अमेरिका से हुए व्यापार समझौते के मोटे प्रारूप (फ्रेमवर्क) के कानूनी ब्यौरे को अन्तिम स्वरूप देने वाली वार्ता को भारत ने फिलहाल आगे के लिए टाल दिया है। यह वार्ता वाशिंगटन में सोमवार से होने वाली थी। जाहिर है कि भारत की मोदी सरकार चाहती है कि दोनों देशों के बीच आपसी कारोबार की शर्तें अब अमेरिका के सुप्रीम या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की एकतरफा घोषित शुल्क के विरुद्ध दिये गये फैसले की रोशनी में तय होनी चाहिए।
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने दो दिन पहले ही साफ कर दिया था कि ट्रम्प ने संविधान के जिस ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनामिक पावर्स एक्ट’ के तहत दुनिया के विभिन्न देशों के आयातित माल पर मनमाफिक शुल्क दरें निर्धारित की हैं वे अवैध हैं और राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्होंने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की स्वीकृति नहीं ली है। इस फैसले के तुरन्त बाद ट्रम्प ने अमेरिका के संविधान के एक अन्य अनुच्छेद का प्रयोग करते हुए 150 दिन या पांच महीने के लिए अमेरिका में आने वाले समस्त आयातित माल पर पहले 10 प्रतिशत शुल्क लगाने की घोषणा की और बाद में उसे बढ़ा कर 15 प्रतिशत कर दिया।
भारत के साथ बनी व्यापार सहमति के अन्तर्गत यह शुल्क दर 18 प्रतिशत रखी गई थी अतः अब भारत से निर्यातित माल पर यही दर लगेगी। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत व अमेरिका के बीच जिस कारोबार फ्रेमवर्क की घोषणा पिछले दिनों हुई थी उसकी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की रोशनी में अब स्थिति क्या होगी? इस बारे में देश के कुछ विशिष्ट आर्थिक पंडितों की राय है कि वह फ्रेमवर्क या व्यापार प्रारूप अब केवल ‘उद्देश्यात्मक या इच्छा शक्ति का वक्तव्य’ बन कर रह जायेगा। इस फ्रेमवर्क के घोषणा पत्र पर दोनों ही देशों के कार्यकारी राज प्रमुखों ने हस्ताक्षर किये थे।
वैश्विक गतिविधियों से जाहिर है कि जब से अमेरिका में जनवरी 2024 से राष्ट्रपति के पद पर डोनाल्ड ट्रम्प बैठे हैं तब से पूरी दुनिया की राजनीति में भारी उथल-पुथल चल रही है। विगत 2025 वर्ष के दौरान ट्रम्प की नीतियों की वजह से पूरे विश्व में ‘आर्थिक समर’ का ऐसा दौर शुरू हुआ है कि इसने दुनिया के सभी देशों में अपने–अपने आर्थिक हित संरक्षण का अभियान चला दिया है।
निश्चित रूप से इसे ‘आर्थिक कोल्ड वार’ का नाम दिया जा सकता है। मगर सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि ट्रम्प की नीतियों की वजह से इस कोल्ड वार के चलते विश्व का शक्ति क्रम गड़बड़ा गया है और विश्व व्यापार संगठन पूरी तरह से अप्रासंगिक हो गया है।
ट्रम्प ने द्विपक्षीय आधार पर जिस तरह दुनिया के बीस से अधिक आर्थिक क्षमता वाले देशों के साथ व्यापार समझौते किये उनसे विश्व व्यापार संगठन में विकसित देशों व विकासशील देशों के बीच जो न्यायप्रिय व्यापारिक सन्तुलन बना था वह पूरी तरह क्षत- विक्षत हो चुका है अतः ऐसे वातावरण में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय का अमेरिका की एकतरफा शुल्क नीति के खिलाफ आया फैसला विकासशील देशों के लिए ‘रामबाण’ की तरह है। भारत बेशक फिलहाल दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है मगर यह एक विकासशील देश ही है क्योंकि इसके 80 प्रतिशत से ज्यादा नागरिकों की हैसियत अभी भी विकसित देशों के नागरिकों के मुकाबले बहुत कमजोर है।
अतः भारत को यह सोचना होगा कि वह फैसले के बाद बने नये वातावरण का अधिकतम लाभ अपने हित में किस प्रकार उठाये? इस सन्दर्भ में भारत ने कुछ दिनों पहले ही जो व्यापार समझौता यूरोपीय संघ के 27 देशों के साथ किया है वह नजीर बन सकता है। इस समझौते में भारत ने यूरोपीय देशों को निर्यात होने वाले उस भारतीय माल पर जीरो प्रतिशत शुल्क की छूट ली है जिसके उत्पादन करने में भारत में श्रमिक बल व हुनर की आवश्कता पड़ती है। अतः अमेरिका के साथ भी व्यापार शर्तें निर्धारित करते हुए भारत अपने श्रममूलक उद्योगों का संरक्षण करने की कोशिश कर सकता है।
यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौते में भारत ने अपने कृषि क्षेत्र को भी पूरी तरह संरक्षित किया है। इसके साथ ही भारत की कोशिश हो सकती है कि वह अमेरिका से आने वाले अर्थात आयातित माल पर शुल्क दरें इस प्रकार लगाये कि भारत में ऐसे क्षेत्रों में स्थापित उत्पादन इकाइयों की उत्पादकता पर प्रभाव न पड़े। लेकिन इसके साथ–साथ भारत को अपने लोगों की क्रय क्षमता काे भी ध्यान रखना होगा और उपभोक्ताओं को राहत भी देनी होगी अतःवह अमेरिकी आयातित माल पर अन्ध विराम नहीं लगा सकता है। विशेषकर उच्च टैक्नोलोजी व रक्षा टैक्नोलोजी के क्षेत्र में इसे अमेरिका को उचित स्थान देना ही होगा।
हमें यह भी समझना होगा कि जब किन्हीं दो देशों के बीच व्यापार समझौते होते हैं तो उनका असर वैश्विक रणनीतिक मामलों पर भी पड़ता है अतः रूस के साथ भारत के जो ऐतिहासिक मधुर सम्बन्ध हैं वे किसी भी तरह से प्रभावित न हों । मगर अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले का दूसरा असर यह भी हो सकता है कि दुनिया में बहुध्रुवीय शक्ति सन्तुलन की धारा बहने लगे क्योंकि अभी तक विश्व के विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों पर अमेरिका व यूरोपीय देशों का ही दबदबा रहा है जबकि ब्रिक्स (ब्राजील-रूस- भारत-चीन व दक्षिण अफ्रीका) जैसा संगठन बनने के बाद वैश्विक स्तर पर कारोबारी समीकरण बदलने की दिशा में चलने लगे थे।
मगर श्री ट्रम्प ने अपनी शुल्क नीति के जरिये पूरे व्यापारिक सन्तुलन को केवल अमेरिका के ही पक्ष में झुकाने का तरीका ढूंढने का प्रयास किया। यही वजह रही कि पूरी दुनिया के देश उनकी इस नीति को विश्व के समरूपी विकास के सिद्धान्त के विरुद्ध मानने लगे थे और चिन्तित थे क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्रसंघ का यही उद्देशय था।


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