बंद गला को टाटा बाय

Summary :

केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा बंद गला पोशाक को समाप्त करने और रेलवे कर्मचारियों की पारंपरिक वर्दी में बदलाव की मंशा जाहिर करने के बाद विवाद तेज़ हो गया। इसकी मुख्य वजह यह रही कि वैष्णव ने बंद गले को ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ का प्रतीक बताया। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय रेल मंत्री ने कहा, “हमें औपनिवेशिकता के हर निशान को पहचान कर समाप्त करना होगा। रेलवे में जो बंद गले का काला सूट प्रचलन में है, वह अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया था। आज से यह रेलवे की औपचारिक वर्दी नहीं रहेगा।” स्पष्ट है कि अंग्रेजों के…

केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा बंद गला पोशाक को समाप्त करने और रेलवे कर्मचारियों की पारंपरिक वर्दी में बदलाव की मंशा जाहिर करने के बाद विवाद तेज़ हो गया। इसकी मुख्य वजह यह रही कि वैष्णव ने बंद गले को ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ का प्रतीक बताया।
एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय रेल मंत्री ने कहा, “हमें औपनिवेशिकता के हर निशान को पहचान कर समाप्त करना होगा। रेलवे में जो बंद गले का काला सूट प्रचलन में है, वह अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया था। आज से यह रेलवे की औपचारिक वर्दी नहीं रहेगा।” स्पष्ट है कि अंग्रेजों के दौर में शुरू किए गए काले प्रिंस कोट को अब रेलवे की औपचारिक पोशाक से बाहर किया जा रहा है।
हालांकि इतिहास के पन्ने कुछ और ही कहानी कहते हैं। बंद गला पोशाक का संबंध लंबे समय से राजसी परंपराओं से रहा है और इसे राजपूत शासकों तथा जोधपुर के महाराजाओं द्वारा पहना जाता था। ऐसे में जब भारत सरकार ने इसे औपनिवेशिक करार दिया तो भारतीय फैशन डिज़ाइनरों ने इस दावे को तुरंत चुनौती दी। प्रसिद्ध डिज़ाइनर रघवेंद्र राठौर का कहना है, “यह कहना सरासर अनुचित है कि यह जैकेट हमारे इतिहास का हिस्सा नहीं है या किसी दूसरी संस्कृति की देन है।” उनके अनुसार यह परिधान चार शताब्दियों में विकसित हुआ है और “कलकत्ता में अंग्रेजों के आने से बहुत पहले से अस्तित्व में था।”
रिकॉर्ड के लिए यह उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार यह कह चुके हैं कि विकसित भारत का अर्थ औपनिवेशिक मानसिकता के हर अवशेष को समाप्त करना है। यह केवल बयानबाज़ी नहीं रही, बल्कि ठोस कदमों के ज़रिये इसे अमल में भी लाया गया है। उदाहरण के तौर पर राजपथ का नाम बदलकर कर्त्तव्य पथ किया जाना, अधिकार से अधिक कर्त्तव्य को प्राथमिकता देने का संकेत। भारतीय नौसेना के ध्वज में औपनिवेशिक सेंट जॉर्ज क्रॉस की जगह तिरंगे से प्रेरित नए प्रतीक को शामिल करना, बीटिंग रिट्रीट समारोह में सितार, तबला और संतूर जैसे भारतीय वाद्ययंत्रों को स्थान देना तथा औपनिवेशिक बजटीय परंपरा के तहत प्रयुक्त ब्रीफ़केस को हटाकर पारंपरिक बही-खाता अपनाना, जिसे केंद्रीय वित्त मंत्री ने भारतीय होने के गर्व के साथ प्रस्तुत किया। इसी दिशा में एक और कदम रेल बजट को केंद्रीय बजट में विलय करना भी रहा। ऐसे उदाहरणों की सूची लंबी है और यह प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है।
यदि रिपोर्टों पर भरोसा किया जाए तो मोदी सरकार ने मंत्रालयों और भाजपा-शासित राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे औपनिवेशिक प्रथाओं की पहचान कर उन्हें समाप्त करें और उनके स्थान पर भारतीय विकल्प अपनाएं।
अपुष्ट खबरों के अनुसार, सरकार भारतीय अदालतों में वकीलों द्वारा पहने जाने वाले काले कोट और गाउन, जो ब्रिटिश काल की विरासत हैं और जिनमें सफेद नेकबैंड अनिवार्य होता है, उसे बदलने पर भी विचार कर रही है। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोह के दौरान पहने जाने वाले गाउन और टोपी को लेकर भी बदलाव की संभावना जताई जा रही है। बेशक, शहरों, योजनाओं, रेलवे स्टेशनों और यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय के नाम बदलने को लेकर मोदी सरकार की सक्रियता अपने-आप में एक अलग कहानी है।
एक समय पर सरकार ने देश का नाम ‘इंडिया’ से बदलकर ‘भारत’ करने की कोशिश भी की थी। इसी संदर्भ में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भेजे गए रात्रिभोज आमंत्रणों में द्रौपदी मुर्मू को ‘भारत की राष्ट्रपति’ के रूप में संबोधित किया जाना याद किया जाता है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने इस कदम की कड़ी आलोचना की लेकिन सरकार उस भव्य और सफल शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन के बाद निश्चिंत दिखाई दी। लेकिन बंद गले पर लौटें तो यह निस्संदेह एक तरह की ‘सेलिब्रिटी पोशाक’ रही है, जिसे अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसे फिल्मी सितारों ने पहना है और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भी इसे धारण करते रहे हैं। विदेश दौरों के दौरान बंद गला उनकी ‘वार्डरोब स्टेपल’ रहा है, यदि इस शब्द का प्रयोग किया जाए।
निष्पक्षता के तकाज़े के तहत यह भी कहना होगा कि इस बदलाव की पहल करने वाले वैष्णव पहले व्यक्ति नहीं हैं। लगभग तीन वर्ष पहले भारतीय संसद ने भी बंदगले को अलविदा कह दिया था, जब वहां के सचिवालय कर्मचारियों ने प्रिंस कोट (जिसे बंदगला भी कहा जाता है) की जगह नेहरू जैकेट पहननी शुरू की। संसद के मार्शलों को भी उस समय सफारी सूट की जगह कुर्ता-पायजामा और मणिपुरी पगड़ी में देखा गया, जो मोदी सरकार द्वारा ड्रेस कोड बदले जाने के बाद लागू किया गया था।
क्या इस कथित अव्यवस्था के पीछे कोई सुविचारित रणनीति है? निस्संदेह है, क्योंकि ‘भारतीयता’ अब नया मानक बन चुकी है। ‘भारत से प्रेम करो, भारतीय बनो’ जैसे भाववाक्य, एक अर्थ में महात्मा गांधी के स्वदेशी मॉडल के पुनरुत्थान का संकेत देते हैं।
मोदी सरकार की आलोचना चाहे जितनी की जाए, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसने आम नागरिक की चेतना में भारत और भारतीयता के भाव को गहराई से स्थापित करने का प्रयास किया है और यह प्रयास अभूतपूर्व रूप से जनमानस में अपनी जगह बना चुका है। इसी संदर्भ में हर वर्ष 15 अगस्त के आसपास आयोजित होने वाली तिरंगा यात्रा या तिरंगा अभियान को भुलाया नहीं जा सकता। इसका उद्देश्य स्पष्ट है, भारतीय राष्ट्रवाद को उसके चरम पर प्रदर्शित करना। सड़कों पर दौड़ते ऑटो और निजी वाहन तिरंगे से सजे दिखाई देते हैं, दुकानों में राष्ट्रीय ध्वज की कमी हो जाती है, क्योंकि उसे खरीदने की होड़ मच जाती है। इस प्रकार मोदी और उनकी सरकार अकेले नहीं है, देश स्वयं इस भावना और राष्ट्र के प्रति अपने जज्बे सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना आता है। एक तरह से, उनकी सरकार ने भारतीय समाज में अब तक सुप्त पड़े राष्ट्रवादी भाव को पुनर्जीवित करने में सफलता हासिल की है। इसलिए जब वैष्णव भारतीय रूप वाली वर्दी की पैरवी कर रहे हैं तो वे अकेले नहीं हैं। हालांकि, उनके और उनके सहयोगियों के लिए यह अधिक उपयुक्त होगा कि वे बंदगले पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सेवाओं में ठोस और परिणामोन्मुख सुधारों पर जोर दें। कहने का आशय यह है कि प्रतीकों से पहले प्राथमिकताओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

Team Desk