भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा पैट्रोलियम तेल आयात करने वाला देश है अतः इसका आयात बिल भी इसके कुल वार्षिक बजट का 40 प्रतिशत के आसपास जाकर बैठता है। मगर बीते ताजा वर्ष 2025 में भारत का तेल आयात बिल 12 प्रतिशत घटा है जबकि इसने पिछले वर्ष की इतनी ही अवधि में किये गये आयात के मुकाबले 2.4 प्रतिशत अधिक पैट्रोलियम उत्पादों का आयात किया। यह सब इस हकीकत के बावजूद हुआ कि डालर की कीमत रुपये के मुकाबले लगातार बढ़ी। ऐसा इसलिए संभव हो पाया क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट रही। कच्चे तेल की कीमतों में आयी गिरावट का असर यह रहा कि भारत के घरेलू बाजार में पैट्रोल व डीजल की कीमतों में स्थिरता रही जिससे अर्थ व्यवस्था के मानकों पर सकारात्मक प्रभाव रहा।
कच्चे तेल के आयात बिल के घटने से भी विदेशी मुद्रा खर्च पर विपरीत असर नहीं पड़ा और भारत में इस मोर्चे पर सहजता बनी रही। अतःबीता वर्ष, 2025 तेल के मोर्चे पर खुशनुमा माहौल छोड़ कर गया है। भारत की विदेशी मुद्रा सर्वाधिक रूप से कच्चे तेल व स्वर्ण आयात पर खर्च होती है। सोने के आयात में भी पूरी दुनिया में भारत का नम्बर प्रथम तीन देशों में आता है। हालांकि स्वर्ण आयात मोर्चे पर डालर की कीमतों में वृद्धि की वजह से विदेशी मुद्रा खर्च पर विपरीत असर पड़ रहा है परन्तु तेल आयात के मोर्चे पर सहजता आने से भारत को कुछ राहत मिली है। वर्ष 2025 के अप्रैल से लेकर नवम्बर महीने तक भारत ने कुल 80.9 अरब डालर के मूल्य का तेल व पैट्रोलियम उत्पाद (प्राकृतिक गैस सहित) आयात किया जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष की इतनी ही आठ महीने की अवधि के दौरान इसने 91.9 अरब डालर के मूल्य का तेल आयात किया था।
ये आंकड़े भारत सरकार के पैट्रोलियम मन्त्रालय ने जारी किये हैं। वर्ष 2025 के इन आठ महीनों के दौरान भारत ने कुल 16 करोड़ 34 लाख टन तेल का आयात किया जबकि इससे पिछले वर्ष की इतनी ही अवधि के दौरान इसने 15 करोड़ 95 लाख टन तेल का आयात किया था। इस प्रकार जहां तेल आयात की मिकदार में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई वहीं इसकी कुल कीमत में 12 प्रतिशत की कमी हुई। भारत में जितने भी पैट्रोलियम पदार्थों की खपत होती है उनकी 88 प्रतिशत आपूर्ति आयात के जरिये ही की जाती है क्योंकि देश में अपने तेल उत्पादन की क्षमता बहुत कम है। मुश्किल से 12 प्रतिशत तेल की आपूर्ति ही घरेलू उत्पादन से हो पाती है। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में जो नरमी देखने को मिली उसका प्रभाव सीधे भारत की तेजी से विकास कर रही अर्थ व्यवस्था पर देखने को मिला।
अप्रैल से लेकर नवम्बर 2025 के बीच भारत ने कच्चा तेल औसतन 67.6 डालर प्रति बैरल के भाव पर खरीदा जबकि इसके पिछले वर्ष की इतनी ही अवधि में कच्चे तेल को लगभग 80 डालर प्रति बैरल के हिसाब से खरीदना पड़ा था। तेल की कीमतों में यह गिरावट इसलिए रही क्योंकि इस दौरान बाजार में तेल की सप्लाई प्रचूर मात्रा में होती रही । तेल उत्पादक देशों ने अपने उत्पादन में किसी प्रकार की कमी नहीं की उल्टे इसे बढ़ाया। तेल उत्पादक देशों के संगठन ‘ओपेक’ ने पहले से चल रहे उत्पादन कम करने के फार्मूले को उलट डाला और उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया। हालांकि ऐसा ओपेक देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय बाजर में कच्चे तेल की मांग बढ़ने की वजह से ही किया था मगर इससे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज हुई। भारत ने इन आठा महीनों के दौरान कुल एक करोड़ 88 लाख टन तेल का ही उत्पादन किया जबकि पिछले वर्ष की आठ महीनों की अवधि में इसने एक करोड़ 91 लाख टन तेल का उत्पादन किया था।
मगर भारत में तेल की खपत में इस दौरान वृद्धि दर्ज हुई जो 15 करोड़ 80 लाख टन से बढ़कर 16 करोड़ 2 लाख टन हो गई। वर्ष 2025 के आठ महीनों के दौरान घऱेलू तेल उत्पादन से कुल एक करोड़ 83 लाख टन पैट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन किया गया। इस क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता 11.4 प्रतिशत हो गई जो कि पिछले वर्ष के मुकाबले बेहतर थी। भारत की मोदी सरकार वर्ष 2015 से ही कोशिश कर रही है कि तेल के मामले मे भारत की निर्भरता आयात पर घटे मगर इसके विपरीत यह लगातार बढ़ती ही जा रही है। वर्ष 2015 में भारत अपनी कुल खपत का केवल 77 प्रतिशत तेल ही आयात करता था तब मोदी सरकार ने लक्ष्य निर्धारित किया था कि 2022 तक इसे घटा कर 67 प्रतिशत कर दिया जाये मगर ऐसा संभव नहीं हो सका और आयात निर्भरता उल्टे 80 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गई।
इसका मुख्य कारण भारत में पैट्रोलियम उत्पादों की लगातार मांग बढ़ने की वजह से ही है। जहां तक प्राकृतिक गैस का सवाल है तो इसके आयात बिल में वर्ष 2025 के आठ महीनो में 11.5 प्रतिशत की कमी देखी गई। भारत ने कुल 9.2 अरब डालर मूल्य की गैस आयात की।
इस दौरान गैस का आयात 9 प्रतिशत घटा। इस दौरान भारत में गैस की औद्योगिक मांग घटी। वैसे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में गैस के दामों में भी बहुत ऊपर नीचे होती रही। कुल मिला कर बीता वर्ष पैट्रोलियम आयात के मोर्चे पर भारत का बिल कम करके गया है मगर चिन्ता की बात यह है कि भारत तेल के मामले में अपना घरेलू उत्पादन नहीं बढ़ा पा रहा है जबकि इसकी मांग में प्रतिवर्ष वृद्धि दर्ज हो रही है।


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