संसद के बजट सत्र का प्रारम्भ राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के दोनों सदनों के संयुक्त उद्बोधन से हो चुका है और दूसरी तरफ देश में युवा वर्ग विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए लाई गई नियमावली के विरुद्ध सड़कों पर प्रदर्शन कर रहा है। इससे पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों में सतत् विकास पथ पर आगे बढ़ते भारत में सामाजिक स्तर पर उस भाईचारे का माहौल नहीं है जो किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी शर्त होता है। यदि देश का युवा वर्ग सड़कों पर होगा तो भारत किस प्रकार अपना चहुंमुखी विकास कर पायेगा और नई पीढि़यां किस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति कर सकेंगी।
विगत 13 जनवरी को जारी नई नियमावली में आयोग ने स्पष्ट किया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में यदि जातिगत आधार पर अनुसूचित जातियों, जनजातियों व अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव किया जाता है तो इसे गंभीर आपराधिक श्रेणी में रखा जायेगा और ऐसे कृत्य के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की जायेगी। इस मामले में सबसे पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि भेदभाव के लिए समाज के कथित सवर्ण समाज से आने वाले छात्रों को पहले से ही उत्पीड़क मान लिया गया है क्योंकि नियम में यह नहीं कहा गया है कि किसी भी जाति या वर्ग के छात्र के खिलाफ किये गये भेदभाव को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में डाला जायेगा।
जाहिर है कि इसे लेकर युवा समाज में बेचैनी होनी ही थी क्योंकि नियम एक पक्षीय है और समाज के एक वर्ग से आने वाले छात्रों को पहले से ही शक की नजर से देखता है। इस निमावली के विरुद्ध देश के सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिका दाखिल हो चुकी है। अतः पूरा मामला न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी जा सकता है। नई नियमावली के अनुसार प्रत्येक शिक्षण संस्थान में एक समानता समिति का गठन भी किया जायेगा जो भेदभाव की शिकायतों को सुनकर आवश्यक आगे की कार्रवाई करेगी। इस समिति के संरक्षक विश्वविद्यालय के कुलपति या सर्वोच्च प्रशासक होंगे। समिति में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होगा। नियमावली में यह कही भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि किसी शिकायकर्ता की शिकायत झूठी या गलत पाई जाती है तो उसके विरुद्ध समुचित दंड की क्या व्यवस्था होगी।
युवा वर्ग में इस उपनियम के न होने से भी भारी रोष व्याप्त है और उसका मानना है कि इसके न होने से विश्वविद्यालय जातिगत राजनीति का अखाड़ा बन जायेंगे और यहां भी वोटबैंक की राजनीति का बोलबाला हो जायेगा। इस पर यदि गौर किया जाये तो उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए निश्चित तौर पर यह बहुत गंभीर स्थिति होगी मगर दूसरी तरफ यह भी हकीकत है कि 2019 में दक्षिण के एक विश्वविद्यालय में रोहित वेमूला नाम के दलित छात्र ने अपने साथ विश्वविद्यालय में हुए जातिगत भेदभाव के चलते ही आत्महत्या कर ली थी। यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय में गया जो कि अभी तक जारी है। इस मामले की सुनवाई करते हुए ही न्यायालय ने निर्देश दिया था कि प्रत्येक विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय तन्त्र कड़ा किया जाये।
इस निर्देश को ध्यान में रखते हुए ही केन्द्र सरकार ने नई नियमावली का गठन किया परन्तु वह इसे सन्तुलित नहीं रख सकी। अब शिक्षा मन्त्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान कह रहे हैं कि समाज के किसी भी वर्ग के छात्र के खिलाफ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया जायेगा किन्तु प्रश्न यह है कि जब नियमावली यह चीख-चीख कर कह रही है कि केवल अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछडे़ वर्ग के खिलाफ आने वाली शिकायतों को ही सुना जायेगा तो प्राकृतिक न्याय किस प्रकार हो पायेगा? हालांकि संभावित पीडि़त वर्ग समूह में दिव्यांग, महिला, नस्ल व क्षेत्र आदि को भी शामिल किया गया है मगर मुख्य मामला जातिगत भेदभाव का ही है। मैंने इस मामले में दो दिन पहले भी लिखा था कि अनुसूचित जातियों व जनजातियों के साथ अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों को जोड़ना गैर तार्किक था और भारत की ऐतिहासिमक व सांस्कृतिक मान्यताओं के प्रतिकूल था मगर यह कार्य 2012 में ही हो चुका था।
अब सवाल यह है कि हम परिस्थितियों को किस प्रकार सर्व सामाजिक हित में बनाये जिससे सामाजिक न्याय भी हो सके और भारत की नई पीढि़यां जातिवाद के जहर से निजात भी पा सकें। निश्चित रूप से इस सामाजिक वर्जना से शिक्षा के प्रचार-प्रसार द्वारा ही निजात पाया जा सकता है क्योंकि शिक्षा ही व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ाती है और उसे रूढि़वादिता के विरुद्ध तैयार करते हुए वैज्ञानिक सोच का सृजन करती है मगर जब शिक्षण संस्थान स्वयं जातिगत भावना से ग्रस्त हो जायेंगे तो हम किस दरवाजे पर सामाजिक न्याय की भीख मांगने जायेंगे? इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने विश्वविद्यालयों को जातिगत राजनीति के अखाड़े से दूर रखें।
इसके लिए हमें विश्वविद्यालयों में ऐसा वातावरण बनाना होगा जिससे युवा पीढि़यां जातिगत विद्वेष की शिकार न बन सके। इसीलिए बहुत जरूरी हो जाता है कि झूठी या बदले की भावना से की गई शिकायत करने वाले लोगों के खिलाफ भी समुचित कार्रवाई की जाये। क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में वर्तमान समय में जिस तरह की गला काट प्रतियोगिता चल रही है उसके चलते पहले से ही छात्रों के बीच वह सौहार्दता का माहौल नहीं बचा है जिसकी कल्पना पिछले दशकों में की जा सकती थी।
इसके साथ ही उच्च शिक्षा पर जिस तरह धनतन्त्र का कब्जा होता जा रहा है उससे देश का 90 प्रतिशत समाज त्रस्त है ऐसे में यदि हम अपने विश्वविद्यालयों को जातिगत राजनीति का अखाड़ा बना देंगे तो आने वाले समय में भारत के सम्पूर्ण विकास के ढांचे पर कुप्रभाव पड़ेगा। अतः शिक्षा मन्त्री श्री प्रधान को इस बारे में जल्दी ही कारगर कदम उठाना चाहिए और युवा पीढ़ी को उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त इस प्रकार करना चाहिए कि सामाजिक न्याय सभी वर्गों के छात्रों के साथ हो सके।


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