून रही है। एेसी सूरत में भारत का कर्त्तव्य बनता है कि वह अपने ही पूरे राज्य जम्मू-कश्मीर के लोगों के भविष्य के बारे में पुरजोर तरीके से आवाज उठाये।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.