सड़कों पर यह हंगामा क्यों है?

Summary :

हमारा चुनाव आयोग एक समय दुनिया के लिए मिसाल था कि चुनाव कैसे करवाए जाते हैं और लोगों के वोट के अधिकार को कैसे सुरक्षित रखा जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चुनाव करवाने में इसे एक प्रकार का गोल्ड स्टैंडर्ड समझा जाता था कि भारत जैसे विशाल और जटिल लोकतंत्र में भी किस तरह निष्पक्ष, आज़ाद और ज़बरदस्त चुनाव करवाए जाते हैं। कई देशों से हमारे चुनाव आयोग को अपने चुनाव की देखरेख करने के लिए बुलाया जाता था। हमारे कई चुनाव आयुक्तों को तो रोल मॉडल समझा जाता रहा। विशेष तौर पर टी एन शेषन की बहुत इज्जत रही…

हमारा चुनाव आयोग एक समय दुनिया के लिए मिसाल था कि चुनाव कैसे करवाए जाते हैं और लोगों के वोट के अधिकार को कैसे सुरक्षित रखा जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चुनाव करवाने में इसे एक प्रकार का गोल्ड स्टैंडर्ड समझा जाता था कि भारत जैसे विशाल और जटिल लोकतंत्र में भी किस तरह निष्पक्ष, आज़ाद और ज़बरदस्त चुनाव करवाए जाते हैं। कई देशों से हमारे चुनाव आयोग को अपने चुनाव की देखरेख करने के लिए बुलाया जाता था। हमारे कई चुनाव आयुक्तों को तो रोल मॉडल समझा जाता रहा। विशेष तौर पर टी एन शेषन की बहुत इज्जत रही है, यहां तक कि पाकिस्तान में भी उनके प्रशंसक थे कि किस तरह वह निष्पक्ष चुनाव करवाने में किसी की परवाह नहीं करते। हमारा लोकतंत्र हमारे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर टिका हुआ था। राजनीतिक वर्ग कैसा भी घटिया हो, चुनाव आयोग को निष्पक्ष एम्पायर समझा जाता था। अब तक।
चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर लगातार हो रहे प्रदर्शन बताते हैं कि लोगों की नज़रों में इनकी क्या छवि है। इस विश्वास का क्षण केवल आयोग की त्रासदी ही नहीं, यह हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य है। पतन उसी वक्त शुरू हो गया था जब चुनाव आयुक्तों के चुनाव की प्रकिया बदल दी गई। तीन सदस्यों के पैनल में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ मुख्य न्यायाधीश थे पर मुख्य न्यायाधीश की जगह पैनल में एक मंत्री डाल दिया गया। यह सुविधा देश के प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति, को भी उपलब्ध नहीं है। परिणाम है कि मुख्य आयुक्त दबंग आज इस सरकार के लिए ही संकट बन गए हैं।
लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए मज़बूत संस्थाएं चाहिए। सरकार के अलावा संसद,अदालतों और मीडिया की बड़ी भूमिका है। सब निराश कर रहे हैं। सरकार अभी तक विरोधियों के साथ संवाद का माध्यम तैयार नहीं कर सकी। अगर संसद प्रभावी नहीं रहेगी तो लोग सड़कों पर इकट्ठा होना शुरू कर देंगे, जैसे हो रहा है। लोग भी तब इकट्ठे होते हैं जब वह महसूस करने लगते हैं कि उनकी आवाज ऊपर तक नहीं पहुंच रही या वह समझने लगते हैं कि ख़ामोशी विकल्प नहीं रही। दिल्ली के जंतर-मंतर पर और मुम्बई के शिवाजी पार्क में इतनी भीड़ इसलिए जुड़ीं क्योंकि लोग समझने लगे हैं कि व्यवस्था को अपनी तकलीफ़ बताने का यह ही रास्ता रह गया है।
10 अक्तूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर प्रदर्शन से पहले सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि आप सब कुछ बंद नहीं कर सकते। आप सार्वजनिक परिवहन को बंद नहीं कर सकते क्योंकि आम आदमी इसका इस्तेमाल करते हंै। पर सरकार ने परवाह किए बिना सारी दिल्ली को ठप्प कर दिया। दिल्ली आने वाली दर्जनों ट्रेनें रोक दी गईं और 45 मैट्रो स्टेशन बंद कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का नोटिस निकालने की जगह कुछ नहीं किया। अब आदेश दिया गया है कि ‘अगर जरूरत न हो तो बैरिकेड हटा दो’। कौन सरकार मानेगी कि बिना जरूरत के बैरिकेड लगाए गए हैं? देश में उभर रहे आंदोलनों का एक कारण है कि कुछ हद तक अदालतों ने लोकतंत्र के बुनियादी असूलों की रक्षा करना छोड़ दिया है। न्यूयार्क टाइम्स ने इसे “दबाव में आने वाली क़ानून व्यवस्था” कहा है। इंडिया गठबंधन के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च को भी इसीलिए इतना समर्थन मिला है। अपनी तरफ़ से लोग सबसे बड़ी अदालत को संदेश भेज रहे थे। एक और बड़े संस्थान, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है, मीडिया-प्रेस, का पतन तो चमत्कारपूर्ण है। इमरजैंसी के दौरान मीडिया की भूमिका पर लाल कृष्ण आडवाणी की टिप्पणी याद आती है कि ‘जब झुकने को कहा गया तो उन्होंने रेंगना बेहतर समझा’। जैसे इमरजैंसी के समय कई अपवाद थे इस बार भी है। इंडियन एक्सप्रेस में रीतिका चोपड़ा की चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज के बारे रिपोर्ट ने सारा भांडा फोड़ दिया है और भी बहुत है, पर अधिकतर सरकार के मीडिया विभाग की तरह ही काम करते हैं। सरकार से सवाल करने की जगह विपक्ष से करते हैं। इनके निन्दनीय रवैये ने देश का बहुत नुक़सान किया है। इन्होंने समाज को बांटने और क्रोध भरा समाज तैयार करने में भी शर्मनाक भूमिका निभाई है। संतोष की बात है कि अब यह धीरे-धीरे अप्रासंगिक होते जा रहे हैं क्योंकि सोशल मीडिया हावी हो रहा है। खबर छिपाने या रोकने का विकल्प इनके पास नहीं रहा।
10 अक्तूबर को जिस तरह कॉकरोच के प्रदर्शन को रोकने के लिए दमन का प्रयोग किया गया उसे काला दिन ही कहा जाएगा। युवाओं की भाग-भाग कर पिटाई की गई, लड़कियों को भी नहीं बख्शा गया। 7000 लोगों को हिरासत में लिया गया। एक प्रकार से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी में अघोषित कर्फ्यू लगा दिया गया। दिल्ली को एक दिन क़ैद कर दिया गया। मेट्रो के 45 स्टेशन बंद कर दिए गए। दिल्ली और हज़रत निज़ामुद्दीन आने वाली गाड़ियों को रोक दिया गया। 30000 पुलिस कर्मियों और 200 अर्धसैनिक कम्पनियां तैनात कर राजधानी को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। इसलिए कि युवा हमारी चुनावी प्रक्रिया की सत्य निष्ठा पर सवाल उठा रहे थे? वह भी शांतिमय ढंग से। अगर हिंसा हुई है तो पुलिस की तरफ़ से हुई
संविधान का अनुच्छेद 19 भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी और शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार देता है। इसी अधिकार पर चोट पहुंचाई गई है। असहमति और विरोध लोकतंत्र को मज़बूत करते हैं, कमज़ोर नहीं। हमारी तो आज़ादी ही प्रदर्शनों और आंदोलनों के द्वारा प्राप्त की गई थी। इमरजैंसी के खिलाफ भी बड़ा आंदोलन हुआ था जिसके बाद इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थी। भारत की जनता प्रदर्शनों और आंदोलनों को ज़रूरी समझती है। वह समझते हैं कि कम से कम इस तरह वह बहरी व्यवस्था के दरवाज़े पर दस्तक तो दे सकते हैं। अगर प्रोटेस्ट के अधिकार भी छिन गया तो प्रेशर कुकर फट जाएगा।
भाजपा के प्रवक्ता चाहे 10 अक्तूबर को फ्लाप शो कहें पर उन्हें ग़लतफ़हमी में नहीं रहना चाहिए। जब तक सुधारात्मक क़दम नहीं उठाए जाते सड़क पर हंगामा होता रहेगा। पिक्चर अभी बाक़ी है। एसआईआर के मामले में चुनाव आयोग और विशेष तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका को लेकर इंडियन एक्सप्रेस ने जो सवाल उठाए हैं वह अनुत्तरित हैं।
अगर सब कुछ सही और साफ़ है तो चुनाव आयुक्त आगे आकर प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते और शंकाओं का निवारण क्यों नहीं करते? उनकी एक प्रेस कांफ्रेंस सारे विवाद को ख़त्म कर सकती है। कब तक वह यह कह कर छिपते रहेंगे कि वह एक संवैधानिक संस्था है? संवैधानिक संस्था भी जनता से ऊपर नहीं हैं।
सरकार को समझना चाहिए कि असहमति, मतभेद और विरोध लोकतंत्र की जान है। इन्हें बर्दाश्त करना पड़ता है। भाजपा ने खुद मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाए और प्रदर्शन किए। विदेश में भी बुरी छवि बन रही है। पर उससे भी अधिक चिन्ता होनी चाहिए कि देश अंदर से बेचैन और बेताब हो रहा है। जब तक मूलभूत समस्याओं और शिकायतों का समाधान नहीं हो जाता जंतर-मंतर को प्रदर्शन-स्थल की सूची से हटाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला।

चन्द्रमोहन